विपिनचंद्र पाल पुण्यतिथि विशेष: देश को इस राष्ट्रभक्त के विचारों को अपनाने की जरूरत

Soniya singhसोनिया सिंह Updated Wed, 20 May 2020 02:12 PM IST
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बिपिन चंद्र पाल का जन्म  सिल्हेट जिले के पोइली गांव में हुआ था।
बिपिन चंद्र पाल का जन्म सिल्हेट जिले के पोइली गांव में हुआ था। - फोटो : Social media

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भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में 'लाल (लाला लाजपत राय), बाल (बाल गंगाधर तिलक), पाल (बिपिन चंद्र पाल)' की  तिकड़ी का महत्वपूर्ण स्थान है, जिन्होंने बंगाल विभाजन के समय अपने क्रांतिकारी विचारों से स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी।
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इन्होंने पूर्व समय से चली आ रही अनुनय विनय की नीति का विरोध किया तथा ब्रिटिश सरकार से स्पष्ट रूप से पूर्ण स्वराज्य या राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग की। 'लाल बाल पाल' की इस तिकड़ी के एक महत्वपूर्ण सदस्य थे 'विपिन चंद्र पाल', जिनकी आज (20मई) पुण्यतिथि है। 
क्रांतिकारी विचारधारा को पल्लवित करने वाले इस स्वतंत्रता सेनानी का जन्म 7 नवंबर 1858 को सिल्हेट जिले के पोइली गांव में हुआ था, जो वर्तमान समय में बांग्लादेश में स्थित है। इनके पिता रामचंद्र पाल एक फारसी विद्वान तथा एक छोटे से जमींदार थे।
एक समृद्ध परिवार से संबंध होने के परिणामस्वरूप उनकी शिक्षा-दीक्षा उच्च कोटि की हुई। उस समय के प्रचलन के अनुसार उनकी प्रारंभिक शिक्षा फारसी में हुई तथा उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया, परंतु  कुछ कारणोंवश शिक्षा को बीच में छोड़कर उन्होंने कोलकाता के एक स्कूल में हेडमास्टरी कर ली। 

उसके पश्चात् उन्होंने कोलकाता के सार्वजनिक पुस्तकालय में लाइब्रेरियन के रूप में भी कार्य किया। उसी दौरान वे शिवनाथ शास्त्री, एसएन बनर्जी और वी. के. गोस्वामी जैसे अनेक राजनीतिक नेताओं के सानिध्य में आए, जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने शिक्षण कार्य छोड़कर राजनीति में आने का संकल्प लिया।

वे लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक तथा महर्षि अरविंद के दर्शन, कार्य तथा आध्यात्मिक विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। उन्हीं का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अपना जीवन स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में अर्पित करने का निर्णय लिया। 

बौद्धिक और वैचारिक क्षमता के धनी विपिन चंद्र पाल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी विचारों के जनक के रूप में जाने जाते हैं। 1998 में वे तुलनात्मक विचारधारा का अध्ययन करने इंग्लैंड गए। एक वर्ष बाद भारत वापस आकर स्थानीय भारतीयों के बीच में स्वराज के विचार की भावना का प्रचार किया तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की रूपरेखा तैयार की।

देश में स्वराज की अलख जगाने के लिए उन्होंने कई अखबार भी निकाले तथा उनके माध्यम से पूर्ण स्वराज, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तथा स्वदेशी अपनाओ की भावना आम जनमानस के अंदर जगाई। 
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