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वामपंथियों के लाल रंग में मोदी सरकार का बहीखाता

Sanjiv Pandeyसंजीव पांडेय Updated Fri, 05 Jul 2019 05:33 PM IST
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण - फोटो : ANI
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वर्तमान सरकार परंपरा से चल रहे नामों में परिवर्तन कर कुछ न कुछ नया संदेश जरूर देती है। इस बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट का नाम बदल दिया। अब यह बहीखाता कहलाएगा। यही नहीं निर्मला सीतारमण वामपंथियों के पसंद वाले लाल रंग के कपड़े में ही बजट दस्तावेज लेकर संसद में पहुंची। सीतारमण ने परंपरागत तरीके से ही मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश कर दिया। बजट में क्या नया होगा, क्या ढर्रे के हिसाब से होगा इसका अंदाजा लोगों को पहले से ही था। लेकिन लोगों को कुछ न कुछ नया तो मिला। कम से कम बहीखाते के माध्यम से  सरकार परंपरा और संस्कृति का सम्मान करती दिखी। क्योंकि बजट शब्द वैसे भी गुलामी का प्रतीक है। हालांकि, नाम बदलने और लाल रंग के कपड़े में  बजट दस्तावेज लाने से देश की जनता के हालातों में कितना परिवर्तन आएगा यह समय ही बताएगा।   
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वैश्विक आर्थिक मंदी और ट्रेड वार के बीच बजट
वैश्विक आर्थिक मंदी और चीन-अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वार के बीच निर्मला सीतारमण ने बजट पेश किया है। कहीं न कहीं भारत भी आर्थिक मंदी से प्रभावित है। जीएसटी का कलेक्शन घटा है। बजट पेश होने से ठीक पहले रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर उर्जित पटेल ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खराब सेहत को लेकर खुलासे किए थे। हालांकि, इसके लिए उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार की भी खिंचाई की। वहीं, नरेंद्र मोदी सरकार के ही पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भारत के जीडीपी ग्रोथ रेट के दावे को लेकर सवाल उठाए थे। उनका दावा था कि  भारत सरकार अपने वास्तविक जीडीपी ग्रोथ रेट से 2.5 प्रतिशत बता रही है।

निश्चित तौर पर जनता को इन खुलासों से पता चल गया था कि जो वित्तीय हालात के आंकड़े सरकार पेश कर रही है, वो सारा कुछ सच नहीं है। राजस्व संग्रहण में कमी का दबाव वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दवारा पेश  बजट में साफ दिखता है। बजट में मध्य वर्ग और आम जनता पर भार डाला गया है। पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज डयूटी और इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस के रुप में 1-1 रुपये लगाए जाने का सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा। इससे किसान औऱ मध्य वर्ग ही प्रभावित होगा। किसान डीजल का इस्तेमाल करता है। डीजल पहले ही खासा महंगा है। वहीं, पेट्रोल का खासा इस्तेमाल देश का मध्य वर्ग करता है।

हालांकि सरकार की अपनी मजबूरी है। सरकार आंकड़ों में खेल कर रही है। लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और है। जिस तरह से जीएसटी कलेक्शन में कमी आयी है, उससे सरकार की चिंता बढ़ी है। सरकार ने 2019-20 में 13.71 लाख करोड़ रुपये जीएसटी कलेक्शन का लक्ष्य रखा है। पर जून 2019 में जीएसटी संग्रहण में अप्रैल के मुकाबले कमी आयी। जून में जीएसटी कलेक्शन 1 लाख करोड़ रुपये के नीचे आ गया। अप्रैल 2019 में जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ से थोडा उपर था। फरवरी 2019 में भी जीएसटी कलेक्शन 97 हजार करोड़ रुपये था। कही न कहीं सरकार को आशंका है कि जीएसटी कलेक्शन में कमी आ सकती। इसकी भरपाई पेट्रोल औऱ डीजल पर सेस लगाकर की गई है।

 
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