लॉकडाउन की शाम, पक्षियों के नाम
इस लॉकडाउन ने सभी के जीवन में बहुत सारे बदलाव लाए हैं, कुछ अच्छे तो कुछ बुरे। मेरे परिवार की दिनचर्या में भी परिवर्तन आया, हम सभी अब आधे घंटे की जगह शाम का सारा वक्त छत पर ही बिताते हैं। मेरे पापा तो अब अपने बगीचे में ही सारा समय व्यतीत करते हैं। मेरे पापा का एक बहुत ही सुन्दर बगीचा है जो कहा जा सकता है उनका तीसरा बच्चा है। इस बगीचे में कई प्रकार के पक्षी आते हैं और कई बार पापा मुझे फोन पर बताते थे कि आज मैंने इस रंग का पक्षी देखा तो कल उस रंग का। लॉकडाउन की वजह से सभी की तरह मुझे भी काफी समय अपने घर ग्वालियर में रहने को मिला, जिसके चलते मेरे पापा की दिनचर्या में एक नई रुचि जुड़ गई है, जिसकी शुरुआत कुछ इस तरह हुई।
एक दिन मेरे पापा ने मुझे आवाज लगाई, बेटा जरा देखना तो यह कौन सी चिड़िया है, बड़े देर से अपने घर में जो बैम्बू है उस पर बैठी हुई है, वैसे तो कई बार देखा है इसे, पर आज तो कुछ ज्यादा ही खुश लग रही है। ऊपर आकर मैंने देखा और बोला पापा यह इंडियन रॉबिन है। पापा ने वो नाम याद ही कर लिया और रोज मुझे बोलने लगे आज रॉबिन यहां बैठी थी तो कल वहां। फिर एक दिन एक और चिड़िया दिखी जो आकार में इंडियन रॉबिन जैसे ही दिखती थी, पर पापा को लगा यह रंग में कुछ अलग है। उन्होंने फिर मुझसे पूछा यह क्या है, तब मैंने बोला यह ओरिएण्टल मैगपाई रॉबिन है, तो पापा थोड़े असमंजस में पड़ गए। लेकिन अगले दिन सुबह में यह देख के अचंभित हो गए, जब दोनों को एक साथ देख के पापा ने मुझे पहचान कराई और बोले यह जो सफेद लाइन है ना इससे में मैगपाई को पहचान जाता हूं।
इसके बाद से यह हमारा रोज का कार्यक्रम बन गया, रोज दो-तीन विभिन्न प्रजातियों के पक्षी आते और हम उन्हें पहचानते। जब कोई नया पक्षी आता तो पापा के चेहरे की चमक और बढ़ जाती यह सोच के कि आज कुछ नया सीखने को मिलेगा। कितना अद्भुत है यह विचार कि प्रकृति जीवन के हर पड़ाव पर हमें कुछ नया सिखाने में समर्थ है। हमारे इस नियमित कार्यक्रम को हमने नाम दिया 'टेरेस बर्डिंग'। धीरे-धीरे मेरी मम्मी का रुझान भी इस ओर बढ़ने लगा, अब नीचे दूध वाले भैय्या कब आने वाले हैं यह छोड़ के मम्मी यह सोचती है कि वो बुलबुल आज क्यों गुलमोहर के पेड़ पर बैठने नहीं आई। अब मम्मी पापा पक्षियों को उनके रंग से नहीं नाम से पहचानते हैं।
देखते ही देखते अब उनकी लिस्ट में इंडियन रॉबिन, ओरिएण्टल मैगपाई रॉबिन, स्केली ब्रेस्टेड मुनिआ, रेड वेंटेड बुलबुल, ड्रोंगो, जंगल बेब्बलर, कॉलर्ड डव (कॉमन पिजन), ग्रेटर कोकल, इंडियन रोलर (नीलकंठ), रोज रिंगड पैराकीट, शिकरा, पैराडाइस फ्लाई-कैचर, इंडियन कुकु आदि शामिल हो चुके हैं। इसी बीच हमारे घर के क्रिसमस ट्री के आसपास बुलबुल की चहल पहल कुछ ज्यादा बढ़ गई और एक दिन सुबह पापा ने मुझे बताया कि अब बुलबुल हमारे घर रहने लगी है और उसने वहां अंडे दिए हैं। पक्षियों के लिए पानी घर पर हमेशा से ही रखा जाता था पर अब मम्मी पापा बताते हैं कि कौन सा पक्षी आज पानी पीने नहीं आया।
उन्हीं दिनों एक बहुत ही रोचक किस्सा हुआ, जब पापा ने फिर से मुझे छत पर से आवाज लगाई और बोले बेटा यह कौवा इतना परेशान क्यों है? हमारे घर में जो गुलमोहर का पेड़ है उस पर काफी देर से एक कौवा शोर मचा रहा था, जब मैंने ध्यान से देखा तो पता चला कि वो एक शिकारी को भगाने की कोशिश कर रहा है क्योंकि पास में ही एक घोंसले में उसके बच्चे हैं। मैं यह बात बता ही रही थी कि पापा बोले, पर ये बच्चे कौवे के तो नहीं लगते, काफी अलग हैं। फिर क्या था जब मैंने ध्यान से अपनी दूरबीन से देखा तो पता चला कि वह कोयल के बच्चे थे जो कांव-कांव करना सीख रहे थे। मैंने मम्मी को भी आवाज लगाई और फिर कोयल एवं कौवे के इस व्यवहार के बारे में बताया, जिसे 'ब्रूड पैराटिसिस्म' कहा जाता है।
यह एक प्रकार का परजीवी व्यवहार है, जिसमें कोयल अपने अंडे कौवे के घोंसले में देती हैं और फिर कौवा उन्हें अपने अंडे समझ कर उनकी देखभाल करता है। यह एक बहुत ही अद्भुत व्यवहार है जो कोयल की लगभग सभी प्रजातियों में पाया जाता है। इस घटना के बाद रोज शाम को मेरे मम्मी पापा गुलमोहर की ओर अपनी कुर्सी करके बैठ जाते थे और फिर उस घोंसले में होने वाली सभी गतिविधियों को देखते थे। अब मैं वापस देहरादून आ गई हूं, पर टेरेस बर्डिंग का यह सिलसिला आज भी जारी है, हर शाम ग्वालियर और देहरादून में चाय की चुस्कियों के साथ अब पक्षियों का भी इंतजार रहता है और उसके बाद उन पक्षियों पर हमारी चर्चाओं का।
सृष्टि मोदी, भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून में शोधकर्ता है। इनकी रुचि कीस्टोन प्रजातियों के परस्पर प्रभाव को समझने, टेक्सोनोमी, बिहेवियर एवं कंजर्वेशन जेनेटिक्स में है। वर्तमान में यह महाराष्ट्र के पांच व्याघ्र प्रकल्प में बाघ, तेंदुआ एवं ढोल पर आवास विखंडन से होने वाले दुष्परिणामों को जेनेटिक्स के माध्यम से समझने एवं रोकने के संदर्भ में शोध कर रही है।
यह श्रृंखला ‘नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ द्वारा चालित ‘नेचर कम्युनिकेशन्स’ कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से संबंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है।