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जरूरी विषय: हिमालयी चार धामों की सुन्दरता से अधिक यहां की स्थिरता जरूरी

Sun, 30 Oct 2022 01:27 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sun, 30 Oct 2022 01:27 PM IST
सार

प्रख्यात पर्यावरणविद पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट का भी कहना है कि किसी भी स्थान की सुन्दरता तो अच्छी लगती ही है। लेकिन सुन्दरता से अधिक महत्वपूर्ण इन पवित्र स्थलों की स्थिरता है। अगर ये तीर्थस्थल ही नहीं रहेंगे तो सुन्दरता कहां रहेगी?

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चार धाम यात्रा - फोटो : Twitter

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नवीनतम बदरी-केदार यात्रा के बाद देश का ध्यान हिमालय के चार धामों की ओर पुनः आकर्षित होना स्वाभाविक ही है। इन पवित्र स्थलों का महत्व बढ़ाने के लिए, साल 2013 की हिमालयी सुनामी से तबाह हुए केदारनाथ धाम के पुनर्निमाण के साथ ही बदरीनाथ के कायापलट का काम भी चल रहा है। बदरी-केदार के साथ गंगोत्री और यमुनोत्री को भी रेल लिंक से जोड़ने के लिए सर्वेक्षण कार्य चल रहा है। सुन्दरता तो सभी को आकर्षित करती है लेकिन असली सवाल इन पवित्र स्थलों की सुरक्षा का है। 

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 से लेकर अब तक 6 बार केदारनाथ की यात्रा कर चुके हैं। साल 2019 के लोकसभा चुनाव की मतगणना से 5 दिन पहले मोदी केदारपुरी पहुंच गए थे जहां उन्होंने 17 घंटों तक रुद्र गुफा में भगवान शिव की अराधना की और भगवा वस्त्र धारण कर ध्यान लगाया। इसके बाद वह दोबारा देश के प्रधानमंत्री बने थे।
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सन् 2013 की आपदा में तबाह हुए केदारनाथ के पुनर्निमाण और बदरीनाथ धाम की कायापलट में प्रधानमंत्री की विशेष रुचि जगजाहिर है। वह समय-समय पर इन कार्यों की समीक्षा विभिन्न माध्यमों से स्वयं करते रहते हैं। लेकिन हिमालय पर एक के बाद एक जिस तरह विप्लव हो रहे हैं उनके आलोक में पवित्रस्थलों की स्थिरता का विषय सुन्दरता से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। 

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अस्थिरता का खतरा बरकरार

केदारनाथ क्षेत्र में गत 22 सितम्बर से लेकर 2 अक्तूबर तक 3 बड़े एवलांच आने के बाद उत्तराखण्ड सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने केदारनाथ मंदिर को एवलांच से तो सुरक्षित पाया मगर साथ ही समिति ने सरकार को अवगत कराया कि केदारनाथ धाम चोराबाड़ी और निकटवर्ती ग्लेशियों से आए मोरेन या मलबे के आउटवाश प्लेन पर स्थित है जिस पर भारी निर्माण खतरनाक साबित हो सकता है।


इसी आधार पर वाडिया हिमालयी भूगर्व संस्थान, उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र, भारतीय भूगर्व विज्ञान सर्वेक्षण विभाग ने  पूर्व में केदारनाथ में भारी निर्माण की मनाही की थी, लेकिन पुनर्निमाण के नाम पर वहां जितने भारी भरकम निर्माण कार्य होने थे वे पहले ही हो चुके हैं और अब सौंदर्यीकरण और आवासीय उदे्श्य के निर्माण कार्य चल रहे हैं। 
 

प्रख्यात पर्यावरणविद पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट का भी कहना है कि किसी भी स्थान की सुन्दरता तो अच्छी लगती ही है। लेकिन सुन्दरता से अधिक महत्वपूर्ण इन पवित्र स्थलों की स्थिरता है। अगर ये तीर्थस्थल ही नहीं रहेंगे तो सुन्दरता कहां रहेगी?


चिपको नेता कहते हैं कि मौजूदा हालात में चारों ही धाम किसी न किसी कारण से सुरक्षित नहीं हैं। चारों हिमालयी धामों में से कहीं भी क्षेत्र विशेष की धारक क्षमता (कैरीयिंग कैपेसिटी) से अधिक मानवीय भार नहीं पड़ना चाहिए, अन्यथा हमें आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। भट्ट इन धामों में अनावश्यक छेड़छाड़ के पक्ष में नहीं हैं। वह लोकल वार्मिंग से भी चिंतित हैं। चिपको प्रणेता के अनुराध पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन क्षेत्रों का लैंडस्लाइड हैजार्ड जोनेशन मैप बनवाकर संवेदनशील क्षेत्र चिन्हित करवाए थे।

