Budget 2020: आर्थिक मोर्चे पर घिरी सरकार के लिए चुनौतियों से भरा होगा बजट
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राष्ट्रवाद की लहर पर सवार होकर और बड़ा जनसमर्थन हासिल कर पांच और साल के लिए सत्ता में आई मोदी सरकार 2.0 का एक साल पूरा होने के पहले ही आ रहा बजट सरकार की बड़ी अग्नि परीक्षा होगा। चुनाव के वक्त भी बेरोजगारी, मंदी और महंगाई जैसे अहम मुद्दे जनता के बीच राष्ट्रवाद की लहर में हाशिए पर चले गए थे और अब जबकि देश अर्थव्यवस्था के संकट से गुजर रहा है, एक बार फिर नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के विरोध के खिलाफ उभरे राष्ट्रवाद के जोश में है।
दरअसल, यह दुर्भाग्य ही है कि जिस विपक्ष को देश के सामने आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और उद्योगों की बदहाली को लेकर सरकार को घेरने का जिम्मा है, वह शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने के कानून को संविधान के खात्मे का संकट बताकर सरकार पर हमला करके असल मसलों को ठंडे बस्ते में डालने का अवसर सरकार को दे रहा है।
बजट चुनौती भरा, क्या उपाय करेगी सरकार?
पांच साल पहले के चुनावी वादों और पांच सालों के दौरान किए गए बजटीय वादों में से कई महतवपूर्ण मामलों में यह सरकार सफल साबित नहीं हुई है। सार्वजनिक उपक्रमों की बदहाली सबके सामने है।
एयर एंडिया से लेकर बीएसएनल तक के हाल खस्ता हैं। वहां छंटनी और निजीकरण के आसन्न खतरे का कोहराम मचा हुआ है। उद्योग जगत की ओर से भी समय-समय पर निराशा के स्वर साफ सुनाई देते रहते हैं। मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप्स का पिछले बजटों में बोलवाला था, लेकिन वे जमीन स्तर पर कारगर होते नहीं दिखाई दिए।
सरकार के पास सफलता के आंकड़े हैं और विपक्ष के पास सरकार की विफलताओं की फेहिरिस्त है। निराशा भरे सुर उन शख्सियतों की तरफ से भी आए हैं जो इसी सरकार में आर्थिक मामलों में अहम पदों पर रह चुके हैं, जिनमें आरबीआई गर्वनर रहे रघुराम राजन तक शामिल हैं।
बेरोजगारी की दर घटाना बढ़ी चुनाैती
भारत में बेरोजगारी की दर चिंताजनक स्तर 7.1 फीसदी पर पहुंच गई है यानी, ज्यादातर सेक्टरों में लोगों को मिलने वाले रोजगार घट रहे हैं और पहले से रोजगार कर रहे लोग बेरोजगारी का सामना करने हालात से जूझ रहे हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए सालाना करीब सवा करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने की चुनौती सरकार के सामने है। देखना ये है कि इस बजट में ऐसे क्या दीर्घगामी उपाय करेगी कि इस बेरोजगारी के गहराए संकट को धीरे -धीरे ही सही पटरी पर लाया जा सके।
वैश्विक मंदी बनाम भारत के कारण वैश्विक मंदी
पहले यह कहा जाता रहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था की मंदी का कारण वैश्विक मंदी का असर है। कांग्रेस की यूपीए सरकारों के दोनों कार्यकालों में भी यही कहा और माना जाता रहा था। मोदी वन और अब मोदी टू में भी यही कहा जा रहा था कि पूरी दुनिया मंदी की चपेट में हैं, ऐसे में भारत भी इससे अछूता कैसे रह सकता है। फिर भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी झेलने की क्षमता ज्यादा है, यह पहले भी कई दफा साबित हो चुका है। लेकिन ताजा रिपोर्ट्स खासी चौंकाने वाली हैं।
हाल ही में एक रिपोर्ट यह भी आई है कि दुनिया भर में मंदी के जो कारक हैं, उनमें भारत भी एक है। यानी भारत मंदी का शिकार नहीं बल्कि भारत के कारण मंदी हो रही है। हालांकि यह तथ्य सामान्य तौर पर अटपटा लगता है और सरकार भी इसकी तस्दीक नहीं कर रही है, लेकिन 130 करोड़ की आबादी वाले देश की अर्थव्यवस्था का असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ना स्वभाविक ही है। भारत पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थ व्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है लेकिन वास्तविकता उसके अनुकूल फिलहाल नहीं दिख रही है।
उम्मीद की किरण भी है
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा काेष यानी आईएमएफ की मुखिया क्रिस्टालीना जार्जीवा ने बीते शुक्रवार को यह बात कह कर भारत सरकार को कुछ राहत जरूर पहुंचाई कि भारत की आर्थिक सुस्ती अस्थाई है और इसमें जल्द सुधार होने की उम्मीद है।
इधर, ब्लूमबर्ग रिपोर्ट भी उम्मीद जगाने वाली है। लेकिन इस सबसे बड़ी बात यह होगी कि भारत सरकार अपने बजट में सुस्ती को कितना स्वीकार करती है और उससे निपटने के क्या गंभीर उपाय करती है।
इन क्षेत्रों में सरकार को बड़े कदम और असरदार उपाय उठाने होंगे
सरकार ने एक देश एक टैक्स लागू कर वाकई क्रांतिकारी कदम उठाया लेकिन जीएसटी को लेकर उठने वाले सवाल खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं। दूसरी तरफ जीएसटी से होने वाला टैक्स कलेक्शन लक्ष्य से काफी कम हैं। इसकी पूर्ति के लिए सरकार क्या करने वाली है? यह बजट में देखने वाली बात होगी। इस पर कारोबारी जगत से लेकर आम आदमी तक की नजर होगी।
बेरोजगारी से निपटने के उपाय क्या किए जाएंगे? इस पर सबकी नजर होगी, क्योंकि हर साल एक करोड़ नौकरियां देने के वादे पर अमल के बजाय हालात हर सेक्टर में छंटनी के जारी हैं। रोजगार देने की बात को विपक्ष ने जुमले से जोड़कर सरकार के सामने बार बार उठाई लेकिन समस्या का हल होता नहीं दिख रहा है।
सरकार को मंदी से निपटने के लिए लोगों की खर्च करने की क्षमता बढ़ाने के उपाय इस बजट में करने होंगे, इसके लिए पेंशन स्कीम्स की संख्या और उसकी राशि बढ़ाने के उपाय शामिल हो सकते हैं।
डूबने के कगार पर पहुंच रहे उद्यमों को संजीवन देने की योजनाएं भी बजट में आ सकती हैं। सरकार बीते करीब दो साल में कई उपाय कर चुकी है लेकिन उनका असर उतना नहीं हुआ जितना सरकार उम्मीद कर रही थी। सरकार को इस बार के बजट में अपनी प्राथमिकताएं नए सिरे से तय करनी पड़ सकती हैं।
सरकार को आर्थिक मंदी या सुस्ती जो भी कहा जाए उसे बजट में किस तरह स्वीकार करना है और कैसे निपटने की तैयारी दिखानी है, इस पर न केवल पूरे देश की बल्कि दुनिया भर की नजर होगी।
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