ब्रिटेन का सियासी संकट: अपने ही फैसलों और लोगों से महज छह हफ्तों में हार गईं लिज़ ट्रस
आखिर क्या वजह रही कि अपनी ही पार्टी के भीतर बोरिस जॉनसन के बाद नेता चुनी गई लिज ट्रस पर से पार्टी का भरोसा इतनी जल्दी उठ गया? अब ये सवाल सतह पर तैर रहा है कि क्या भारतीय मूल के ऋषि सुनक लिज ट्रस के बाद ब्रिटेन की बागडोर संभालेंगे? क्या कंजर्वेटिव पार्टी उन्हें इस बार अपना नेता चुन लेगी?
आखिर क्या वजह रही कि अपनी ही पार्टी के भीतर बोरिस जॉनसन के बाद नेता चुनी गई लिज ट्रस पर से पार्टी का भरोसा इतनी जल्दी उठ गया? अब ये सवाल सतह पर तैर रहा है कि क्या भारतीय मूल के ऋषि सुनक लिज ट्रस के बाद ब्रिटेन की बागडोर संभालेंगे? क्या कंजर्वेटिव पार्टी उन्हें इस बार अपना नेता चुन लेगी?
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एक ज़माने में राजशाही की खिलाफत करने वाली और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़कर छात्र राजनीति में सक्रिय रहने वाली लिज ट्रस जब कंजर्वेटिव पार्टी में शामिल हुईं और अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं की बदौलत प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचीं तो लगा था कि शायद ब्रिटेन की तस्वीर कुछ बदलेगी। लेकिन सत्ता संभालने के चंद दिनों बाद से ही जिस तरह उनकी उल्टी गिनती शुरु हो गई थी, उससे ब्रिटेन की सियासत में लगातार हलचल मची रही। महज 44 दिनों में जिस तरह लिज ट्रस ने इस्तीफे की घोषणा की उससे वहां की सबसे मजबूत कंजर्वेटिव पार्टी की भीतरी हालत का भी खुलासा होता है।
आखिर क्या वजह रही कि अपनी ही पार्टी के भीतर बोरिस जॉनसन के बाद नेता चुनी गई लिज ट्रस पर से पार्टी का भरोसा इतनी जल्दी उठ गया? आखिर क्यों 2019 में भारी बहुमत से एक बार फिर सत्ता पर काबिज होने वाली कंजर्वेटिव पार्टी के भीतरी अंतर्विरोध इस हद तक सामने आने लगे कि लिज ट्रस के अपने ही मंत्री उनका साथ छोड़ने लगे? मिनी बजट में लिए गए टैक्स कटौती के फैसले से उठे असंतोष के बाद इसे फटाफट वापस लेना पड़ा और वित्त मंत्री और गृह मंत्री तक को इस्तीफा देना पड़ा?
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अब ये सवाल सतह पर तैर रहा है कि क्या भारतीय मूल के ऋषि सुनक लिज ट्रस के बाद ब्रिटेन की बागडोर संभालेंगे? क्या कंजर्वेटिव पार्टी उन्हें इस बार अपना नेता चुन लेगी? बोरिस जॉनसन के इस्तीफे के बाद से सुनक का नाम चर्चा में रहा है और वह सबसे मजबूत दावेदारों में रहे भी थे, लेकिन लिज ने उन्हें करीब 21 हजार वोटों से हराकर बाजी जीत ली थी।
दरअसल, युवावस्था में लिज ट्रस जिस राजशाही का विरोध करती थीं, उन्हीं महारानी ने उन्हें प्रधानमंत्री घोषित किया और इसके चंद ही दिनों बाद ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने दुनिया को अलविदा कह दिया। अब बेशक वहां प्रिंस चार्ल्स तृतीय ने राजशाही का ताज पहन लिया हो, लेकिन महारानी के बाद अब राजशाही का वह रूतबा ब्रिटेन में नजर नहीं आता। जाहिर है नया प्रधानमंत्री तय करने का फैसला कंजर्वेटिव पार्टी के सदस्यों को ही लेना है और उसपर परंपरागत तरीके से राजशाही की मुहर भर लगनी है।
