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बिग-बॉस बनाम लपेटे में प्रतीक सहजपाल, लड़कियों की मार कमाल, लड़कों का छूना बवाल

Sun, 12 Dec 2021 08:22 AM IST
स्वाति शैवाल लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: स्वाति शैवाल Updated Sun, 12 Dec 2021 08:22 AM IST
सार

एक लड़की भीड़ भरी बस में सफर कर रही है। अचानक ब्रेक लगाए जाने पर पीछे खड़े एक लड़के का हाथ गलती से उसे लग जाता है और बस साहब, बस में सफर कर रहे बाकी सारे 'मर्द' और 'औरतें' उस अकेले लड़के की बात सुने बिना पर हाथ साफ कर देते हैं।

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Bigg Boss 15 Controversy Tejasswi Prakash Pratik sehajpal Fight Boys Cant beat Girls
प्रतीक सहजपाल- तेजस्विनी प्रकाश: घटनाएं कई बार समाज की मानसिकता को बताती हैं। - फोटो : instagram/pratiksehajpal

विस्तार

हर साल बिग बॉस की शुरूआत के साथ ही शुरू हो जाती हैं उससे जुड़ी खबरें भी। बिग-बॉस का अपना एक दर्शक वर्ग है। ठीक जैसे 80 के दशक में मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा की फिल्मों का हुआ करता था। इसका एनालिसिस फिर कभी। अभी आते हैं बिग-बॉस पर। तो पिछले कुछ दिनों से लगातार सुर्खियों में एक मुद्दा है जिसके अंतर्गत बिग-बॉस प्रतिभागी तेजस्विनी प्रकाश ने एक अन्य प्रतिभागी प्रतीक सहजपाल पर उन्हें गलत तरीके से छूने का आरोप लगाया।

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दरअसल, यूं तो इस पूरे सो-कॉल्ड रियालिटी शो की प्रमाणिकता ही जलेबी जितनी सुलझी हुई है लेकिन वो मुद्दा भी फिलहाल छोड़िए। तो इंटरनेट पर विभिन्न इंटरटेनमेंट चैनल्स और न्यूज़ चैनल्स तक पर दिखाई जा रही वीडियो क्लिप में यह साफ दिख रहा है कि टास्क के दौरान तेजस्विनी और प्रतीक दोनों ही एक दूसरे के काम में बाधा पहुंचाने का काम कर रहे हैं और यह स्पष्ट दिख रहा है कि इस दौरान तेजस्विनी न केवल प्रतीक को हर तरह से धक्का देकर, चेहरे पर नाखूनों से नोचकर और उन्हें लात तक मार कर हटा रही हैं।
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इधर,बदले में प्रतीक सिर्फ अपना बचाव करते हुए तेजस्विनी को हटाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बावजूद मारते मारते तेजस्विनी चीखती जा रही हैं। टास्क के खत्म होने पर तेजस्विनी ने प्रतीक पर आरोप लगाया कि वे टास्क के दौरान लड़कियों को गलत तरीके से छूते हैं और उन्होंने लड़का होने के बावजूद तेजस्विनी यानी लड़की पर बल का प्रयोग किया।
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चलिए दृश्य को बदलते हैं। एक लड़की भीड़ भरी बस में सफर कर रही है। अचानक ब्रेक लगाए जाने पर पीछे खड़े एक लड़के का हाथ गलती से उसे लग जाता है और बस साहब, बस में सफर कर रहे बाकी सारे 'मर्द' और 'औरतें' उस अकेले लड़के की बात सुने बिना पर हाथ साफ कर देते हैं।

