कश्मीर से पहले हांगकांग, तिब्बत और पश्चिम चीन में दमन पर जवाब देगा चीन
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चीन को जम्मू-कश्मीर की चिंता सता रही है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के अधीन भारी निवेश के बाद चीन की लालच से भरी चिंता बढ़ेगी, यह एक सच्चाई है। यही कारण है कि चीन भी पाकिस्तान के उन प्रयासों में शामिल हो गया, जिसमें जम्मू-कश्मीर के मसले का अंतराष्ट्रीयकरण की कोशिश हो रही है।
ताजा मामला जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे के समाप्त करने के मसले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जाने का है। चीन के प्रयासों से मामला एक बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पहुंच गया लेकिन चीन और पाकिस्तान को यहां कोई खास समर्थन नहीं मिला। इसके बावजूद चीन और पाकिस्तान इसमें अपनी जीत बता रहे हैं। चीन के आग्रह पर सुरक्षा परिषद की बैठक तो बुला ली गई, लेकिन पाकिस्तान को कुछ हासिल नहीं हो पाया।
पाकिस्तानी अखबारों ने भी माना कि यूएन सुरक्षा परिषद में चीन के सहयोग के बाद भी पाकिस्तान को कुछ खास हासिल नहीं हो पाया, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र परिषद की वर्तमान बनावट पाकिस्तान के पक्ष में नहीं है। पांच स्थायी सदस्यों में से सिर्फ चीन ने पाकिस्तान के पक्ष में बात की। दरअसल चीन का पक्ष मे बात करना चीन की मजबूरी है।
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जहां चीन पावर प्लांट लगा रहा है, वहीं पश्चिमी चीन से ग्वादर को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण रूट पर भी नार्दन एरिया और पाक अधिकृत कश्मीर पड़ता है। चीन लद्दाख को लेकर भी आग बबूला है, लेकिन अहम सवाल यह है कि तिब्बत, पश्चिम चीन और हांगकांग में मानवीय स्वतंत्रता और मूलभूत लोकतांत्रिक मूल्यों का दमन करने वाला चीन किस आधार पर जम्मू-कश्मीर के लोगों के हितों की आवाज उठा रहा है?
हांगकांग में दमन, जम्म-कश्मीर मानवीय स्वतंत्रता की बात
चीन ने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त किए जाने के बाद जो राग अब तब अलापा है वो कितना सही और नैतिक हो सकता है, जब खुद चीन ही हांगकांग के नागरिकों की स्वतंत्रता छीनने पर आमदा है। पिछले दो महीनें से हांगकांग की सड़कों पर युवाओं का प्रदर्शन हो रहा है।
हांगकांग के युवा चीनी सरकार और चीन के मुखौटे के रूप में मौजूद हांगकांग की चीफ एग्जक्यूटिव कैरी लैम के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि चीन हांगकांग में वन नेशन टू सिस्टम को खत्म करने के खेल में लग गया है। ब्रिटेन से हांगकांग जब चीन को ट्रांसफर हुआ था उस समय चीन ने कई वादे किए थे।
हांगकांग के लोगों लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार देने का वादा किया था। यहां ड्रैगन लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने की कोशिश कर रहा है। हांगकांग की सरकार चीन के इशारे पर प्रत्यर्पण बिल पारित करने की कोशिश में है। चीन ने हांगकांग की जनता को जो वादा किया था, उसे पूरा नहीं किया। हांगकांग के लोग पश्चिमी देशों की तरह हांगकांग में लोकतंत्र चाहते हैं। लेकिन हांगकांग के चीफ एग्जक्यूटिव को मात्र 1200 लोगों का इलेक्ट्रोल परिषद चुनता है।
गौरतलब है कि 2014 में भी हांगकांग को युवाओं ने लोकतंत्र बहाली को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया था। एक तरफ चीन कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को समाप्त किए जाने को लेकर भारत पर लगातार अटैक कर रहा है। दूसरी तरफ खुद हांगकांग के लोगों को उस चीनी न्यायिक व्यवस्था में लेकर आना चाहता है, जिसे एक पार्टी कंट्रोल करती है। वैसे में चीन जम्मू-कश्मीर को लेकर जो बात कर रहा है, वो कितनी नैतिक है?
