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बॉलीवुड वही लेकिन बदल गई मुंबई, रुपहले पर्दे पर दिख रहे अलग रंग

Wed, 08 Dec 2021 02:01 PM IST
Rameez Raza Ansari रमीज अली
Updated Wed, 08 Dec 2021 02:01 PM IST
सार

बंबई मुंबई बन गई और सिनेमा में बीते दशक कुछ ऐसे बदलाव हुए जो दिखे भले नहीं लेकिन महसूस जरूर किए गए। उन बदलावों में से एक है बॉलीवुड से मुंबई का धीरे-धीरे गायब हो जाना। क्या आपने भी ये बदलाव महसूस किया? क्या आपने भी ये महसूस किया की अब नायक और नायिका जुहू-चौपाटी पर हाथो में हाथ डाल कर ढलते सूरज के साए तले एक दूसरे में नहीं खोते?

क्या अब आप भी महसूस करने लगे हैं कि मुंबई की सड़कों की रानी काली-पीली टैक्सी अब पर्दे पर कम दिखाई देती है? क्या आपको पता चला कि हीरो की ठेठ मुम्बईया भाषा-शैली की जगह अब पंजाबी, दिल्ली और हरयाणवी की मिश्रित भाषा शैली ने ले ली है?

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Bollywood films and Mumbai now Mumbai is less visible as a background in Bollywood films
बॉलीवुड की फिल्मों में मुंबई, जो पहले बंबई और अंग्रेजीदां लोगों के लिए बॉम्बे हुआ करती थी, फिल्मों में सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं बल्कि एक किरदार भी हुआ करती थी। - फोटो : Istock

विस्तार

आप भले ही मुंबई में पैदा न हुए हों या मुंबई में रहें ना हों, और पैदा होना और रहना तो दूर की बात है हो सकता है आप ने वास्तविकता में मुंबई कभी देखा भी ना हो। फिर भी आप जुहू-चौपाटी, गेटवे ऑफ इंडिया, बांद्रा, कुर्ला जैसी जगहों से परिचित होंगे और मुंबई शहर की संस्कृति और रहन-सहन आपको बहुत जाने-पहचाने से लगते होंगे। और हों भी क्यों ना? बॉलीवुड ने हिन्दी फिल्मों के जरिए मुंबई की लगभग हर चर्चित जगहों से हमारा परिचय जो करा चुका है।

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बॉलीवुड की फिल्मों में मुंबई, जो पहले बंबई और अंग्रेजीदां लोगों के लिए बॉम्बे हुआ करती थी, फिल्मों में सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं बल्कि एक किरदार भी हुआ करती थी। बंबई का बाबू, बॉम्बे टू गोआ जैसी फिल्में हों या मशहूर अभिनेता जॉनी वॉकर पर फिल्माया गाना ये है बॉम्बे मेरी जान... बंबई कई सदाबहार गानों के बोल और क्लासिक फिल्मों के शीर्षक का हिस्सा भी रही है।

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याद कीजिए साठ के रूमानी दशक में हीरो-हीरोइन की पहली मुलाकात मुंबई की गलियों में कहीं होती थी। वहीं सत्तर के एंग्री यंग मैन वाले दशक में हीरो जमाने से तंग आकर जब घर छोड़कर भागता था तो उसका ठिकाना मुंबई शहर ही बनता था। मुंबई ही उसे जमाने से लड़ना और जीतना सिखाती थी। 80 के डिस्को युग में गरीब मगर खुद्दार हीरो रईस हीरोइन को अपनी ठेठ मुम्बईया भाषा बोलकर इम्प्रेस कर लेता था। फिर दौर बदला। 

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बंबई मुंबई बन गई और सिनेमा में बीते दशक कुछ ऐसे बदलाव हुए जो दिखे भले नहीं लेकिन महसूस जरूर किए गए। उन बदलावों में से एक है बॉलीवुड से मुंबई का धीरे-धीरे गायब हो जाना। क्या आपने भी ये बदलाव महसूस किया? क्या आपने भी ये महसूस किया की अब नायक और नायिका जुहू-चौपाटी पर हाथो में हाथ डाल कर ढलते सूरज के साए तले एक दूसरे में नहीं खोते? क्या अब आप भी महसूस करने लगे हैं कि मुंबई की सड़कों की रानी काली-पीली टैक्सी अब पर्दे पर कम दिखाई देती है? क्या आपको पता चला कि हीरो की ठेठ मुम्बईया भाषा-शैली की जगह अब पंजाबी, दिल्ली और हरयाणवी की मिश्रित भाषा शैली ने ले ली है?

