भाजपा की सीएए रैलियां और मिस्डकॉल अभियान क्या पहले साल में ही चुनाव की तैयारी है़ ?
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संसद के दोनों सदनों में बहुमत से पारित और कानून बन चुके नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में देश की सत्ताधारी दल भाजपा की पूरे देश में रैलियां, मिस्डकॉल अभियान और कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर लोगों को सीएए समझाने को आखिर किस रूप में देखा जाए? इससे पहले न भाजपा ने और न ही कांग्रेस समेत किसी दल ने संसद में पारित कानून का इस तरह समर्थन और प्रचार किया है। इतना ही नहीं भाजपा ने इस अभियान में एनआरसी को लेकर समर्थन जुटाने की बात शामिल की हई है।
आखिर क्या कर रही है भाजपा?
क्या अब तक विरोध के लिए विपक्ष के लोकतांत्रिक हथियार रहे रैलियों, अभियानों और प्रदर्शनों को खुद सत्ता पक्ष भी अपना हथियार बना रहा है? पूरे देश में खासकर भाजपा के गढ़ और असर वाले राज्यों में भाजपा कार्यकर्ता उसी तरह सक्रिय होकर इन अभियानों में शरीक किए जा रहे हैं, मानों लोकसभा का चुनाव का वक्त आने वाला हो, जबकि पांच साल सरकार चलाने के बाद और अधिक प्रचंड बहुमत हासिल किए भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अभी महज करीब आठ माह ही पूरे हुए हैं और उसे एनडीए के बिना ही अकेले पूर्ण बहुमत हासिल है अगले करीब सवा चार साल के लिए।
इन अभियानों में उन पांच राज्यों में जहां बीते एक साल के दौरान भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी है, कार्यकर्ता ज्यादा सक्रिय दिख रहे हैं, हालांकि विधानसभा चुनाव में हार या सत्ता गंवाने के बावजूद वहां के मतदाताओं ने लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की सरकार की वापसी के लिए भरपूर समर्थन दिया।
क्या भाजपा की यह सक्रियता इस बात का संकेत है कि उसकी मोदी 2.0 की बुनियाद सरकार के कामकाज से ज्यादा पाकिस्तान पर सर्जिकल और एयर स्ट्राइक को मिला जनसमर्थन और इसकी खिलाफत में प्रकारांतर से पाकिस्तान का समर्थन करते दिख रहे विपक्ष के प्रति नाराजगी पर तैयार हुई है।
कई मुद्दों पर घिरी है सरकार
आर्थिक हालात, बेरोजगारी और अन्य कई मुद्दों पर मोदी सरकार का पहला कार्यकाल उतना चमकदार नहीं था। सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद गठबंधन धर्म नहीं निभा पाने के कारण महाराष्ट्र में और चुनाव पूर्व गठबंधन कायम नहीं रख पाने के चलते झारखंड में सत्ता गवांकर दूसरे नंबर की पार्टी बन जाने के बाद भाजपा को अब दिल्ली, पश्चिम बंगाल और बिहार के विधानसभा चुनावों में जाना है। तो क्या नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन के अभियान और एनआरसी को ना के बावजूद पार्टी की हां के अभियान इन विधानसभा चुनावों के लिए हैं?
इसका जवाब झारखंड में तो भाजपा के लिए नकारात्मक ही रहा, हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने वहां चुनाव अभियान में सीएए को ही जोर-शोर से जनता के सामने रखा था। लेकिन ऐसा लगता है कि जनता स्थानीय स्तर पर प्रदेश की भाजपा सरकारों और उसके चेहरे यानी मुख्यमंत्रियाें को सबक सिखाना चाहती थी, जैसा कि छत्तीसगढ, मप्र, राजस्थान मेंं हो चुका था। तो क्या भाजपा बंगाल, दिल्ली और बिहार में राष्ट्रीय मुद्दों को अहमियत देकर एक और गलती की तरफ अग्रसर है?
कांग्रेस और वामदल भी चुनावी मोड में या वापसी के लिए संघर्ष में!
नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के साथ एनपीआर की भी खिलाफत की जो मुहिम कांग्रेस और वामदलों ने अपने तमाम संगठनों के साथ मुस्लिम संगठनों की जुगलबंदी सी बनाकर शुरू हुई और हिंसक रूप में भाजपा के संगठनों के साथ दो-दो हाथ की मुद्रा से कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन गई।
कांग्रेस की सीएबी पर संसद के दोनों सदनों में बहस को देखकर ऐसा लगा था कि उसका शीर्ष नेतृत्व 370 के खात्मे के वक्त की ही तरह इस दफा भी मौन ही है। सदन में बतौर सांसद और बतौर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने करीब करीब मौन ही साधे रखा था। लेकिन सीएबी के पारित होकर सीएए बनते ही सोनिया गांधी ने सदन के बाहर उसके खिलाफ बिगुल बजा दिया, उससे साफ लगता है कि कांग्रेस अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में उतर रही है, क्योंकि महाराष्ट्र और झारखंड में वह सरकार में भले शामिल हो वह दोनों ही जगह जूनियर पार्टनर है।
महाराष्ट्र में तो तीसरे नंबर पर है, कर्नाटक में सियासी नाटक के कई अंकों के बाद विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ही विजेता बनकर उभरी। पश्चिम बंगाल और बिहार में भी वह जूनियर पार्टनर ही बनी रहेगी, यह दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है और यह कि दिल्ली चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के ही बीच होना तय है। जिन राज्यों में भाजपा के हाथ से सत्ता छीनकर कांग्रेस सरकार में आई उन मप्र, छग और राजस्थान के मुख्यमंत्रियाें ने खुलकर सीएए का विरोध कर जता दिया है कि भले संविधानिक संकट के हालात बन जाएं, कांग्रेस अब अपने अस्तित्व के लिए किसी भी हद तक जाएगी। इसमें राज्य सरकारें जाने का खतरा भी है।
इसी तरह का खतरा उठाकर तब तीन राज्य सरकारें खोकर भाजपा ने अयोध्या मामले में अपनी आगे ताकतवर होने की बुनियाद रखी थी 1992 में। करीब 22 साल बाद 2014 में भाजपा ने अपने बल पर पूर्ण बहुमत हासिल करने का लक्ष्य हासिल कर ही लिया था। ऐसा लगता है कि कांग्रेस अब फिर पूर्ण बहुमत वाली केंद्र सरकार बनाने लायक बनने के लिए भाजपा से सीधे सीधे दो-दो हाथ करने की रणनीति पर चलने के लिए उतर गई है।
इस पूरे मामले में कांग्रेस के लिए वामदलों और मुस्लिम दलों और संगठनों की भाजपा विरोधी ताकत एक उत्प्रेरक की भूमिका में दिख रही है। मुंबई के फिल्मी सितारों से लेकर जेएनयू के ताजा विवाद और विरोध प्रदर्शन इसकी एक कड़ी हैं। दूसरी तरफ भाजपा भी ऐसा लगता है कि आरएसएस के वाम विरोधी एजेंडे पर अब पूरी ताकत से अमल करने के मूड में हैं। इस पूरी सियासी घटनाक्रम में देश के असल मुद्दे फिलहाल नेपथ्य में जाते दिख रहे हैं, जो देश और जनता और लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं हैं।
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