दृश्य को थोड़ा और पलटते हैं। एक लड़की सड़क पार कर रही है। एक टैक्सी चालक अपने रास्ते आ रहा है और सिग्नल रेड होने पर रुक जाता है। अचानक लड़की मुड़ती है और बिना किसी वॉर्निंग टैक्सी वाले पर थप्पड़ बरसाना शुरू कर देती है। टैक्सी वाला कुछ समझे तब तक लड़की उसे पीट चुकी है। उसका मोबाइल तोड़ देती है। सड़क पर खड़ी भीड़ सब देख रही है। वीडियो भी बना रही है। लेकिन किसी की हिम्मत नहीं कि उस लड़की को रोक दें। जबकि वो टैक्सी वाला बिना हाथ उठाए बार बार कह रहा है कि उसकी कोई गलती नहीं। बाद में उसने कहा भी कि बदले में अगर वो गलती से भी हाथ उठा देता तो इस बात पर बवाल मच जाता कि उसने लड़की पर हाथ उठाया, इसलिए वो शांत रहा।


ये दृश्य आपको देखे-सुने से लग रहे होंगे। अपने आस-पास आपने कई बार देखा भी होगा ऐसा कोई घटनाक्रम घटते हुए। ये इक्कीसवीं सदी है जनाब। हमने अपनी लड़कियों को मुश्किलों से निपटने और स्ट्रांग बने रहने के गुर तो सिखा दिए लेकिन ये सिखाना भूल रहे हैं कि उनको दी गई  ताकत और अधिकारों का प्रयोग सही वक्त पर और गलत करने वाले व्यक्ति पर करना है, हर किसी पर नहीं।

हमने उन्हें यह तो सिखा दिया कि अन्याय के ख़िलाफ लड़ना है, हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी करना है और हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा को साबित करना है। ब्रावो.... बहुत ही बढ़िया। लेकिन क्या हम उन्हें यह सिखाना भूल रहे हैं कि बराबरी करने का मतलब पुरुषों के खिलाफ हमेशा तलवार ताने रखना नहीं है? न ही ये सिखाया कि बराबरी का मतलब है बिना किसी भेदभाव के हर स्तर पर बराबर प्रदर्शन। जब आप बराबरी करने निकली हैं तो लड़की होने के फायदे उंगली पर गिनकर मत निकलिए।

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महिलाओं और पुरुषों के बीच विवाद में जरूरी नहीं कि हर बार पुरुषों की गलती होगी। - फोटो : Pixabay

मुझे याद है बचपन में करीब 10-11 साल की उम्र में हम दोस्तों के ग्रुप में एक जोड़ा जुड़वां भाई-बहन का था। अक्सर बहन सबके सामने भाई को मार-पीट लेती थी और बहुत बदतमीजी से पेश आती थी।

एक दिन उसने फिर वही किया और उस दिन वो लड़का हमारे सामने फूट फूट कर रोया। हम सब उसकी बहन पर गुस्सा थे और हमने उसे चुप कराते हुए कहा कि वो क्यों नहीं घर में बताता या वो भी बदले में बहन को एक आध थप्पड़ क्यों नहीं लगाता?
 

बदले में उसने सिसकते हुए कहा-' मां ने कहा है, गुड बॉयज लड़कियों पर हाथ नहीं उठाते।' और हमारे पास कोई जवाब नहीं था।


ये एक कड़वा सच है कि लड़कों की तुलना में कहीं ज्यादा प्रतिशत उन लड़कियों का है जो रोज बसों में, ट्रेन में, दफ्तर में और यहां तक कि धर्मस्थलों और घरों तक में शोषण और प्रताड़ना का शिकार होती हैं। ऐसी विकृत मानसिकता वालों की कोई कमी नहीं जो औरत को महज मांस का टुकड़ा समझकर ट्रीट करते हैं और स्कूल जाती बच्चियों को भी नहीं छोड़ते। ऐसे लोगों से मुकाबला करने के लिए लड़कियों को मजबूत बनाने की जरूरत है।

पर क्या आपने पिछले कुछ सालों में ये महसूस नहीं किया कि दहेज से लेकर यौन शोषण तक की झूठी रिपोर्ट लिखवाने वाली लड़कियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। वहीं समाज में ऐसे लड़को की संख्या बढ़ रही है जो महिलाओं के साथ एक स्वस्थ माहौल बनाने और उनको सम्मान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
 

