{"_id":"69144d3152e97d53b2062578","slug":"bihar-election-2025-even-exit-polls-are-helpless-in-the-face-of-bihar-politics-2025-11-12","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"बिहार: यहां की राजनीति के सामने एग्जिट पोल भी हो जाते हैं असहाय","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
बिहार: यहां की राजनीति के सामने एग्जिट पोल भी हो जाते हैं असहाय
सार
वर्ष 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों को उदाहरण के रूप में देखें तो एग्जिट पोल ने अपनी विश्लेषणात्मक क्षमता सिद्ध की थी। वर्ष 2005 में लालू प्रसाद यादव के पंद्रह वर्षों के शासन से जनता का मोहभंग स्पष्ट था।
विज्ञापन
नीतीश कुमार, राहुल गांधी और तेजस्वी यादव।
- फोटो : ANI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारतीय लोकतंत्र के हृदय कहे जाने वाले बिहार में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के संगम का जीवंत प्रदर्शन हैं। यही कारण है कि हर विधानसभा चुनाव के बाद बिहार के एग्जिट पोल देशभर के राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन जाते हैं, लेकिन हर बार यह प्रश्न भी उठता है कि क्या ये सर्वेक्षण वास्तव में बिहार की जटिल सामाजिक वास्तविकता को समझ पाते हैं या केवल आंकड़ों और आकलनों की सीमाओं में उलझकर रह जाते हैं।
विज्ञापन
बिहार में एग्जिट पोल का इतिहास विरोधाभासों से भरा रहा है। कभी अभूतपूर्व सटीकता का उदाहरण तो कभी पूर्णतः विफल पूर्वानुमान। जब राज्य में जनभावनाओं की दिशा स्पष्ट रही, तब सर्वेक्षणों ने अद्भुत सटीकता दिखाई, लेकिन जैसे ही मुकाबला कड़ा हुआ और जातीय-सामाजिक समीकरण निर्णायक बने, पोल्स की सारी गणनाएं ध्वस्त हो गईं।
विज्ञापन
वर्ष 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों को उदाहरण के रूप में देखें तो एग्जिट पोल ने अपनी विश्लेषणात्मक क्षमता सिद्ध की थी। वर्ष 2005 में लालू प्रसाद यादव के पंद्रह वर्षों के शासन से जनता का मोहभंग स्पष्ट था।
विज्ञापन
सर्वेक्षणों ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए की वापसी का सटीक अनुमान लगाया, जो परिणामों में भी सत्य साबित हुआ। वर्ष 2010 में सुशासन और विकास का नारा जातीय सीमाओं से ऊपर उठ गया था।
पोल्स ने एनडीए की प्रचंड जीत का अनुमान लगाया और नतीजों ने उसकी पुष्टि की। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय अपील और पुलवामा के बाद उपजे राष्ट्रवादी माहौल ने बिहार में एनडीए को लगभग सभी सीटें दिलाईं, जिसे सर्वेक्षणों ने सटीकता से भांप लिया।
हालांकि, जब बिहार की राजनीति अपने पारंपरिक असंतुलन और जातीय जटिलताओं में लौटती है तो एग्जिट पोल के समीकरण बिखर जाते हैं। वर्ष 2015 का विधानसभा चुनाव इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। लगभग सभी एजेंसियों ने भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को स्पष्ट बढ़त दी थी, कुछ ने तो बहुमत तक का दावा किया, लेकिन परिणामों में जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के महागठबंधन ने 178 सीटें जीतकर इन धारणाओं को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
पोल एजेंसियां यह समझ नहीं सकीं कि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के साझा नेतृत्व ने सामाजिक न्याय की वह एकजुटता पैदा कर दी थी, जिसने सत्ता परिवर्तन का आधार रचा।
वर्ष 2020 का चुनाव एक बार फिर सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर भारी पड़ा। लगभग सभी एग्जिट पोल्स ने तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को स्पष्ट बहुमत की ओर दिखाया, जबकि परिणामों में नीतीश कुमार और भाजपा के गठबंधन ने 125 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की।
एग्जिट पोल 15–20 सीटों के औसत अंतर से गलत साबित हुए। यह गलती केवल पद्धतिगत नहीं थी, बल्कि बिहारी समाज की उस गहराई तक न पहुंच पाने की विफलता थी, जहां असली जनमत आकार लेता है।
वर्ष 2020 के चुनाव में मौन मतदाता वर्ग निर्णायक सिद्ध हुआ, विशेषकर महिलाएं। नीतीश कुमार की शराबबंदी, साइकिल योजना और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने ग्रामीण महिला मतदाताओं में भरोसा जगाया, लेकिन सर्वेक्षणकर्ता इस वर्ग तक पहुंच ही नहीं सके।
