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उप चुनाव नतीजे: विपक्ष के लिए संजीवनी तो भाजपा के लिए आत्ममंथन का समय

Sat, 13 Jul 2024 05:09 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Sat, 13 Jul 2024 05:09 PM IST
सार

पहले चर्चा पश्चिम बंगाल की। यहां चार सीटों पर उप चुनाव हुआ। चार में से तीन सीटों पर पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती थी, जबकि एक सीट तृणमूल कांग्रेस के पास थी। लोकसभा चुनाव की भांति तृणमूल कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन को बरकरार रखा है। तीन सीटें रानाघाट दक्षिण, रायगंज और बागदा भाजपा से छीन ली हैं, जबकि मानिकतला को बरकरार रखने में तृणमूल कांग्रेस कामयाब रही है।

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By election results are a lifesaver for the opposition party and a time for introspection for the BJP
राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : ANI

विस्तार

सात राज्यों की 13 विधानसभा सीटों के उप चुनाव के नतीजे आ गए हैं। 10 सीटें इंडी एलायंस के खाते में गई हैं, जबकि भाजपा को केवल दो और एक निर्दलीय को मिली है। सबसे अधिक घाटा भाजपा को पश्चिम बंगाल में हुआ है। पश्चिम बंगाल के नतीजे यह दर्शा रहे हैं कि जो बढ़त भाजपा को पिछले विधानसभा चुनाव में मिली थी, वो अब खत्म हो गई है।

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उप चुनाव में कांग्रेस ने जोरदार वापसी की है। विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में। कांग्रेस ने न केवल अपनी जमीन को बचाया, बल्कि कुछ बढ़ोतरी भी हासिल की। वैसे तो इन नतीजों से किसी भी राज्य की सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगास लेकिन लोकसभा के बाद इन उप चुनावों पर देश की नजर जरूर थी। निश्चित ही भाजपा के लिए आत्ममंथन का समय है।
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पहले चर्चा पश्चिम बंगाल की। यहां चार सीटों पर उप चुनाव हुआ। चार में से तीन सीटों पर पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती थी, जबकि एक सीट तृणमूल कांग्रेस के पास थी। लोकसभा चुनाव की भांति तृणमूल कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन को बरकरार रखा है। तीन सीटें रानाघाट दक्षिण, रायगंज और बागदा भाजपा से छीन ली हैं, जबकि मानिकतला को बरकरार रखने में तृणमूल कांग्रेस कामयाब रही है।
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लोकसभा चुनाव के बाद हिंसा को लेकर विपक्ष ने तृणमूल कांग्रेस को घेरा था और ममता बनर्जी पर तीखे आक्रमण हुए थे, लेकिन नतीजे बताते हैं कि जनता पर हिंसा को लेकर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ा है। ममता बनर्जी का जलवा बरकरार है।

हिमाचल प्रदेश की हमीरपुर सीट भाजपा ने जीती है, जिस पर पहले निर्दलीय उम्मीदवार का कब्जा था। हिमाचल की बाकी दोनों सीटें देहरा और नलगढ़ कांग्रेस के खाते में गई हैं। यहां भाजपा दूसरे स्थान पर रही है, जबकि यह दोनों सीट पहले निर्दलीय के पास थीं। अभी लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हिमाचल प्रदेश की सभी चारों सीटों पर जीत का परचम लहराया था।

ऐसे में कांग्रेस ने दो सीट जीतकर वापसी की है। हालांकि, लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का ध्यान विधानसभा उप चुनाव पर ही था, क्योंकि कांग्रेस सरकार संकट में आ गई थी। इन नतीजों से कांग्रेस को राहत मिली है।

उत्तराखंड में भी दो सीटों पर उप चुनाव था। हालांकि, यह दोनों  बद्रीनाथ और मंगलौर सीट सत्तारूढ़ भाजपा के पास नहीं थी। कांग्रेस ने बद्रीनाथ सीट पुन: जीत ली है। वैसे, सोशल मीडिया पर इस सीट को लेकर सबसे अधिक चर्चा है।

मंगलौर की सीट को कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी से छीना है। कांग्रेस ने उत्तराखंड में एक सीट की बढ़त बना ली है। बद्रीनाथ सीट को भावनात्मक रूप से देखा जा रहा था। यहां भाजपा ने पूरी ताकत लगाई थी। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, दोनों ऐसे राज्य हैं, जहां अग्निवीर योजना का एक बड़ा मुद्दा है।

बिहार में भाजपा के सहयोगी जनता दल (यू) को झटका लगा है। रूपौली सीट पर जनता दल (यू) के प्रत्याशी की हार हुई है, जबकि यहां से पप्पू यादव समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार जीत गया है। पप्पू यादव ने पिछले दिनों कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी से भी मुलाकात की थी। भले यहां आरजेडी का प्रत्याशी चुनाव लड़ा, लेकिन पप्पू यादव के निर्दलीय उम्मीदवार को इंडी एलायंस का ही एक हिस्सा मानना चाहिए।

तिहाड़ जेल में बंद अरविंद केजरीवाल के लिए जालंधर पश्चिम की सीट एक प्रतिष्ठा का विषय बन गई थी। आम आदमी पार्टी ने इस सीट पर पूरा जोर लगाया हुआ था। हालांकि, यह सीट पहले भी आम आदमी पार्टी के पास ही थी। यहां भाजपा ने दूसरे नंबर पर रहकर यह बताया है कि पंजाब में उसके कदम आगे बढ़ रहे हैं।

मध्य प्रदेश से भाजपा के लिए थोड़ी अच्छी खबर आई, क्योंकि यहां की अमरवाड़ा सीट, जो पहले कांग्रेस के पास थी, उसे पार्टी ने जीत लिया है, यानी राज्य में उसकी सीटों में एक सीट का इजाफा हो गया है। इसी प्रकार तमिलनाडु की विक्रवड़ी सीट को डीएमके ने बरकरार रखा है।

कांग्रेस और इंडी एलायंस के लिए यह उप चुनाव नतीजे संजीवनी का काम करेंगे। विपक्ष को नई धार मिली है। खासकर अक्टूबर में होने जा रहे हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनावों को लेकर विपक्ष निश्चित रूप से उत्साहित होगा। विपक्ष के लिए यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि एकजुट होकर वो भाजपा को हरा सकता है। यही रणनीति आगामी चुनावों में भी देखने को मिलेगी।

भाजपा के लिए निश्चित रूप से आत्ममंथन का समय है। भले यह नतीजे उसकी सरकारों पर बहुत अधिक प्रभाव न डालें, लेकिन कार्यकर्ताओं का मनोबल तो गिरता ही है। जनता के बीच ऐसी धारणा बनती है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी से लोगों का मोहभंग हो रहा है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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