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बजट 2022: सरकार की पोटली से जीएसटी की क्षतिपूर्ति गारंटी गायब

Wed, 02 Feb 2022 02:00 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 02 Feb 2022 02:00 PM IST
सार

कोरोना के बाद केन्द्र की ओर से राज्यों को की जाने वाली क्षतिपूर्ति में जिस तरह की टालबराई हो रही थी उससे राज्य सरकारें पहले से ही आशंकित थीं। कोरोना काल में अपेक्षित कर वसूली न हो पाने के कारण केन्द्र सरकार राज्यों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की किश्तें समय से नहीं दे पा रही है। इसलिए केन्द्र सरकार ने समय से किश्त न देने की स्थिति में राज्यों के समक्ष दो विकल्प रखे हुए हैं, जिनमें एक विकल्प काम चलाने के लिए फिलहाल कर्ज लेने का भी है जिसे बाद में केन्द्र सरकार ने वहन करना है।

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Budget 2022 The GST compensation Guarantee is missing from Nirmala Sitharaman's budget
सीतारमण की बजट की पोटली से जीएसटी की क्षतिपूर्ति गारंटी गायब - फोटो : पीटीआई

विस्तार

वित्त मंत्री सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केन्द्रीय बजट में वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) की क्षतिपूर्ति का उल्लेख न होने से आर्थिक संसाधनों की तंगी झेल रहे उत्तराखण्ड जैसे कई राज्यों की बेचैनी बढ़ गई है। फिलहाल भारत सरकार का जून 2022 तक जीएसटी लागू होने से कर राजस्व की हानि की भरपायी किए जाने की गारंटी है। लेकिन राज्यों की पुरजोर मांग के बावजूद इस गारंटी का केन्द्रीय बजट में कोई उल्लेख नहीं है।

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कर सुधार की दिशा में किए गए इस क्रांतिकारी परिवर्तन के लाभों के साथ कुछ राज्यों के लिए इससे सबसे बड़ी हानि यह है कि जिस राज्य में वस्तु का उत्पादन होगा, उस पर आरोपित कर उसके बजाय उस राज्य को मिलेगा जहां वस्तु की आपूर्ति या खपत हो रही है। अगर केन्द्र सरकार की यह गारंटी नहीं बढ़ी तो जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां आने वाली सरकारों के लिए सिर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। वस्तु की खपत उत्तराखण्ड या मणिपुर जैसे छोटे राज्य में नहीं बल्कि अधिक जनसंख्या वाले धनी राज्यों में ही होती है।

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राज्यों ने वित्तमंत्री से की थी क्षतिपूर्ति अवधि बढ़ाने की मांग

कोरोना के बाद केन्द्र की ओर से राज्यों को की जाने वाली क्षतिपूर्ति में जिस तरह की टालबराई हो रही थी उससे राज्य सरकारें पहले से ही आशंकित थीं। कोरोना काल में अपेक्षित कर वसूली न हो पाने के कारण केन्द्र सरकार राज्यों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की किश्तें समय से नहीं दे पा रही है। इसलिए केन्द्र सरकार ने समय से किश्त न देने की स्थिति में राज्यों के समक्ष दो विकल्प रखे हुए हैं, जिनमें एक विकल्प काम चलाने के लिए फिलहाल कर्ज लेने का भी है जिसे बाद में केन्द्र सरकार ने वहन करना है।

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फिर भी राज्य सरकारें केन्द्र से स्पष्ट गारंटी चाहते थे, इसलिए 30 दिसम्बर 2021 को वित्तमंत्री सीथारमण द्वारा नए साल के बजट पर आयोजित राज्यों के वित्तमंत्रियों की बैठक में कई राज्यों ने जीएसटी की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था अगले 5 सालों तक बढ़ाने की मांग की थी।