भारतीय कूटनीति दबाव में
जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत पाकिस्तान के खिलाफ आक्रमक है। जबकि भारतीय कूटनीति को इतनी ही आक्रमकता चीन के खिलाफ भी अपनानी चाहिए। हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर चीन गए। उन्होंने जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत का पक्ष रखा। लेकिन चीन फिर भी आक्रमक रहा। उसने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त किए जाने को लेकर तीखा रवैया अपनाए रखा।
चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स भारत के खिलाफ आग उगलता रहा। एस जयशंकर के दौरे के बाद भी ग्लोबल टाइम्स में भारत विरोधी लेख छपे। ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि भारत दक्षिण एशिया की शांति भंग करना चाहता है, तभी जम्मू कश्मीर को लेकर एकतरफा फैसला लिया। जबकि जम्मू कश्मीर को लेकर दो मुल्कों भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद है।
ग्लोबल टाइम्स ने यहां तक लिखा कि भारत अमेरिका और चीन के बीच चल रहे ट्रेड वॉर का लाभ उठा रहा है। इसी ट्रेड वॉर का लाभ उठाते हुए भारत ने जम्मू कश्मीर का स्पेशल स्टेटस समाप्त किया। वहीं चीन ने कहा कि इस क्षेत्र में चीन का बेल्ट एंड रोड पहल के तहत खासा निवेश है, इसलिए अगर इस क्षेत्र में अशांति आई तो इसका प्रभाव चीन पर पड़ेगा, इसलिए भारत को कोई फैसला सावधानी से लेना चाहिए। दिलचस्प बात है कि भारत अभी भी चीन के दबाव का सख्त जवाब देने से बच रहा है। जबकि भारत के लिए समय है चीन को आइना दिखाए।
ओसाका में जी-20 की बैठक के दौरान हांगकांग के आंदोलनकारियों ने जी-20 के लीडरों को ज्ञापन दे आग्रह किया था कि वे चीनी राष्ट्रपति से हांगकांग के आंदोलन को लेकर बात करें। दिलचस्प बात यह थी कि भारत ने हांगकांग के आंदोलनकारियों से ज्ञापन लेने से मना कर दिया। भारत का साथ इंडोनेशिया ने दिया। जबकि बाकी देशों ने ज्ञापन भी लिया औऱ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हांगकांग में हो रहे आंदोलन को लेकर चिंता जताई और उनके नागरिक अधिकारों के पक्ष को मजबूत से रखा।
उइगुर मुस्लिमों के दमन पर चीन से सवाल पूछा जाए
जम्मू कश्मीर के स्थानीय लोगों की स्वतंत्रता और विशेष दर्जे की चिंता चीन को है, लेकिन पश्चिमी चीन के उइगुर मुसलमानों की स्वतंत्रता की चिंता चीन को नहीं है। लाखों उइगरों को चीन ने डिटेंशन कैंप में बंद कर रखा है। उनकी स्वतंत्रता को छीन रखा है। लेकिन चीन को भारत की चिंता है। पश्चिम चीन के शिनझियांग प्रांत में उइगुर मुसलमानों के साथ लगातार हो रहे चीनी अत्याचार पर विश्व समुदाय की चिंता लगातार सामने आते रही है, लेकिन चीन इसे अपना आंतरिक मामला बताता है।
लंबे समय से पशिचमी चीन में बसे उइगुर मुस्लिम एक अलग राष्ट्र की मांग कर रहे है। उइगुर मुसलमानों ने चीनी सेना पर लगातार दमन का आरोप लगाया है। चीन ने पश्चिमी चीन में उइगुर मुसलमानों को उनके ही इलाके में अल्पसंख्यक बना दिया। उइगुरों को अल्पसंख्यक बनाने के लिए 1950 से लेकर 1970 तक बड़े पैमाने पर हान चीनी आबादी को शिनझियांग में बसा दिया गया। उइगुर मुसलमानों के दमन का इतना भयानक हो गया कि परेशान उइगुरों ने आतंकवाद का रास्ता अपनाया।
पश्चिमी चीन में कई आतंकी हमले भी हुए। जुलाई 2009 में पश्चिमी चीन की उरुमुकी में भयानक दंगे हो गए। इस दंगे में 200 के करीब लोग मारे गए। कई जगहों पर हान चीनी और उइगुरों के बीच संघर्ष हुआ। आज पश्चिमी चीन में उइगुर मुसलमानों के उपर बड़े पैमाने पर खुफिया नजरें चीनी सैनिक रख रहे हैं।
आज चीन जम्मू कश्मीर की बात कर रहा है। लेकिन चीन खुद यह भूल रहा है कि उइगुर मुसलमानों को री-एजुकेशन कैंप में बंदी बनाकर चीन रखे हुए हैं। लाखों उइगुर मुसलमान यहां बिना ट्रायल के बंद हैं। चीन का दावा है कि यहां पर रेडिकल सोच वालों की धारणा को बदला जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार 30 लाख मुस्लिम उइगुरों को चीन ने री-एजुकेशन कैंप में बंदी बना रखा है।
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