खगोलीय घटनाओं और धार्मिक मान्यताओं का संबंध, क्या चंद्रमा सच में हमारे मन को प्रभावित करता है?
इसके बाद हमने जैसे-जैसे इस प्रकृति और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझना शुरू किया, वैसे-वैसे हमें एहसास हुआ कि हम केवल भौतिक शरीर ही नहीं हैं बल्कि हमारी चेतना और ऊर्जा का एक गहरा संबंध ब्रह्मांडीय शक्तियों से भी है।
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आज से करीब 13.8 अरब साल पहले बिग बैंग के साथ इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। बिग बैंग के तुरंत बाद टाइम और स्पेस अस्तित्व में आए और ब्रह्मांड का विस्तार शुरू हो गया। इसके बाद करोड़ों आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ, जिनमें ग्रहों और तारों के बनने की शुरुआत हुई। इसी प्रक्रिया में हमारा सौरमंडल भी अस्तित्व में आया, जिसमें 4.5 अरब साल पहले हमारी पृथ्वी का जन्म हुआ। इसके बाद 3.7 बिलियन सालों पहले रसायन, ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण के समायोजन से धरती पर पहले जीवन (सिंगल सेल माइक्रोब जिसे लूका Last Universal Common Ancestor भी कहा जाता है) की शुरुआत हुई। यहीं से जीवन के सफर की शुरुआत होती है और क्रमिक विकास की लंबी श्रृंखला में अंततः मानव अस्तित्व में आता है।
मानव, पृथ्वी के बाकी दूसरे जीवों की तुलना में काफी अलग थे। इनकी सोचने, समझने और तर्क करने की क्षमता ने ही इन्हें अन्य जीवों की तुलना में अधिक विकसित किया। इसके बाद हमने जैसे-जैसे इस प्रकृति और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझना शुरू किया, वैसे-वैसे हमें एहसास हुआ कि हम केवल भौतिक शरीर ही नहीं हैं बल्कि हमारी चेतना और ऊर्जा का एक गहरा संबंध ब्राह्मांडीय शक्तियों से भी है।
धार्मिक मान्यताएं और खगोलीय घटनाओं का रहस्य
हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों को यह एहसास हुआ कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक विशेष प्रभाव हमारे मन, शरीर और चेतना पर पड़ता है। शायद यही एक बड़ी वजह रही होगी, जिसकी वजह से कई धार्मिक पर्वों (महाशिवरात्रि, गुरुपूर्णिमा, अमावस्या, पूर्णिमा आदि) को खगोलीय घटनाओं के साथ जोड़ा गया। मान्यता है कि इन खास अवसरों पर आध्यात्मिक साधनाओं का काफी महत्व है।
हिंदू पचांग के अनुसार महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस समय सूर्य, कुंभ राशि में होता है और चंद्रमा क्षीण अवस्था में होता है। मान्यताओं के अनुसार इस तरह की विशेष स्थिति आध्यात्मिक साधनाओं के लिए काफी अच्छी होती है। इस दौरान आध्यात्मिक साधनाओं को करने से शरीर में प्राण ऊर्जा का प्रवाह बेहतर ढंग से होता है। यही नहीं महाशिवरात्रि के दौरान ग्रह और नक्षत्रों की जो स्थिति बनती है उसका एक विशेष प्रभाव शरीर के चक्रों पर भी पड़ता है।
पौराणिक ध्रमग्रंथों में शिव को एक योगी के रूप में दिखाया गया है और उनका तीसरा नेत्र छठे चक्र से जुड़ा हुआ है। यह आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक भी माना जाता है। मान्यता यह भी कहती है कि महाशिवरात्रि के दिन ग्रहों और नक्षत्रों का ऐसा योग बनता है, जो कि शरीर के चक्रों को सक्रिय करने का काम करता है। इससे कुंडलिनी ऊर्जा पूरे शरीर में प्रवाहित होने लगती है।
क्या चंद्रमा सच में हमारे मन और शरीर को प्रभावित करता है?
वहीं सदियों से चांद और उसका इंसान के मानसिक व्यवहार पर असर की कहानियां भी दुनियाभर की मान्यताओं का हिस्सा रही हैं। मान्यता थी कि चांद की स्थिति और उसके घटने बढ़ने के हिसाब से इंसान का स्वाभाव भी बदलता है। चंद्रमा के गुरुत्व का प्रभाव ज्वार जैसी प्राकृतिक घटनाओं पर पड़ता है यह तो हमें पता है। हालांकि, कई रिसर्च में इस बात का पता चला है कि चंद्रमा की स्थितियों के घटने बढ़ने का प्रभाव इंसानों के व्यवहार, उनके मानसिक स्वास्थ्य पर कितना पड़ता है इनमें से ज्यादातर विश्वास गलत हैं।
वहीं कुछ शोध में इस बारे में पता चला है कि चंद्रमा के घटने बढ़ने से बाइपोलर डिसऑर्डर के लक्षणों में जो बदलाव होते हैं उनके बीच एक संबंध हो सकता है। इसके अलावा पूर्णिमा की रात में गहरी नींद का कम आना और REM (रैपिड आई मूवमेंट) नींद में जानें में देरी होने के भी कुछ प्रमाण मिले हैं। कई अध्ययनों में इस बात का भी पता चला है कि पूर्णिमा के दिन हृदय संबंधी स्थितियों में भी थोड़ा बदलाव देखने को मिलता है। चंद्रमा का इंसानी शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? वैज्ञानिक इसका अभी भी गहराई से अध्ययन कर रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस क्षेत्र में अभी भी कई नई खोजों का सामने निकलकर आना बाकी है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।