इस बैठक में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, राजस्थान के शिक्षामंत्री सुभाष गर्ग, पश्चिम बंगाल की शहरी विकास मंत्री चन्द्रिमा भट्टाचार्य एवं तमिलनाडू के वित्तमंत्री पी. त्यागराज ने इस बजट में जीएसटी की क्षतिपूर्ति की अवधि 5 साल तक बढ़ाने की पुरजोर मांग की थी जो कि पूरी नहीं हुई। उत्तराखण्ड के भाजपाई मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत 2019 में मसूरी में आयोजित हिमालयी राज्यों के सम्मेलन में जीएसटी को उत्तराखण्ड जैसे राज्य के लिए सबसे बड़ा घाटे का सौदा बता चुके थे।


70 साल बाद भाग्य के साथ मध्यरात्रि की मुलाकात

ठीक 14-15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कालजयी भाषण ‘‘ट्रीस्ट विद डेस्टिनी’’ याने कि भाग्य के साथ मुलाकात की तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1 जुलाई 2017 को जब एक देश एक कर के नारे के साथ जीएसटी लागू होने की घोषणा की थी तो देशवासियों में नया उत्साह जागना स्वाभाविक ही था, क्योंकि यह कर सुधारों की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक कदम था।

देशवासियों में खुशी का कारण यह भी था कि इससे पहले एक ही वस्तु जहां से गुजरती थी वहां उस पर कर लगता था जिससे वस्तु महंगी हो जाती थी। बार-बार वस्तुओं को ढोने वाले वाहन कर वसूली के लिये रोके जाते थे जिससे समय की बरबादी के साथ ही भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी रहती थी। लेकिन इन तमाम लाभों के बावजूद इस व्यवस्था से उन राज्यों को बहुत बड़ा झटका लगा जिन्होंने औद्योगीकरण पर भारी खर्च और संसाधन झोंके थे। लेकिन वहां का माल किसी दूसरे राज्यों को जाता था।


घाटे को पाटने के लिए केन्द्र की गारंटी

नई व्यवस्था के तहत कर खपत या आपूर्ति वाले राज्य को मिलता है। इस कर व्यवस्था को लागू करने के लिए भारतीय संविधान में 101 वां संशोधन किया गया था। इस व्यवस्था में चुंगी, सेंट्रल सेल्स टैक्स (सीएसटी), राज्य स्तर के सेल्स टैक्स या वैट, एंट्री टैक्स, लॉटरी टैक्स, स्टैंप ड्यूटी, टेलीकॉम लाइसेंस फी, टर्नओवर टैक्स, बिजली के इस्तेमाल या बिक्री पर लगने वाले टैक्स, सामान के ट्रांसपोटेशन पर लगने वाले टैक्स इत्यादि अनेकों करों के स्थान पर अब यह एक ही कर लागू किया जा रहा है।

यह कर अब भी तीन स्तर पर है। पहला कर राज्य जीएसटी का है जो कि राज्यों में खपत पर है। दूसरा कर सीजीएसटी केन्द्रीय बिक्री कर का है। इसमें उत्पाद शुल्क भी है जिसे केवल केन्द्र वसूलता है। तीसरा कर आइजीएसटी का है जो उस माल पर लगता है जो कि एक राज्य से दूरे राज्य जाता है। इसमें से केन्द्र 42 प्रतिशत राज्य को देता है।

Budget 2022 The GST compensation Guarantee is missing from Nirmala Sitharaman's budget
जीएसटी क्षतिपूर्ति खत्म होने पर उत्तराखण्ड राज्य को करीब 1500 करोड़ रुपये अतिरिक्त जुटाने होंगे। - फोटो : pixabay

उत्पादक राज्य घाटे में और खरीददार लाभ में

संविधान के 101 वें संशोधन से बने नये कानून के तहत जीएसटी की शुरुआत के साथ, उत्पाद शुल्क कानून के समय के पूर्व विनिर्माण-आधारित मॉडल से गंतव्य-आधारित कराधान मॉडल में बदलाव लाया गया। इसका मतलब है कि राजस्व अब उन राज्यों को मिलेगा, जहां वस्तुओं या सेवाओं की खपत होगी। जाहिर था कि यह मॉडल उन राज्यों को पसंद नहीं आया, जिन्होंने अपने अप्रत्यक्ष कर राजस्व को बढ़ाने के लिए विनिर्माण संयंत्रों के निर्माण पर भारी खर्च किया था।

