पक्षियों की दुनिया और मेरी बालकनी, एक संसार जो मोहक है..!
मुझे याद है कि बचपन में ग्रामीण क्षेत्र के अपने पुश्तैनी मकान के इर्द-गिर्द न जाने मैंने कितने पशु-पक्षी देखें होंगे। लेकिन दिन ब दिन बढ़ते शहरीकरण और प्रदूषण के कारण कई पक्षी पलायन करते जा रहे हैं और कुछ तो विलुप्त होने के कगार पर हैंं। क़स्बों और शहरों के बालकनी से गौरैया का ग़ायब होना तीव्र शहरीकरण का कुप्रभाव ही तो है।
ख़ैर, बचपन का प्रकृति-प्रेम मेरे अंदर आज भी ज़िंदा है और आधुनिक शहरी जीवन में यह प्रेम ’बर्ड वॉचिंग और वाइल्डलाइफ़ फ़ोटोग्राफ़ी’ का रूप ले चुका है। चूंंकि काँक्रीट के जंगल में इस शौक़ को पूरा करना मुमकिन नहीं है, इसलिए मैं फ़ुरसत निकाल कर दिल्ली के आसपास के खेत-खलिहान, झील-तालाब, पार्क, जंगल, आदि के चक्कर लगाता रहता हूंं।
इसी साल मार्च में, कोविड-19 नामक एक बला ने, हमसब के सामान्य जीवन को पटरी से उतार कर एक किनारे रख दिया। हम लोग एक वैश्विक लॉकडाउन में अपने अपने घरों में बंद हो गए, साथ ही सब कुछ बंद हो गया। मुझे और मेरे दोस्तों को इस बात बहुत निराशा हुई क्योंकि काम-काज के साथ साथ बर्ड-वॉचिंग की सारी योजनाएंं विफल हो गई। अब घर की बालकनी ही एक ऐसी जगह बची थी जहांं से बाहरी दुनिया को निहारा जा सकता था।
मेरे बालकनी के ठीक सामने की ख़ाली जगह में पीपल, नीम, आम, अमरूद, गुलमोहर और अमलतास के पेड़ लगे हैंं। मैं पहले भी अपने घर की बालकनी पर, सुबह-शाम ताज़ी हवा में सांंस लेने आ जाता था। इस दौरान मुझे मैना, कबूतर, कौवा, ब्लैक काइट और रोज़-रिंगड तोता, आदि अक्सर दिख जाते थे। लॉकडाउन के बाद तो बालकनी में घंटों बिताना अब एक मजबूरी थी, लेकिन मुझे कहा पता था कि यह मजबूरी मुझे ‘बालकनी बर्डिंग’ की दिलचस्प दुनिया में ले जाएगी!
एक शाम मैं अपनी बालकनी में खड़ा चाय पी रहा था, तभी आसमान में पक्षियों का एक झुंड एक साथ कलाबाज़ी करते हुए सामने से गुज़रा, ये रोज़ी स्टर्लिंग का एक छोटा झुंड था। यह पक्षी हवा ने अपनी सामूहिक कलाबाज़ी और लयबद्ध उड़ान के किए जाना जाता है। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि रोज़ी स्टर्लिंग, मेरे बालकनी से, मैंने तुरंत अपना दूरबीन और कैमरा निकल लाया जो लगभग एक महीने से बंद पड़ा था।
ध्यान से देखने पर मुझे अपने बालकनी के साथ लगे पेड़ों पर लगभग एक दर्जन रोज़ी स्टर्लिंग मिलें। रोजी स्टर्लिग छोटे आकार का प्रवासी पंछी है, जो सर्दियों में भारत आते हैं। अमूमन ये कीटभक्षी होते हैं लेकिन प्रवास के दौरान ये फल और बेर भी खा लेते है। अप्रैल महीने में पीपल पर लगने वाले बेर ने शायद इन्हें आमंत्रित किया होगा और मुझे अपने बालकनी से इस सुंदर पक्षी को निहारने का भरपूर मौक़ा मिला।
अब क्या था, मैं सुबह शाम नियम से दूरबीन और कैमरा लगा कर बालकोनी बर्डिंग में अपना समय बिताने लगा। इस दौरान कई ऐसे पक्षी दिखाई दिए जो पहले नहीं दिखते थे। लॉकडाउन के दौरान शहर की आबो-हवा साफ हुई, मनुष्य की दखलअंदाजी कम हुई और कुदरत अपनी ख़ूबसूरती दिखाने लगा। शायद कोविड महामारी के द्वारा प्रकृति वन्यजीवों के लिए वो स्थान ख़ाली करा रही थी जिस पर मानव ने क़ब्ज़ा कर रखा है।
