रंग-बिरंगी आशाएं: पक्षियों के सुंदर संसार को भीतर बसाना होगा
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बारिश के बादलों की बनी मुलायम काली रजाई से अभी-अभी बाहर निकला हुआ नन्हा-सा सूरज और कहीं दूर से शांत सुबह को चीरती-सी आती हुई पपीहे (कॉमन हॉक कक्कू) की आवाज। खिड़की खोल के देखों तो सूरज की किरणों को अपने हरे पंखों पर लेके करतब दिखाते पतरिंगे (बी ईटर) और पेड़ों की शाखाओं पर फुदकती गिलहरियों और तितलियों के साथ नाचते, उड़ते सनबर्ड्स की चहचहाट।
यह वर्णन तो किसी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी में बने जंगल लॉज के आंगन का लग रहा है। है ना? पर नहीं है। यह वर्णन है मेरे घर के आंगन का। मैं वैसे तो अर्बन एरिया में रहती हूं पर यहां पेड़ कुछ कम नहीं हैं और जहां पेड़ वहां पक्षी तो होंगे ही।
मुझे यकीन है कि आप सभी जहां भी रहते होंगे वहां आपने कभी न कभी एकाद मैना या गौरेया तो देखी ही होगी। आप में से कुछ लोगों ने तो खास कर पक्षियों को देखने के लिए जंगल, उद्यानों की भी सैर की होगी। पर आज मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताना चाहूंगी जो पहले मेरे इस पक्षी निरीक्षण की हॉबी को समय की बर्बादी कहा करती थी और अब वह खुद इन्हीं पक्षियों को देखते नहीं थकती हैं। वो है मेरी मां।
मैं बतौर एक पक्षी निरीक्षक हमेशा मां को नए-नए पक्षियों के बारे में बताया करती थीं और उसपे मेरी मां मुझसे एक आम सवाल पूछा करती थी क्या मिलता है तुम्हें ये पक्षी देखकर? पर आज मेरी मां खुद हमारे घर के आसपास आमतौर पर पाए जाने वाले पक्षियों के बारे में जानकारी लेने के लिए उत्सुक रहती है।
अब आप पूछेंगे की ये उलटी गंगा कैसे बहने लग गई। तो ये बदलाव आया है पांडेमिक की वजह से, हम सब घर पर बैठे हैं और वक्त मानों ठहर-सा गया है। तो अब जब मेरी मां को कुछ खाली वक्त मिला तो उन्होंने आसपास के पेड़ो से आती आवाजें सुनना शुरू कर दिया। यही नहीं उन्होंने तो पक्षियों के रंग, रूप, आकार पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया और अब तो उन्होंने इन सब की मानो जैसे लत लग गई है।
अब जब भी वह किसी नए पक्षी का बड़े उत्साह के साथ वर्णन करने लगती हैं, तो कभी-कभी उन्हें चिढ़ाने के लिए मैं उनसे वही सवाल पूछती हूं कि क्या मिलता हैं तुम्हें ये पक्षी वगैरह देखकर? पर मां तो आखिर मां है, उसने मुझे इस सवाल का भी जवाब दे ही दिया।
मां कहती हैंं कि ये पक्षी न सिर्फ उनकी आंखों को बल्कि उनके मन को भी शांत करते हैं। ये पक्षी देखकर उन्हें मन की शांति मिलती है, जो इस पांडेमिक ने जैसे चुरा ही ली है।
पहले अपने-अपने कामों में व्यस्त होने के कारण मैं भी बुलबुल या रॉबिन जैसे हमारे घर या बालकनी को अपना घर समझने वाले शहरी पक्षियों को नजरअंदाज कर देती थीं। पर अब जाकर जब समय ने हमें घरों में बंद कर रखा है तो मुझे और मेरे जैसे कई और लोगों को यही पक्षी रोज अपनी मीठी आवाज से रिझाने का काम कर रहे हैं।
पास आकर हमें आजादी का अनुभव करा रहे हैं। शहर में भी पक्षियों की कमी नहीं होती बस अगर हम अपनी आंखें खुली रखें और प्रकृति के इन खूबसूरत जीवों की दुनिया में रूचि रखें तो सीधी-साधी जिंदगी भी बड़ी ही जादू भरी और रोचक बन जाती है।
जितना आनंद मुझे जंगली रास्तो पर भटकते हुए पक्षी देखने में मिलता है उतना ही आनंद उतनी ही सुकून और शांति का अनुभव...