महिलाएं प्रायः अपनी राजनीतिक पसंद साझा करने से बचती हैं, जिसके कारण यह पूरा वर्ग आंकड़ों से बाहर रह गया। यही मौन वोट अंततः एनडीए के पक्ष में गया और परिणामों की दिशा बदल दी।
दूसरी प्रमुख गलती सामाजिक समीकरणों के गलत आकलन की रही। पोल एजेंसियों ने तेजस्वी यादव की रैलियों में उमड़ी भीड़ को जनमत का संकेत मान लिया। मुस्लिम-यादव (एम-वाई) समीकरण और युवाओं के उत्साह को उन्होंने जीत का आधार समझ लिया, जबकि एनडीए के प्रति अति-पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और दलित समुदाय का वफादार समर्थन निर्णायक साबित हुआ।
यह परंपरागत वोट बैंक पोल्स की दृष्टि से ओझल रहा। बिहार की राजनीति में कई बार वे मतदाता निर्णायक साबित होते हैं जो दिखाई नहीं देते, पर मतदान के दिन परिणाम तय कर देते हैं। तीसरी चुनौती कोविड-19 महामारी रही। सीमित पहुंच, घटे सैंपल साइज और सामाजिक दूरी ने सर्वेक्षणों की जमीनी पकड़ कमजोर कर दी।
ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाता बातचीत से परहेज करते रहे, जिससे आंकड़ों में शहरी पक्षपात बढ़ गया। परिणामस्वरूप, एकत्रित नमूना न तो भौगोलिक रूप से संतुलित था, न ही सामाजिक रूप से प्रतिनिधिक।
विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक्ज़िट पोल की सीमाएं बिहार तक सीमित नहीं हैं। ये सर्वेक्षण कई स्थायी कमियों से ग्रस्त हैं। सीमित नमूने पर आधारित डाटा पूरे राज्य की विविधता का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाता। मतदाता प्रायः सर्वेक्षकों के सामने अपनी वास्तविक पसंद छिपा लेते हैं, विशेषकर तब जब जातीय या धार्मिक झुकाव को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना असहज होता है।
परिणामस्वरूप, सामाजिक रूप से वांछनीय उत्तर वास्तविक जनमत को ढक लेते हैं। इसके अलावा, बिहार की सामाजिक बुनावट इतनी जटिल है कि राष्ट्रीय स्तर के सर्वे मॉडल इन सूक्ष्म अंतर्विरोधों को पकड़ नहीं पाते। एक जिले से दूसरे जिले तक जातीय और सामुदायिक समीकरण बदल जाते हैं।
दरभंगा का ब्राह्मण मतदाता, सिवान का यादव मतदाता या गया का मुसहर समुदाय, सभी की प्राथमिकताएं अलग हैं। इन भिन्नताओं को एक समान मान लेना सर्वेक्षण की सबसे बड़ी भूल है।
वोट प्रतिशत को सीटों में बदलने की प्रक्रिया भी त्रुटिपूर्ण सिद्ध होती है। भारत की ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ प्रणाली में मात्र एक प्रतिशत वोट का अंतर कई दर्जन सीटों का फर्क पैदा कर सकता है।
ऐसे में दो-तीन प्रतिशत की त्रुटि भी पूरे अनुमान को उलट देती है। यही कारण है कि एग्जिट पोल केवल रुझान दिखा सकते हैं, न कि परिणाम। बिहार में एग्जिट पोल्स की विफलता यह भी साबित करती है कि यहां का मतदाता अब अनुमान योग्य नहीं रहा।
जातीय पहचान, क्षेत्रीय निष्ठा और स्थानीय मुद्दों का मिश्रण इतना जटिल है कि कोई भी आंकड़ा इसे पूरी तरह नहीं समझ सकता। बिहार का मतदाता अक्सर आखिरी क्षण में निर्णय बदल देता है। यह न केवल उसका लोकतांत्रिक अधिकार है, बल्कि राजनीतिक चेतना की गहराई का प्रमाण भी है।
राजनीतिक दलों के लिए भी एग्जिट पोल एक दोधारी तलवार हैं। जब नतीजे उनके पक्ष में आते हैं तो वे इसे जनता का मूड बताते हैं और जब विपरीत आते हैं तो इसे प्रायोजित सर्वेक्षण कहकर खारिज कर देते हैं। विपक्ष अक्सर यह दावा करता है कि उनके पक्ष में मौन बहुमत है, जो सर्वे में नहीं दिखता। यह रणनीति कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने में कारगर होती है।
बिहार के चुनाव बार-बार यह सिखाते हैं कि मतदाता किसी भी लहर को स्थायी नहीं रहने देता। जो कल लोकप्रिय था, वह आज अप्रासंगिक हो सकता है। यही बिहार की लोकतांत्रिक जीवंतता है। यहां जनता स्वयं अंतिम निर्णय सुनाती है और कोई भी सर्वेक्षण उस नब्ज को पहले से नहीं पढ़ सकता।
बिहार का अनुभव यह स्पष्ट करता है कि एग्जिट पोल आंकड़ों की सीमाओं से बंधे हैं, जबकि बिहार का जनमत संवेदनाओं, सामाजिक पहचान और स्थानीय वास्तविकताओं से निर्मित होता है।
जब तक सर्वेक्षण एजेंसियां इन कारकों को मापने के लिए स्थानीयकृत और समाज-विशेष आधारित मॉडल विकसित नहीं करतीं, तब तक एग्जिट पोल बिहार में केवल एक मीडिया तमाशा बने रहेंगे और मतदाता, हर बार, इन आंकड़ों को अपनी चुप्पी से पराजित करता रहेगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।