भाजपा स्थापना दिवस 2021: प्रयोग और परंपरा के बीच एक राजनीतिक दल की यात्रा
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41 वर्ष की आयु हो गई है भारतीय जनता पार्टी की। मुंबई के पहले पार्टी अधिवेशन में अटल जी ने अध्यक्ष के रूप में कहा था कि "अंधियारा छटेगा सूरज निकलेगा,कमल खिलेगा"। आज भारत की संसदीय राजनीति में चारों तरफ कमल खिल रहा है। कभी बामन बनियों और बाजार वालों (मतलब शहरी इलाके) की पार्टी रही भाजपा आज अखिल भारतीय प्रभाव के चरम पर है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के शोर में बीजेपी का स्थापना दिवस कुछ अहम सवालों के साथ विमर्श को आमंत्रित करता है।
बीजेपी की यात्रा और भारतीय राजनीति
सवाल यह कि क्या बीजेपी का अभ्युदय केवल एक चुनावी हार जीत से जुड़ा घटनाक्रम है? हर दल के जीवन मे उतार-चढ़ाव आते है इसलिए क्या बीजेपी का चरम भी समय के साथ उतार पर आ जाएगा? इस बुनियादी सवाल के ईमानदार विश्लेषण में एक साथ कई पहलू छिपे है, बशर्ते संसदीय राजनीति के उन पहलुओं को पकड़ने की कोशिश की जाए जो स्वाभाविक शासक दल और उसके थिंक टैंक की कार्यनीति से सीधे जुड़े रहे हैं।
बंगाल, सहित सभी पांच राज्यों में भाजपा चुनाव हार भी जाए तब भी यह सुस्पष्ट है कि भारत एक नए संसदीय मॉडल की राह पकड़ चुका है औऱ यह रास्ता है बहुसंख्यकवाद का। यानी बीजेपी ने शासन औऱ राजनीति को महज 41 साल में एक नए मॉडल में परिवर्तित कर दिया है जिसे 60 साल में कांग्रेस ने खड़ा किया था।
बेशक दूर से यह मॉडल 2014 के बाद से ही नजर आता है, लेकिन इसकी बुनियाद 95 साल पहले रखी जा चुकी थी जब एक कांग्रेसी डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार भारत के स्वत्व केंद्रित सामाजिकी को भारत के भविष्य के रूप में देख रहे थे।
बीजेपी और राष्ट्रवाद
आरएसएस यानी संघ उस बुनियाद का सामाजिक,सांस्कृतिक,नाम है जिसे आज के पॉलिटिकल पंडित मोदी-शाह की सोशल इंजीनियरिंग कहकर अपनी सतही समझ को अभिव्यक्त करते हैं। असल में बीजेपी का राजनीतिक शिखर महज एक पड़ाव है उस सुदीर्ध परियोजना का जिसे संघ ने अपने सतत संघर्ष ,बलिदान और तपस्या से खड़ा किया है।
सवाल यह है कि महज 7 साल से भी कम के दौर में गैर बीजेपीवाद की राष्ट्रीय मांग क्यों बेचारगी के साथ मुखर होने लगी,स्वाभाविक शासक परिवार के मुखिया अमेरिका से हस्तक्षेप तक की मांग पर उतर आए, जबकि गैर कांग्रेसवाद को फलीभूत होने में 60 साल का समय लगा।
भारत का भविष्य अब सेक्युलरिज्म या अल्पसंख्यकवाद से नही बहुसंख्यकवाद से ही निर्धारित होगा, इसलिए अगर निकट भविष्य में बीजेपी चुनावी शिकस्त भी खाती है तब भी यह परियोजना सफलतापूर्वक आगे बढ़ेगी।
क्यों और कैसे पावरफुल हुई बीजेपी?