आज कल मेरी बालकनी जैसे मुझे किसी जंगल की याद दिलाती है। कभी छोटा बसंत (कॉपरस्मिथ बार्बेट) अपनी टक-टक से सुस्त दोपहर को संगीतमय करता है तो कभी किंगफिशर अपनी किलकिल से पूरा परिसर गुंजित कर देता है।
मैंने घर बैठे न जाने कितना वक्त नन्ही मुनिया को हरी घास की पट्टी लेकर उड़ते हुए देखने में या सनबर्ड को घोंंसले के लिए मकड़ी के जाले जमा करते देखने में व्यतीत किया है और एक पक्षी है जिसे देखकर मेरा दिल मानों खुशी से उछल पड़ता है।
जो अपनी चक-चक की आवाज से मन में उमंग भर देता है वह है नाचन या चकदील, यह एक बड़ी ही चंचल चिड़िया है जब भी आती है अपने सिटकारी वाले गाने और पंखे जैसी पूंछ के साथ नाच से दिल खुश कर देती है।
मुझे याद है वह एक बरसाती दिन। बारिश की बूूंदों ने हमारे घर के पीछे वाली कॉन्क्रीट फर्श पर एक छिछले गड्ढे में पानी भर दिया था जो कि वैसे तो बड़ा ही खराब दृश्य होता है, पर नाचन ने ये होने न दिया।
जैसे ही बारिश रुकी मुझे सुनाई दी वही चक-चक की चिरपरिचित आवाज और जब मैंने उस आवाज का उगम ढूंढा तो मुझे मिली खुशी से अपनी पूंछ उठाकर फुदकती नाचती गड्ढे में अपने पंख गीले करती हुई नाचन जिस पर बारिश के बाद नहाए हुए सूरज की छोटी से किरण अपना पीला रंग मल रही थी। ऐसे अद्भुत दृश्य के बाद भला कौन अपने आंगन को जंगल से कम आंके।
जितना आनंद मुझे जंगली रास्तोंं पर भटकते हुए पक्षी देखने में मिलता है उतना ही आनंद उतनी ही सुकून और शांति का अनुभव मुझे बालकनी बर्डिंग ने भी दिया है। यह तो जाहिर-सी बात है कि इस परेशानी भरे समय में जब सारा जग ही परिस्थिति से जूझ रहा है तब हमें सब से ज्यादा जरूरत है अपने मन का संतुलन बनाए रखने की।
इस पेंडेमिक ने मुझे पक्षियों के बारे में बहुत कुछ सिखाया है और पक्षियों ने नई सुबहों के बारे में। किसी ने सही ही तो कहा है आशा एक पंखोंवाला पक्षी है। मुझे लगता है बालकनी बर्डिंग जैसी आसान चीज ने मुझे उन्ही आशा के पक्षियों से मिलवाया है। अगर आप को भी इन तकलीफों से बाहर निकलकर कुछ रंगबिरंगी उड़ती आशांएं देखनी हो तो बस दूरबीन उठाइए, बालकनी में जाइए या खिड़की खोल दीजिए।
लेखिका हर्षदा कुलकर्णी पक्षी प्रेमी तथा एक स्वयं-शिक्षित पक्षी निरीक्षक हैं। खुद एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर होने के साथ-साथ वह प्रकृति विषयक ब्लॉग तथा कविता लेखन में भी रुचि रखती हैं।
यह श्रंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।
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