विनाशकारी एवलांच आपदाओं की लम्बी श्रृंखला

उत्तराखण्ड सरकार द्वारा गठित डा0 पियूष रौतेला विशेषज्ञ समिति ने भी कुछ घटनाओं का उल्लेख करते हुए एवलांच और भूस्खलन को सबसे अधिक चिन्ता का विषय बताया है। समिति ने केदारनाथ आपदा के बाद 7 फरवरी 2021 को धौलीगंगा हिमस्खलन और बाढ़ का उदाहरण दिया है, जिसमें 207 लोग मारे गए और अरबों रुपये लागत के पावर प्रोजेक्ट बरबाद हुए थे। इसी तरह उसी क्षेत्र में सुमना गिरथीगंगा घाटी में 23 अप्रैल 2021 को एवलांच में 18 मजदूर दब कर मर गए थे।

2 अक्टूबर 2021 को 7 पर्वतारोही भी दब कर मरे। अक्तूबर 1998 में  27 लोग एवलांच में दबे और 23 जून 2008 को 20 लोग इसी तरह एवलांच की चपेट में आ कर मरे। नवीनतम उत्तरकाशी की डोकरानी ग्लेशियर क्षेत्र में द्रोपदी का डांडा में 4 अक्तूबर को एवलांच की चपेट में आने से 27 पर्वतारोही मारे गए और 2 का पता नहीं चला।

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बदरीनाथ धाम - फोटो : Twitter

बदरीनाथ के मास्टर प्लान पर भी आशंका

केदारनाथ की तरह ही विशेषज्ञों की राय के बिना बदरीनाथ का मास्टर प्लान भी बना। इससे पहले 1974 में बिड़ला ग्रुप के जयश्री ट्रस्ट द्वारा बदरीनाथ के जीर्णोद्धार का प्रयास किया गया था, लेकिन चिपको नेता चण्डी प्रसाद भट्ट, गौरा देवी तथा ब्लाक प्रमुख गोविन्द सिंह रावत आदि के विरोध के चलते उत्तर प्रदेश सरकार ने निर्माण कार्य रुकवा दिया था। बदरीनाथ एवलांच, भूस्खलन और भूकम्प के खतरों की जद में है और वहां लगभग हर 4 या 5 साल बाद एवलांच से भारी नुकसान होता रहता है। 

प्राचीनकाल में अनुभवी लोगों ने बदरीनाथ मंदिर का निर्माण ऐसी जगह पर किया जहां एयर बोर्न एवलांच सीधे मंदिर के ऊपर से निकल जाते हैं और बाकी एवलांच अगल-बगल से सीधे अलकनन्दा में गिर जाते, इसलिए मंदिर तो काफी हद तक सुरक्षित माना जाता है, लेकिन 3 वर्ग किमी में 85 हैक्टेयर में फैले बदरी धाम का ज्यादातर हिस्सा एवलांच  और भूस्खसलन की दृष्टि से अति संवेदनशील है।

वास्तव में जब तक वहां के चप्पे-चप्पे का भौगोलिक और भूगर्वीय अध्ययन नहीं किया जाता तब तक किसी भी तरह के मास्टर प्लान का कोई औचित्य नहीं है। बदरीनाथ के तप्तकुण्डों के गर्म पानी के तापमान और वॉल्यूम का भी डाटा तैयार किए जाने की जरूरत है, क्योंकि अनावश्यक छेड़छाड़ से पानी के स्रोत सूख जाने का खतरा बना रहता है।

गंगोत्री पर भैरोंझाप का खतरा

भागीरथी के उद्गम क्षेत्र में गंगोत्री मंदिर पर भैंरोंझाप नाला खतरा बना हुआ है। इसरो द्वारा देश की चोटी के वैज्ञानिक संस्थानों की मदद से तैयार किए गए लैण्डस्लाइड जोनेशन मैप के अनुसार गंगोत्री क्षेत्र में 97 वर्ग किमी. इलाका भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है जिसमें से 14 वर्ग किमी. का इलाका अतिसंवेदनशील है। गोमुख का भी 68 वर्ग कि.मी. क्षेत्र संवेदनशील बताया गया है।
 

भूगर्व सर्वेक्षण विभाग के वैज्ञानिक पी.वी.एस. रावत ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में चेताया है कि अगर भैरोंझाप नाले को ठीक नहीं किया गया तो ऊपर से गिरने वाले बडे़ बोल्डर गंगोत्री मंदिर को धराशयी करने के साथ ही भारी जनहानि कर सकते हैं। 


यमुनोत्री मंदिर के सिरहाने खड़े कालिंदी पर्वत से वर्ष 2004 में हुए भूस्खलन से मंदिर परिसर के कई निर्माण क्षतिग्रस्त हुए तथा छह लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2007 में यमुनोत्री से आगे सप्तऋषि कुंड की ओर यमुना पर झील बनने से तबाही का खतरा मंडराया जो किसी तरह टल गया। वर्ष 2010 से तो हर साल यमुना में उफान आने से मंदिर के निचले हिस्से में कटाव शुरू हो गया है। कालिन्दी पर्वत यमुनोत्री मन्दिर के लिए स्थाई खतरा बन गया है। सन् 2001 में यमुना नदी में बाढ़ आने से मंदिर का कुछ भाग बह गया था।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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