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नेपाल के इस रवैए पर भारत क्या करे?
Updated Sat, 15 Sep 2018 07:37 PM IST
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Nepal and Indian Army
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पुणे में बिम्सटेक देशों ने साझा सैनिक अभ्यास किया। ऐन वक्त पर नेपाल ने ठेंगा दिखा दिया। इतना ही नहीं नेपाल अब चीन के चेंगदू में सत्रह सितंबर से साझा सैनिक अभ्यास करेगा। यह चीन के साथ उसका दूसरा अभ्यास है और इसे सागरमाथा फ्रेंडशिप-2 नाम दिया गया है। भारत ने इस पर अपनी टिप्पणी में नेपाल की अंदरूनी वजह बताई।
लेकिन जानकार मानते हैं कि अब नेपाल ने अपनी अलग दुनिया बसाने का फैसला कर लिया है। भारतीय विदेश नीति के नियंताओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भारत के जुड़वा भाई जैसा यह देश भी कुट्टी की राह पर चल पड़ेगा। अपनी भौगोलिक स्थिति तो वह नहीं बदल सकता लेकिन अब हम अपनी दोस्ती पर गर्व करने की स्थिति में भी नहीं रहे। नेपाल के लोग जिसे अपना बड़ा घर मानते हैं ,वहां आकर नेपाल की सेना हमारी सेना के साथ अभ्यास करने तक के लिए तैयार नहीं हुई। वही सेना ,जो भारत के संरक्षण में तैयार हुई है। श्रीलंका, मालदीव और पाकिस्तान के बाद नेपाल भी एक बेगानी राह पर चल पड़ा है।
31 जुलाई 1950 को नेपाल के साथ शांति सहयोग संधि को आज याद करने का कोई अर्थ नहीं है। लेकिन जब आप दोनों देशों के संबंधों में आई दरार में झांकने का प्रयास करेंगे तो यकीनन इस ऐतिहासिक दस्तावेज के बाद 68 साल के सफर की पड़ताल करनी होगी। सदियों से धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से नेपाल हिंदुस्तान के साथ कुछ इस तरह घुल मिल गया है कि कभी भी नेपाल का नाम लेते ही परदेस का भाव नही जगता। हर भारतीय काठमांडू और पशुपतिनाथ जाना चाहता है।
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नेपाल का हर नागरिक बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम की यात्रा करके अपने को धन्य समझता है। नेपाल के लोग भारत में और हिंदुस्तान के नागरिक नेपाल में विदेशी नहीं माने जाते। वे आते हैं जाते हैं, कारोबार करते हैं, संपत्ति खरीदते हैं, रोजगार पाते हैं और एक दूसरे का दिल जीतते हैं।
शांति संधि के बाद दोनों राष्ट्रों के रिश्तों को औपचारिक गहराई मिली। विदेश और रक्षा नीति में आपसी गाढ़े सहयोग का वादा किया गया। इस समझौते की पहली परीक्षा दो साल के भीतर ही हो गई ,जब चीन की मदद से वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने तख्तापलट का षड्यंत्र किया। इसे नाकाम करने के लिए मिलिटरी मिशन भेजा गया। मिशन की अगुआई मेजर जनरल रैंक के एक अधिकारी ने की थी। बीस आला फौजी अफसर भी साथ गए और नेपाल में उस विद्रोह को कुचल दिया गया।
इसके बाद यह संख्या बढ़कर भारतीय फौजियों की संख्या 197 तक जा पहुंची। इसके बाद नेपाल चीन से आशंकित हो गया। संधि के मुताबिक नेपाल अपनी सेना को ताकतवर बनाने के लिए भारत से सैनिक साजो सामान खरीद सकता था, जिस पर कोई टैक्स का प्रावधान नहीं था। नेपाल और भारत दोनों के लिए यह एक चेतावनी थी। भारत के लिए इसलिए कि ठीक इन्हीं दिनों तेलंगाना इलाके में भी ऐसी ही कार्रवाई का सामना करना पड़ा था।