मसलन उत्तराखण्ड जैसे राज्य जहां तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के प्रयासों और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के भरपूर सहयोग से जो औद्योगीकरण हुआ वह अब राज्य के लिये कोई बड़ा लाभकारी नहीं रह गया था। क्योंकि उद्योगों से मिलने वाला उत्पाद शुल्क जो कि केन्द्र वसूल करता था और केन्द्रीय विक्री कर का लाभ उस राज्य को मिलने लगा जिस राज्य में वस्तुओं की खपत हो रही है। उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में खपत ही कहां है?

उत्तराखण्ड के पंतनगर, हरिद्वार और सेलाकुंई जैसे औद्योगिक आस्थानों में औद्योगिक पैकेज और सस्ती बिजली-पानी और अन्य रियायतों का लाभ उठाने के लिए देश के चोटी के औद्योगिक समूह उत्तराखण्ड आ गये। पंजाब और हिमाचल जैसे राज्यों को उत्तराखण्ड के औद्योगीकरण से परेशानी हो रही थी।

ऐसे बड़े उद्योगों के साथ ऐसे उद्योग भी यहां आ गए जो कि उत्पादन कहीं और करते थे मगर पैकेजिंग उत्तराखण्ड में दिखा कर माल की आपूर्ति दूसरे राज्यों में करते थे। ऐसे पैकेजिंग वाले उद्योगों से भी राज्य को पूरा कर लाभ मिलता था। इसलिये राज्य को ऐतराज भी नहीं था। लेकिन अब लगभग 70 हजार करोड़ के कर्ज के बोझ से दबे उत्तराखण्ड राज्य के सम्मुख नई समस्या खड़ी हो गई है।


उत्तराखण्ड को प्रति वर्ष 1500 करोड़ का घाटा

इस रियायत के खत्म होने पर राज्यों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन हाल ही में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पालिसी ने किया है। संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक जीएसटी क्षतिपूर्ति खत्म होने पर उत्तराखण्ड राज्य को करीब 1500 करोड़ रुपये अतिरिक्त जुटाने होंगे। वह भी तब जब राज्य में जीएसटी में विकास दर 14 प्रतिशत तक बनी रहे।

प्रदेश में जीएसटी में संग्रह लगातार कम हो रहा है। उत्तराखण्ड के वित्त विभाग के मुताबिक वर्ष 2019-20 में जीएसटी से 6255.33 करोड़ रुपये के संग्रह का अनुमान लगाया गया था। नवंबर तक कुल 3339 करोड़ रुपये का संग्रह ही किया जा सका।

उत्तराखण्ड ने 15 वें वित्त आयोग से भी क्षतिपूर्ति अवधि बढ़ाने की मांग की थी। वित्त विभाग के मुताबिक अगर यह मांग नहीं मानी जाती तो राज्य के पास कर्ज जैसे स्रोतों से भरपाई करने के अलावा और कोई चारा नहीं है।

 

विनिर्माणकारी राज्यों की समस्याओं को समझते हुए केन्द्र सरकार ने जीएसटी पतिपूर्ति की व्यवस्था की थी। इसके लिए उपकर की व्यवस्था की गई थी। यह जीएसटी उपकर उन राज्यों को पांच साल तक राजस्व में हुए नुकसान की भरपाई करता है। जीएसटी परिषद द्वारा तय किए जाने पर पांच साल की अवधि बढ़ाई जा सकती है। यह उपकर 1 जुलाई 2017 से जीएसटी कानून के साथ लागू हुआ। यह उपकर एक पुल के रूप में कार्य करता है, जो पूर्व अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की समाप्ति पर हुई अंतराल को जोड़ता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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