Bollywood films and Mumbai now Mumbai is less visible as a background in Bollywood films
2010 के बाद आई फिल्मों में पर्दे पर मुंबई दर्शन दुर्लभ हो चले थे। मुम्बईया सिनेमा का दायरा विस्तृत हो चला था। - फोटो : Pixabay

ये बदलाव कोई रातों-रात नहीं हुए। नब्बे के दशक के मध्य में ही यशराज की कालजयी फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को याद कीजिए। फिल्म पंजाब से निकल कर आपको यूरोप के सैर पर ले जाती है और वापस पंजाब पर आकर ही खत्म हो जाती है। ऐसा नहीं है कि दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे के बाद मुंबई रूपहले पर्दे से अचानक गायब हो गया लेकिन हां बॉलीवुड की पृष्ठभूमि अब सिर्फ मुंबई तक ही सीमित नहीं रह गई। 1998 में आई रामगोपाल वर्मा की सत्या ने एक अलग ही मुंबई के दर्शन कराए जिसकी गलियां रूमानियत नहीं बल्कि हिंसा से भरी हुई थीं। 

नई सदी का आगमन नई सोच से भरे हुए युवा निर्देशकों का भी आगमन था। 2001 में आई नवोदित निर्देशक फरहान अख्तर की फिल्म दिल चाहता है ने दर्शकों को एक नई मुंबई से रूबरू कराया। जिसमें रहने वाले इंग्लिश गाने सुनते हैं, छुट्टी मनाने मर्सिडीज से गोवा रोड ट्रिप पर जाते हैं। अब पृष्ठभूमि के तौर पर मुंबई अनिवार्य नहीं थी। हालांकि बीच-बीच में कंपनी, टैक्सी नंबर 9211, वेक अप सिड जैसी फिल्में भी आईं जिनमे मुंबई सिर्फ एक पृष्ठभूमि भर नही बल्कि कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी थी।

   

2010 के बाद आई फिल्मों में पर्दे पर मुंबई दर्शन दुर्लभ हो चले थे। मुम्बईया सिनेमा का दायरा विस्तृत हो चला था। सिनेमा का रंग-रूप बदल रहा था। अब ऑफ बीट और मसाला फिल्मों के बीच फासला कम हो रहा था। फिल्मकारों में कुछ अलग और प्रायोगिक सिनेमा बनाने की हिम्मत आ चुकी थी और नई और प्रायोगिक कहानियों में पृष्ठभूमि कहानी के हिसाब से ही होती हैं। 

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महाराष्ट्र के अलावा भी कई राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों मे फिल्म मेकिंग को प्रोत्साहित कर रही हैं। - फोटो : Istock

दौर बदला, कहानियां और उनके कहने के तरीके बदले तो हर कहानी की पृष्ठभूमि भला मुंबई कैसे रह पाती? जब छोटे शहर की पृष्ठभूमि पर बनीं फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर पैसे छापने लगीं तो तो इस नए-नए ट्रेंड ने और जोर पकड़ा। फिल्म निर्माता मुंबई के इतर भी कहानियों की संभावनाएं तलाशने लगे।

नए दौर के फिल्म मेकर्स नई कहानियों की तलाश में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की ओर मुड़े तो मुंबई मानो पीछे ही छूट गई। कुछ फिल्में तो ऐसी भी आईं जिनकी शुरुआत तो मुंबई से हुई लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती गई मुंबई पीछे छूट गई। बीते सालों में ब्लैकमेल, अंधाधुन जैसी कुछेक फिल्में ही आईं जो शुरू से अंत तक मुंबई के ही इर्द-गिर्द घूमती रहीं। और ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ कहानियों मे आए बदलाव की वजह से ऐसा हुआ। कहानियों में बदलाव के अलावा कई और बाहरी कारक भी हैं जिसने रूपहले पर्दे पर मुंबई की उपस्थिति को कम करने में भूमिका निभाई।
 

महाराष्ट्र के अलावा भी कई राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों मे फिल्म मेकिंग को प्रोत्साहित कर रही हैं। फिल्मकारों को अब महाराष्ट्र के बाहर भी अब वैनिटी वैन, जूनियर आर्टिस्ट और शूटिंग से जुड़ीं अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं तो अब फिल्मकार भी सिर्फ मुंबई में शूटिंग करने को बाध्य नहीं रह गए। ये भी एक कारण है फिल्मकारों का मुंबई से मोहभंग होने का। 


अब जब पर्दे पर मुंबई नहीं दिखती तो कुछ खालीपन सा महसूस होता है। हिन्दी फिल्मों में मुंबई को हम सबने इतना देखा की कतरा-कतरा मुंबई हम सब सिनेप्रेमियो के दिल में उतर गई। और अब बॉलीवुड फिल्मों में मुंबई का ना होना या कम होते जाना कुछ अखरता है।

अब दिन जुहू बीच पर नहीं ढलते. ना ही किरदार गेटवे ऑफ इंडिया के सामने कबूतरों को दाना खिलाते समय आखों ही आंखों में एक दूसरे से जज्बात साझा करते हैं। पर्दे पर काली-पीली टैक्सियों की जगह इम्पोर्टेड गाड़ियों ने ले ली है। फिल्में अभी भी बन रही हैं। कहानियां अब भी गढ़ी जाती हैं, लेकिन फिर भी कुछ तो कमी महसूस होती है. एक शहर की कमी जो बस एक शहर नहीं बल्कि एक मुकम्मल किरदार हुआ करती थी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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