इसके बारे में भारत सरकार के पास ठोस सबूत थे कि चीन की मदद से वहां हिंसक क्रांति की तैयारियां चल रहीं थीं। भारत की खुफिया एजेंसियों ने आगाह किया तो सरकार के कान खड़े हुए। उन दिनों गुलजारी लाल नंदा गृह मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे थे। उनके निर्देश पर सुरक्षा बलों ने त्वरित कार्रवाई की और इस विद्रोह की कोशिश को विफल कर दिया गया। इस ऑपरेशन के बारे में गुलजारी लाल नंदा ने आकाशवाणी पर राष्ट्र के नाम आपात संदेश प्रसारण किया था।
अफसोस! दोनों देशों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। चीन की गुपचुप कोशिशें चलती रहीं। हम बेखबर रहे। हालांकि नेपाल शांति और दोस्ती की संधि के मुताबिक भारत से हथियार लेता रहा था मगर उसमें एक प्रावधान यह भी था कि अगर नेपाल चाहे तो भारत से चर्चा के बाद अन्य देशों से भी हथियार खरीद सकता है। दस बरस पहले अमेरिका से नेपाल ने हथियार खरीदे थे लेकिन नेपाल की सेना ने यह तथ्य कभी खुलकर नहीं बताया। वैसे नेपाल की सेना के साथ एक शानदार परंपरा और रही है, जो भारत की किसी देश के साथ नहीं है।
यह परंपरा एक दूसरे के सेनाध्यक्षों को अपने देश में सर्वोच्च सम्मान देने की है। हमारे सेनाध्यक्ष नेपाल की फौज के मानद जनरल होते हैं और नेपाल के सेनाध्यक्ष हमारे यहां के। मगर हाल के बरसों में इस परंपरा में भी शिथिलता आई है। नेपाल और भारत की सेनाओं ने ऑपरेशन सूर्य किरण जैसे अभियानों के जरिए अपने संयुक्त सैनिक अभियान भी चलाए हैं। मगर ओली के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल खुलकर चीन की गोद में खेल रहा है। ओली वाम समर्थक हैं। नेपाल का यह रवैया भारत के लिए अनेक आशंकाओं और चिंताओं को जन्म देता है।
खतरा अनेक स्तरों पर बढ़ गया है? नेपाली गोरखे भारतीय सेना का मजबूत हिस्सा रहे हैं। वे भारतीय सेना की कमजोरियों, रणनीतिक कौशल, युद्धक तरीकों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। चीन के लिए नेपाल की सेना में सेंध लगाने से अनेक फायदे हो सकते हैं। दूसरी बात बिम्सटेक देशों की पहली जॉइंट मिलिटरी एक्सरसाइज करने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नेपाल ने मंजूर किया था। अभ्यास में श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और थाईलैंड शामिल हुए। नेपाल के ठीक एक दिन पहले मना करने से भारत की अपने अन्य पड़ोसियों के बीच किरकिरी हुई है।
एक विशाल और विराट देश होने के नाते भारत का अपना भी संकोच और बड़प्पन है। मुश्किल यह है कि अन्य पड़ोसी देश भी नेपाल के रवैये को भारत विरोधी मान सकते हैं। म्यांमार और भूटान इस दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। ये देश यह भी जानते हैं कि सांस्कृतिक नजरिए से भारत के सर्वाधिक करीब नेपाल रहा है। जब नेपाल चीन के प्रभाव में आ गया तो अन्य देशों को भारत किस तरह संरक्षण दे पाएगा? यह सवाल आने वाले दिनों में इन देशों की विदेश नीति में झलकेगा।
कह सकते हैं कि एक समय भारतीय सेनाध्यक्ष विपिन रावत ने एक साथ दो मोर्चों पर लड़ने का बयान देकर कूटनीतिक मूर्खता दिखाई थी। उसने भारत की नींद लंबे समय तक उड़ा दी है। चीन की भारत को चारों दिशाओं से घेरने की योजना नेपाल को अपने खेमे में शामिल करने के साथ ही काफी हद तक पूरी हो चुकी है। क्या हिंदुस्तान के हम चुनाव और उत्सव प्रेमी लोग अब इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़कर भारतीय हितों की हिफाजत कर सकेंगे?