बीजेपी का यह राजनीतिक भय आखिर किसकी दम पर खड़ा हुआ है? बुद्धिजीवियों की सुनें तो सत्ता के कथित दुरुपयोग से,साम्प्रदायिक राजनीति,और धनबल से। लेकिन सीबीआई,ईडी,इनकम टैक्स तो महज जमीनी हकीकत को झुठलाने का प्रयास है। हकीकत यह है कि बीजेपी ने भारत की संसदीय राजनीति को 70 साल बाद सही अर्थों में समावेशी और समाजवादी बनाने का काम भी किया है। यह नया मॉडल बहुसंख्यक भावनाओं पर मजबूती से आकर खड़ा हो गया है। यह भी तथ्य है कि भारत के साथ रागात्मक रिश्ता संसदीय व्यवस्था में अगर किसी ने खड़ा किया तो वह बीजेपी ही है और इसका श्रेय जाता है उसकी मातृ संस्था संघ को।
60 साल तक अल्पसंख्यकवाद भारत की उदारमना बहुसंख्यक आबादी की छाती को मानो रौंदते हुए खड़ा रहा। समाजवाद और सामाजिक न्याय की अवधारणाओं को ध्यान से देखिए कैसे सिंडिकेट निर्मित हुए इन चुनावी अखाड़ों में। सैफई,पाटलिपुत्र जैसे तमाम समाजवादी और फैमिली सिंडिकेटस को बीजेपी ने केवल 2014 में आकर तोड़ दिया है यह मानना भी बचकाना तर्क ही है।
चीन और पाकिस्तान के मुद्दे भी उस बड़ी आबादी को बीजेपी से निरन्तर जोड़ने में सफल है जिसे एक साॅफ्ट स्टेट के रूप में भारत की छवि नश्तर की तरह चुभती रही है। इंदिरा गांधी को जिन्होंने नही देखा उन्हें मोदी एक डायनेमिक पीएम ही नजर आते है और आज इस पीढ़ी की औसत आयु 36 साल है।
दुनिया के सबसे युवा देश के लोग राहुल गांधी की अनमनी राजनीति को सिर्फ परिवार के नाम पर ढोने को तैयार नही है। जेपी,लोहिया,कांशीराम औऱ कर्पूरी ठाकुर के नाम से खड़ी की गई वैकल्पिक विरासत भी इसलिए खारिज प्रायः नजर आती है क्योंकि यह विकल्प केवल कुछ परिवारों औऱ जातियों के राजसी वैभव पर आकर खत्म हो गया। बीजेपी ने करीने से इस नवसामन्ती समाजवाद को अपने राजनीतिक कौशल से हटा लिया है।
बहुसंख्यकवाद और बीजेपी
मप्र,उप्र,आसाम,हरियाणा,गुजरात,राजस्थान,छतीसगढ़,महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पार्टी की नई पीढ़ी को ध्यान से देखने की जरूरत है। यहां जिस नेतृत्व को विकसित किया गया है वह आम परिवार और उन जातियों को सत्ता एवं संगठन में भागीदारी देता है जो संख्याबल के बाबजूद राजनीतिक विमर्श और निर्णयन से बाहर रहे है। यानी जाति की राजनीति को समावेशी जातीय मॉडल से भाजपा ने रिप्लेस कर दिया है।
बंगाल और आसाम में पार्टी का जनाधार बामन,बनिये या ठाकुर नही बना रहे है बल्कि आदिवासी औऱ दलितों ने खड़ा किया है। हिंदी पट्टी में आज पिछड़ी जातियां उसके झंडे के नीचे खड़ी है। यह नही भूलना चाहिए कि देश के प्रधानमंत्री भी एक पिछड़ी जाति से आते है। द्विज के परकोटे में पिछड़ी औऱ दलित जातियों को समायोजित करने का राजनीतिक कौशल 70 साल में बीजेपी से बेहतर कोई भी अन्य दल नही कर पाया है।
नजीर के तौर पर मप्र में 16 साल से सत्ता चलाने का जिम्मा तीन ओबीसी मुख्यमंत्री के पास ही है। जाहिर है बीजेपी ने चुनावी राजनीति को एक प्रयोगधर्मिता पर खड़ा किया है और सतत् सांगठनिक ताकत ने इसे सफलतापूर्वक लागू भी करा लिया। वैचारिकी पर खड़े संगठन के बल पर बीजेपी का चुनावी ढलान भी शायद ही कांग्रेस की तरह शून्यता पर कभी जा पाए क्योंकि यहां परिवारशाही नही वंचित, पिछड़े समूह पार्टी के नए ट्रस्टी बनते जा रहे हैं।
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