ब्रिटेन और आर्थिक हालात
दरअसल, कोरोना काल के बाद जिस तरह दुनिया भर में अर्थव्यवस्था का हाल खराब है, उससे ब्रिटेन समेत पश्चिम के देश खुद को संभाल नहीं पा रहे हैं। इसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध के इतना लंबा खिंचने से हालात और बिगड़ गए हैं। ऐसे में जॉनसन ने 2019 में प्रधानमंत्री बनते ही जिस तरह ब्रेक्जिट समझौते पर मुहर लगाई और 2020 के जनवरी में ब्रिटेन को यूरोपीय यूनियन (ईयू) से अलग कर लिया, उसका स्वागत भी हुआ और विरोध भी।
जाहिर है ये वो वक्त था जब दुनिया कोरोना के सबसे भयानक दौर से गुजर रही थी। कंजर्वेटिव पार्टी 2016 से ही इसके लिए लोगों का भरोसा जीतने में लगी थी कि ब्रिटेन को ईयू के दबाव में नहीं रहना है। तब टेरीजा मे प्रधानमंत्री थीं और बोरिस जॉनसन उनकी सरकार में विदेश मंत्री। प्रधानमंत्री बनने के बाद कई तरह के विवादों में घिरे जॉनसन को इस साल सितंबर में आखिरकार कुर्सी छोड़नी पड़ी और लिज ट्रस बड़े बड़े वादे के साथ प्रधानमंत्री बन गईं।
बचपन में मार्गरेट थैचर को अपना आदर्श मानने वाली और उनकी भूमिका निभाने वाली लिज ट्रस के माता-पिता वामपंथी विचारों के रहे, शायद इसीलिए पहले वो राजशाही का विरोध करती रहीं, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ रहीं, लेकिन बाद में थैचर की पार्टी ही उन्हें पसंद आई। सत्ता की चाह में कई दफा चुनाव लड़ीं और हारीं लेकिन डेविड कैमरन की बदौलत लिज पहली बार 2010 में साउथ वेस्ट नॉरफॉक सुरक्षित सीट से जीत कर सांसद बनीं। और आखिरकार पार्टी ने पीएम भी बनाया लेकिन यहां के बिगड़े हालात को संभालने में नाकाम होकर उन्होंने खुद ही हार मान ली। पार्टी के भीतर से भी लगातार ये दबाव बन रहा था कि उनसे सरकार नहीं चल पा रही। माना जा रहा है कि इसके पीछे ऋषि सुनक के समर्थकों ने तो दबाव बनाया ही, विपक्षी लेबर पार्टी को भी बार बार मौका मिला।
ब्रिटेन की सियासत भारत से अलग रही है, लेकिन कंजर्वेटिव पार्टी की लगातार जीत और बोरिस जॉनसन की लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें वहां के ‘मोदी’ के तौर पर भी प्रचारित किया गया। ये माना गया था कि 2024 तक जॉनसन बने रहेंगे और उसके बाद भी पार्टी को जीत दिलाएंगे, लेकिन जिस तरह नरेन्द्र मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को संकट के दौर में भी संभाला और हालात बिगड़ने नहीं दिए, उसकी तुलना में बोरिस जॉनसन कहीं नहीं ठहरे और अपने ही विवादों में उलझकर रह गए।
जाहिर है ऐसे वक्त में ब्रिटेन को एक मजबूत और दीर्घकालिक सोच वाले नेतृत्व की जरूरत है जो अपने देश के लिए सोच समझ कर फैसले ले, आम लोगों के हितों के बारे में सोचते हुए आर्थिक सुधार की योजनाएं बनाए और दुनिया के तमाम देशों से अपने रिश्ते और मजबूत कर सके।
जाहिर है ऐसा तभी हो पाएगा जब उसमें पार्टी के भीतरी संकट को दूर करने के साथ अपने सहयोगियों के साथ मिल बैठकर फैसले लेने और उनका भरोसा जीतने की क्षमता हो। ऐसा अगर ऋषि सुनक कर सकेंगे तो जाहिर है बहुमत उनके पक्ष में होगा। फिलहाल ब्रिटेन के लिए आने वाले कुछ दिन अभी हलचल भरे होंगे और सबको इंतजार है कि अब देश की बागडोर कौन संभालेगा।