दूसरा दिलचस्प दृश्य कोयल और कौवों के खेल को देखना था। कोयल अपने मधुर ध्वनि के अलावा ब्रूड पारासीटिस्म या नीड परजीविता के लिए भी जाना जाता है, जिसका मतलब है अपने अंडे और बच्चों का देखभाल स्वयं न करके दूसरे से करवाना।
कोयल को अमूमन हम सुन तो पाते हैंं लेकिन देखना थोड़ा मुश्किल होता है, क्योंकि ये चालक पक्षी कौवों को मूर्ख बना कर अपने अंडे उनके घोंसले में रख कर फ़रार हो जाते है। मैंने देखा की कैसे नर कोयल कैसे ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ निकाल कर, डरा-धमका कर, कौए को घोंसला छोड़ कर अपना पीछा करने को मजबूर करता है।
मौक़ा मिलते ही मादा कोयल अपना अंडा कौए के घोसले में रख आती है। कौए के घोसले में अपना एक अंडा रखने के बाद मादा कोयल बहुत चालाकी और बेरहमी से कौवे के एक अंडे को अपनी चोंच में दबाकर दूर फेंक आती है। पक्षियों के इस व्यवहार को देखना और समझना किसी हिंदी फ़िल्म से कम नहीं था।
कुछ ऐसेे भी पक्षी हैं जो बेहद शर्मीली और डरपोक क़िस्म के होतेे हैं। ऐसी ही एक पक्षी है येलो फ़ुटेड ग्रीन पिजन या हरियल। हरे पंख और पीले पैर वाला यह खूबसूरत कबूतर महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी भी है। मुझे लगा कि लॉकडाउन के दौरान यह पक्षी थोड़ी निडर हो गया है जिस कारण मैं इस पक्षी को बेहद क़रीब से निहार पाया। इन पक्षियों का एक जोड़ा अगर किसी डाल पर बैठा हो तो उस डाल पर पूरा हक़ जताते है और किसी अन्य हरियल को नहीं आने देते है।
अभी कुछ ही दिन पहले बालकनी बर्डिंग के दौरान, मैंने व्हाइट थ्रोटेड किंगफ़िशर या श्वेतकण्ठ कौड़िल्ला जोड़े को अपने बच्चे को खाना खिलाते, उड़ने और शिकार करने के गुर सिखाते हुए देखा। कितना सुखद और सुंदर दृश्य था एक पूरे पक्षी परिवार को एक साथ चहचहाते और क्रीड़ा करते देखना। शाम होते ही जंगल बैबलर या सात भाई पक्षी का पूरा समूह आ जाता है और जम कर शोर मचाते हैं। दिन दोपहर कभी भी ब्राउन-हेडेड बारबेट की तेज पुकार कमरे तक सुनाई देती है। अब तो इन पक्षियों को अपने बालकनी गार्डन में बुलाने के लिए मैंने पपीते के टुकड़े, फलों के छिलके और दाना-पानी भी डालने भी शुरू किए है।
मार्च के अंतिम दिनों से बालकनी बर्डिंग की शुरुआती हुई जो आज भी जारी है, लॉकडाउन की बोरियत और ऊब अब पक्षियों के इंतज़ार में बदल गई है। अब तो कई अन्य खूबसूरत पक्षी भी दिखने लगे है, जिन्हें देखने कभी मैं कई किलोमीटर की यात्रा करता था, पैदल ख़ाक छानता था तथा घंटों इंतज़ार करता था। सनबर्ड या शकरीखोरा, इंडियन व्हाइट आई, रेड वेंटेड बुलबुल, ओरीएंटेल मैग्पाई रॉबिन या दहियर, रूफूस ट्रीपाई या महलत, शिकरा आदि अब रोज़ दिखते हैं, मेरी बालकनी से..!
लेखक सिविल सेवा परीक्षा के लिए 'विज्ञान और पर्यावरण' के शिक्षक हैं। इसके अलावा एक शौकिया पक्षी द्रष्टा और वन्यजीव फोटोग्राफर हैं।
यह श्रंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।