तो आखिर समाज की इस स्थिति के पीछे क्या वजह है? एक तरफ हम लड़कियों को आगे बढाने, समाज की उनके प्रति विचारधारा को बदलने की बात करते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं लड़कियों को लड़की होने के नाते कमजोर बनकर प्रस्तुत होने को भी प्रोत्साहित करते हैं।


अगर बिग-बॉस में जो हुआ वो स्क्रिप्टेड है तो गलत है क्योंकि इस तरह से एक गलत विचारधारा समाज तक पहुंच रही है और अगर यह स्क्रिप्टेड नहीं है तो भी गलत ही है क्योंकि इसका मतलब है कि आपके आस पास समाज में ऐसे लोग हैं जो इसी विचारधारा के साथ जीते हैं।

छेड़ने वालों को लात मारें, समान मेहनत पर समान मेहनताना मांगें, समान मौलिक अधिकारों के लिए लड़ें, शराबी या प्रताड़ना देने वाले पति के अन्याय के खिलाफ़ खड़ी हों, तो लड़कियों का सही अर्थों में आगे बढ़ना साबित होगा। लेकिन अगर लड़कियां इस सोच के साथ कदम बढ़ाएंगी कि हमें लड़की होने के नाते गलत बात के लिए भी फेवर मिलना चाहिए तो वे सही रास्ते से भटक जाएंगी।

पिछले दिनों नेशनल ज्योग्रफी पर भारतीय फौज के ट्रेनिंग प्रोग्राम पर एक डॉक्यूमेंट्री देखने को मिली जिसमें महिला-पुरुष ट्रेनिंग के बारे में बताया जा रहा था। गौरतलब है कि भारतीय सेना में महिलाओं के लिए अब बतौर युद्ध करने वाले सैनिक के तौर पर भी नियुक्तियां प्रारम्भ हो गई हैं।

वायुसेना में लड़कियां फाइटर प्लेन उड़ाने की आधिकारिक पात्रता हासिल कर चुकी हैं और यह पात्रता पाने के लिए उन्हें एक लंबी लड़ाई लड़कर खुद को सिद्ध करना पड़ा। यह नहीं हुआ कि वे महिलाएं हैं इसलिए उनके लिए नियमों या ट्रेनिंग में ढील दे दी गई हो। उन्होंने वही सब ट्रेनिंग प्राप्त की जो इस पद के लिए पुरुष करते हैं।

उन्होंने खुद को साबित किया और अपने लिए सम्मान हासिल किया। इसी बात को उक्त डॉक्यूमेंट्री में एक महिला ट्रेनी ने सिद्ध करते हुये कहा- यहां कोई लड़का या लड़की नहीं है। जो नियम हैं वो सबके लिए समान हैं। हम सब यहां अपने देश के लिए आए हैं और हर एक यही चाहता है कि वो अपना बेस्ट दे। जो सबसे अच्छा होगा वो आगे जायेगा। चाहे वो लड़का हो या लड़की।

लैंगिक भेदभाव की दीवार को तोड़ने के लिए जरूरी है कि पहले घर से ही इसकी शुरुआत की जाए। अगर आप अपने बेटे को ये सिखा रहे हैं कि उसे महिला का सम्मान करना चाहिए तो बेटी को भी ये सिखाना होगा कि तुम्हें पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में हर मोर्चे पर खुद को मजबूती से आगे बढ़ाना है लेकिन खुद के लिए किसी अतिरिक्त कम्फर्ट की चाह के बिना।

उन्हें यह सिखाना जरूरी है कि सफलता के लिए मर्दों से स्वस्थ प्रतियोगिता रखो, पूर्वाग्रह नहीं। फिर जब सफलता मिलेगी तो कोई यह कहने का साहस नहीं कर पायेगा कि लड़की थी इसलिए मिल गई।

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