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लेकिन जानकार मानते हैं कि अब नेपाल ने अपनी अलग दुनिया बसाने का फैसला कर लिया है। भारतीय विदेश नीति के नियंताओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भारत के जुड़वा भाई जैसा यह देश भी कुट्टी की राह पर चल पड़ेगा। अपनी भौगोलिक स्थिति तो वह नहीं बदल सकता लेकिन अब हम अपनी दोस्ती पर गर्व करने की स्थिति में भी नहीं रहे। नेपाल के लोग जिसे अपना बड़ा घर मानते हैं ,वहां आकर नेपाल की सेना हमारी सेना के साथ अभ्यास करने तक के लिए तैयार नहीं हुई। वही सेना ,जो भारत के संरक्षण में तैयार हुई है। श्रीलंका, मालदीव और पाकिस्तान के बाद नेपाल भी एक बेगानी राह पर चल पड़ा है।
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31 जुलाई 1950 को नेपाल के साथ शांति सहयोग संधि को आज याद करने का कोई अर्थ नहीं है। लेकिन जब आप दोनों देशों के संबंधों में आई दरार में झांकने का प्रयास करेंगे तो यकीनन इस ऐतिहासिक दस्तावेज के बाद 68 साल के सफर की पड़ताल करनी होगी। सदियों से धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से नेपाल हिंदुस्तान के साथ कुछ इस तरह घुल मिल गया है कि कभी भी नेपाल का नाम लेते ही परदेस का भाव नही जगता। हर भारतीय काठमांडू और पशुपतिनाथ जाना चाहता है।
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नेपाल का हर नागरिक बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम की यात्रा करके अपने को धन्य समझता है। नेपाल के लोग भारत में और हिंदुस्तान के नागरिक नेपाल में विदेशी नहीं माने जाते। वे आते हैं जाते हैं, कारोबार करते हैं, संपत्ति खरीदते हैं, रोजगार पाते हैं और एक दूसरे का दिल जीतते हैं।
शांति संधि के बाद दोनों राष्ट्रों के रिश्तों को औपचारिक गहराई मिली। विदेश और रक्षा नीति में आपसी गाढ़े सहयोग का वादा किया गया। इस समझौते की पहली परीक्षा दो साल के भीतर ही हो गई ,जब चीन की मदद से वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने तख्तापलट का षड्यंत्र किया। इसे नाकाम करने के लिए मिलिटरी मिशन भेजा गया। मिशन की अगुआई मेजर जनरल रैंक के एक अधिकारी ने की थी। बीस आला फौजी अफसर भी साथ गए और नेपाल में उस विद्रोह को कुचल दिया गया।
इसके बाद यह संख्या बढ़कर भारतीय फौजियों की संख्या 197 तक जा पहुंची। इसके बाद नेपाल चीन से आशंकित हो गया। संधि के मुताबिक नेपाल अपनी सेना को ताकतवर बनाने के लिए भारत से सैनिक साजो सामान खरीद सकता था, जिस पर कोई टैक्स का प्रावधान नहीं था। नेपाल और भारत दोनों के लिए यह एक चेतावनी थी। भारत के लिए इसलिए कि ठीक इन्हीं दिनों तेलंगाना इलाके में भी ऐसी ही कार्रवाई का सामना करना पड़ा था।
इसके बारे में भारत सरकार के पास ठोस सबूत थे कि चीन की मदद से वहां हिंसक क्रांति की तैयारियां चल रहीं थीं। भारत की खुफिया एजेंसियों ने आगाह किया तो सरकार के कान खड़े हुए। उन दिनों गुलजारी लाल नंदा गृह मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे थे। उनके निर्देश पर सुरक्षा बलों ने त्वरित कार्रवाई की और इस विद्रोह की कोशिश को विफल कर दिया गया। इस ऑपरेशन के बारे में गुलजारी लाल नंदा ने आकाशवाणी पर राष्ट्र के नाम आपात संदेश प्रसारण किया था।
