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Caste Census: भारत में जातिगत जनगणना तो होगी मगर कब?
सार
संविधान के अनुच्छेद 246 के मुताबिक जनगणना संघ का विषय है और संविधान की सातवीं अनुसूची के क्रम संख्या 69 पर सूचीबद्ध है। जनगणना अधिनियम, 1948 स्वतंत्र भारत में जनगणना के संचालन के लिए कानूनी आधार बनाता है।
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जातिगण जनगणना कब?
- फोटो : freepik
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विस्तार
भारत सरकार ने आखिर एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए आगामी जनगणना में जातिगत गणना को शामिल करने की घोषणा कर ही दी है। इस मसले को लेकर विपक्ष और खासकर कांग्रेस बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही थी। यह निर्णय केंद्रीय मंत्रिमंडल और राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमेटी द्वारा मंजूर किया गया। हालांकि, इस घोषणा के साथ एक महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रह गया है कि जनगणना और इसके साथ होने वाली जातिगत गणना आखिर कब शुरू होगी?
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समय सीमा की यह अस्पष्टता न केवल प्रशासनिक चुनौतियों को उजागर करती है, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस को भी हवा दे रही है। चूंकि इसी तरह महिला आरक्षण का निर्णय होने के बाद कानून भी पास हो रखा है लेकिन कानून लागू होने की समय सीमा अनिश्चित है। जातिगत गणना का यह निर्णय बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले लिया गया है, जो इसके राजनीतिक निहितार्थों को और गहरा करता है।
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समय सीमा की अस्पष्टता
संविधान के अनुच्छेद 246 के मुताबिक जनगणना संघ का विषय है और संविधान की सातवीं अनुसूची के क्रम संख्या 69 पर सूचीबद्ध है। जनगणना अधिनियम, 1948 स्वतंत्र भारत में जनगणना के संचालन के लिए कानूनी आधार बनाता है। केंद्र सरकार के जातिगत जनगणना के इस ऐतिहासिक निर्णय के बावजूद, इसकी समय सीमा को लेकर कई अनिश्चितताएं हैं। जिन पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी है।
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नियमानुसार भारत में हर 10 साल में जनगणना आयोजित होती है, लेकिन 2021 में कोविड-19 महामारी के कारण इसे स्थगित कर दिया गया। अब यह अनुमान है कि जनगणना सितंबर 2025 से शुरू हो सकती है और 2026 तक चलेगी, लेकिन सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की है। कुछ समाचार स्रोतों के अनुसार, अंतिम आंकड़े 2026 के अंत या 2027 तक प्रकाशित हो सकते हैं। हालांकि, यह अनुमान भी अनिश्चित है। जनगणना को लेकर अनिश्चितता का एक कारण बजट भी है।
सन् 2025 के केंद्रीय बजट में जनगणना के लिए पर्याप्त धनराशि का प्रावधान नहीं किया गया है। यह प्रक्रिया को और विलंबित कर सकता है। बिहार के अनुभव से पता चलता है कि जातिगत जनगणना के लिए व्यापक संसाधनों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। जातिगत जनगणना एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि भारत में हजारों जातियां और उप-जातियाँ हैं। बिहार में 214 जातियों की गणना की गई, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह संख्या बहुत अधिक हो सकती है। डेटा संग्रह, सत्यापन, और विश्लेषण में समय लगेगा।
केंद्र सरकार ने पहले तर्क दिया था कि जातियों की गणना करना लंबा और कठिन कार्य है। यह अस्पष्टता राष्ट्रीय जनगणना में भी बाधा बन सकती है। जातिगत जनगणना के आंकड़े न केवल सामाजिक नीतियों, बल्कि आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों को भी प्रभावित करेंगे। सरकार ने महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) कानून तो पास करा दिया मग रवह कब लागू होगा? यह भी अनिश्चित है। उसे लागू करने के लिए भी जनगणना और परिसीमन आवश्यक है। यह प्रक्रिया जातिगत जनगणना के परिणामों को और विलंबित कर सकती है।
बिहार का योगदान
बिहार ने जातिगत जनगणना के मामले में अग्रणी भूमिका निभाई है। सन् 2019 और 2020 में बिहार विधानसभा और विधान परिषद ने जातिगत जनगणना का प्रस्ताव पारित किया था। 2022 में नीतीश कुमार सरकार ने स्वतंत्र रूप से जाति आधारित सर्वेक्षण शुरू किया, जिसके आंकड़े 2 अक्टूबर 2023 को जारी किए गए। इस सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार की कुल जनसंख्या 13.07 करोड़ है, जिसमें अत्यंत पिछड़ा वर्ग 36.01प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग 27.12प्रतिशत, अनुसूचित जाति 19.65 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति 1.68 प्रतिशत है।
सामान्य वर्ग की आबादी 15.52 प्रतिशत बताई गई। यह सर्वेक्षण दो चरणों में हुआ था। पहला चरण (7-31 जनवरी 2023) में मकानों की गणना, और दूसरा चरण (15 अप्रैल 2023 से) में व्यक्तियों की गणना। बिहार सरकार ने डिजिटल तकनीक का उपयोग किय गयाा, जिसमें ‘‘बीजगा’’ (बिहार जाति आधारित गणना) मोबाइल ऐप के माध्यम से डेटा एकत्र किया गया। हालांकि, इस प्रक्रिया को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, और मई 2023 में इस पर रोक लगा दी गई थी। बाद में, अगस्त 2023 में हाई कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज कर सर्वेक्षण को मंजूरी दी।
बिहार चुनाव और राजनीतिक संदर्भ