अफसोस! दोनों देशों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। चीन की गुपचुप कोशिशें चलती रहीं। हम बेखबर रहे। हालांकि नेपाल शांति और दोस्ती की संधि के मुताबिक भारत से हथियार लेता रहा था मगर उसमें एक प्रावधान यह भी था कि अगर नेपाल चाहे तो भारत से चर्चा के बाद अन्य देशों से भी हथियार खरीद सकता है। दस बरस पहले अमेरिका से नेपाल ने हथियार खरीदे थे लेकिन नेपाल की सेना ने यह तथ्य कभी खुलकर नहीं बताया। वैसे नेपाल की सेना के साथ एक शानदार परंपरा और रही है, जो भारत की किसी देश के साथ नहीं है।
यह परंपरा एक दूसरे के सेनाध्यक्षों को अपने देश में सर्वोच्च सम्मान देने की है। हमारे सेनाध्यक्ष नेपाल की फौज के मानद जनरल होते हैं और नेपाल के सेनाध्यक्ष हमारे यहां के। मगर हाल के बरसों में इस परंपरा में भी शिथिलता आई है। नेपाल और भारत की सेनाओं ने ऑपरेशन सूर्य किरण जैसे अभियानों के जरिए अपने संयुक्त सैनिक अभियान भी चलाए हैं। मगर ओली के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल खुलकर चीन की गोद में खेल रहा है। ओली वाम समर्थक हैं। नेपाल का यह रवैया भारत के लिए अनेक आशंकाओं और चिंताओं को जन्म देता है।
खतरा अनेक स्तरों पर बढ़ गया है? नेपाली गोरखे भारतीय सेना का मजबूत हिस्सा रहे हैं। वे भारतीय सेना की कमजोरियों, रणनीतिक कौशल, युद्धक तरीकों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। चीन के लिए नेपाल की सेना में सेंध लगाने से अनेक फायदे हो सकते हैं। दूसरी बात बिम्सटेक देशों की पहली जॉइंट मिलिटरी एक्सरसाइज करने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नेपाल ने मंजूर किया था। अभ्यास में श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार और थाईलैंड शामिल हुए। नेपाल के ठीक एक दिन पहले मना करने से भारत की अपने अन्य पड़ोसियों के बीच किरकिरी हुई है।
एक विशाल और विराट देश होने के नाते भारत का अपना भी संकोच और बड़प्पन है। मुश्किल यह है कि अन्य पड़ोसी देश भी नेपाल के रवैये को भारत विरोधी मान सकते हैं। म्यांमार और भूटान इस दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। ये देश यह भी जानते हैं कि सांस्कृतिक नजरिए से भारत के सर्वाधिक करीब नेपाल रहा है। जब नेपाल चीन के प्रभाव में आ गया तो अन्य देशों को भारत किस तरह संरक्षण दे पाएगा? यह सवाल आने वाले दिनों में इन देशों की विदेश नीति में झलकेगा।
कह सकते हैं कि एक समय भारतीय सेनाध्यक्ष विपिन रावत ने एक साथ दो मोर्चों पर लड़ने का बयान देकर कूटनीतिक मूर्खता दिखाई थी। उसने भारत की नींद लंबे समय तक उड़ा दी है। चीन की भारत को चारों दिशाओं से घेरने की योजना नेपाल को अपने खेमे में शामिल करने के साथ ही काफी हद तक पूरी हो चुकी है। क्या हिंदुस्तान के हम चुनाव और उत्सव प्रेमी लोग अब इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़कर भारतीय हितों की हिफाजत कर सकेंगे?