जातिगत जनगणना की घोषणा का समय बिहार विधानसभा चुनाव (अक्टूबर-नवंबर 2025) से ठीक पहले का है, जो इसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। बिहार में जातिगत जनगणना का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक दलों के लिए एक प्रमुख हथियार रहा है। नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल ने 2023 में जातिगत सर्वेक्षण को सफलतापूर्वक लागू किया, जिसे एक ऐतिहासिक कदम माना गया।
इस सर्वेक्षण ने ओबीसी और ईबीसी की 63 प्रतिशत आबादी को उजागर किया, जिससे इन समुदायों के बीच नीतीश और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की लोकप्रियता बढ़ी। 2025 के चुनाव में, केंद्र का यह निर्णय नीतीश सरकार की उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा दे सकता है। आरजेड नेता तेजस्वी यादव ने इसे ‘दशकों के संघर्ष का प्रतिफल’ बताया था।
भाजपा की दुविधा
भारतीय जनता ने अतीत में जातिगत जनगणना का विरोध किया था, लेकिन विपक्ष में रहते हुए इसकी मांग भी की थी। 2024 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जातिगत जनगणना का समर्थन किया, लेकिन इसका उपयोग ‘चुनावी उद्देश्यों’ के लिए न करने की शर्त रखी। बिहार में भाजपा ने 2023 के सर्वेक्षण का समर्थन किया था, क्योंकि वह उस समय नीतीश सरकार का हिस्सा थी। अब केंद्र के निर्णय से भाजपा को ओबीसी और ईबीसी वोटरों को लुभाने का अवसर मिल सकता है, लेकिन समय सीमा की अस्पष्टता इसे कमजोर कर सकती है।
कांग्रेस और विपक्ष की मांग
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बार-बार जातिगत जनगणना को ‘सामाजिक न्याय‘ का आधार बताया है। उन्होंने बिहार के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि आबीसी, एससी और एसटी की 84 प्रतिशत आबादी के बावजूद, केंद्र सरकार में उनकी भागीदारी कम है। विपक्ष इस अस्पष्टता को सरकार की ‘नीति और नीयत’ पर सवाल उठाने के लिए उपयोग कर सकता है, खासकर अगर जनगणना में देरी होती है।
जातिगत जनगणना की घोषणा ने आबीसी, एससी और एसटी समुदायों में उम्मीदें जगा दी हैं। समय सीमा की अनिश्चितता इन समुदायों में निराशा पैदा कर सकती है, जिसका राजनीतिक दलों को नुकसान हो सकता है। बिहार जैसे राज्यों में, जहाँ जातिगत समीकरण चुनावी परिणाम तय करते हैं, यह अस्पष्टता मतदाताओं के बीच अविश्वास को बढ़ा सकती है।
जातिगत आंकड़े सामाजिक कल्याण योजनाओं, आरक्षण नीतियों, और संसदीय सीटों के परिसीमन को प्रभावित करेंगे। देरी होने पर ये नीतियाँ भी विलंबित होंगी, जैसा कि महिला आरक्षण के मामले में देखा गया है। समय सीमा की अस्पष्टता विपक्ष को सरकार पर घोषणा बिना कार्यान्वयन’ का आरोप लगाने का मौका देगी। वहीं, सत्तारूढ़ दल इसे ‘ऐतिहासिक कदम’ के रूप में प्रचारित कर सकते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में जातिगत जनगणना का इतिहास औपनिवेशिक काल से शुरू होता है। ब्रिटिश शासन के दौरान 1872 से 1931 तक नियमित रूप से जाति आधारित जनगणना की जाती थी। इन गणनाओं का उद्देश्य सामाजिक संरचना को समझना और प्रशासनिक नीतियों को आकार देना था। 1941 की जनगणना में भी जाति आधारित डेटा एकत्र किया गया, लेकिन इसे प्रकाशित नहीं किया गया।
आजादी के बाद, 1951 से भारत सरकार ने केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की जनगणना को नियमित रूप से प्रकाशित किया, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य जातियों के आंकड़े एकत्र नहीं किए गए। इसका कारण यह माना गया कि जातिगत डेटा सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दे सकता है। हालांकि, 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद, जातिगत जनगणना की मांग तेज हुई।
यह सवाल उठने लगा कि ओबीसी आरक्षण का आधार क्या है, क्योंकि उनकी सटीक जनसंख्या के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। सन् 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना आयोजित की गई, जिसे ग्रामीण विकास मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय ने संचालित किया। हालांकि, इसके आंकड़े पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किए गए, जिससे यह प्रक्रिया विवादास्पद रही। केंद्र सरकार ने बार-बार यह तर्क दिया है कि ओबीसी की गणना करना जटिल और समय लेने वाला कार्य है।
सरकार को स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत
जातिगत जनगणना का निर्णय भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम है। बिहार ने 2023 में इस दिशा में पहल की, और अब केंद्र सरकार का निर्णय इसे राष्ट्रीय स्तर पर ले जा रहा है। हालांकि, समय सीमा की अस्पष्टता इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रभाव को कमजोर कर सकती है। जनगणना की शुरुआत, डेटा संग्रह, और परिणामों का प्रकाशन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें बजट, प्रशासनिक तैयारी, और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
बिहार चुनाव के संदर्भ में, यह निर्णय सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के लिए एक दोधारी तलवार है। यदि समय सीमा स्पष्ट नहीं की गई, तो यह घोषणा केवल राजनीतिक लाभ के लिए एक प्रचार स्टंट बनकर रह सकती है, जैसा कि महिला आरक्षण के मामले में देखा गया। सरकार को चाहिए कि वह एक स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करे, जिसमें जनगणना की तारीख, जातिगत गणना की प्रक्रिया, और परिणामों के उपयोग की योजना शामिल हो। तभी यह निर्णय वास्तव में सामाजिक न्याय और समावेशी विकास का आधार बन सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।