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जयंती विशेष: युवाओं को दिशा देती है भगत सिंह की जिंदगी

Thu, 28 Sep 2023 12:55 PM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Thu, 28 Sep 2023 12:55 PM IST
सार

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के भारत में ही दीवाने नहीं है बल्कि आज भी सरहद पार कई देशों में उनके बहादुरी के कसीदे पढ़े जाते हैं। दुनिया में कम ही लोग होते हैं जो हर शख्स की आंखों का तारा और दिलो पर बादशाहत कायम करने में कामयाब होता है लेकिन भगत सिंह उन रियल लाइफ हीरोज की फ़ेहरिस्त के सबसे आगे हैं।

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Bhagat Singh Jayanti life Message for Youngsters of Shaheed Bhagat Singh
शहीद-ए-आजम भगत सिंह के भारत में ही दीवाने नहीं है बल्कि आज भी सरहद पार कई देशों में उनके बहादुरी के कसीदे पड़े जाते हैं। - फोटो : Twitter/@RamanGrew

विस्तार

शहीद भगत सिंह और भगवती चरण वोहरा ने नौजवानों और विद्यार्थियों को संगठित करने के प्रयास 1926 से ही आरंभ कर दिए थे। अमृतसर में 11,12,13 अप्रैल 1928 को हुए नौजवान भारत सभा के सम्मेलन के लिए तैयार किए गए नौजवान भारत सभा के घोषणा-पत्र का नीचे लिखा कुछ अंश है।

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भगत सिंह इस सभा के महासचिव और भगवतीचरण वोहरा प्रचार सचिव बने थे। 

नौजवान दोस्तों, इतनी बड़ी लड़ाई में अपने आप को अकेला पाकर हताश मत होना। अपनी शक्ति को पहचानो। अपने ऊपर भरोसा करो। सफलता आपकी है। धनहीन, निस्साहय एवं साधन हीन अवस्था में भाग्य आजमाने के लिए अपने पुत्र को घर से बाहर भेजते समय जेम्स गैरीबाल्डी की महान जननी ने उससे जो शब्द कहे थे (उन्हें) याद रखो उसने कहा, दस में से नौ बार एक नौजवान के साथ जो सबसे अच्छी घटना हो सकती है वह यह है कि उसे जहाज की छत पर से समुद्र में फेंक दिया जाए ताकि वह तैरकर या डूबकर स्वयं अपना रास्ता तय करें।" प्रणाम है उस मां को, जिसने यह शब्द कहे और प्रणाम है उन लोगों को जो इन शब्दों पर अमल करेंगे। 

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तत्कालीन परिस्थितियां बेशक विपरीत थी, लेकिन भगत सिंह देश के युवाओं को भविष्य के लिए क्रान्ति की तलवार को धार दे रहे थे। 28 सितंबर 1907 में पंजाब के बंगा गांव में भारत के उस शेर ने जन्म लिया जिसे दुनिया ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह के नाम से पहचाना। भारत के इस वीर सपूत ने दुनिया को क्रांति और शहादत की राह पर मुस्कुराते, स्वतंत्रता के गीत गाते हुए चलने की राह दिखाई। 

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बिरले ही जन्म लेते हैं ऐसे लोग जिनकी सोच समय से भी तेज रफ़्तार में आगे बढ़ती है। जिनका चिंतन और दूर दृष्टि संसार को अचंभित कर डाले। कहने को तो शहीद ए आजम भगत सिंह को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी की सजा दी लेकिन वास्तव में 23 मार्च का दिन शहीद-ए-आजम भगत सिंह का अनेकों रूपों के जन्म लेने का दिन था। वो कभी मरे ही नही या यूं कहें भगत सिंह को जो समाप्त कर सके ऐसा फांसी का फंदा, ऐसा हथियार अंग्रेजी हुकूमत बना ही न सकी।

वे भारत में हर भारतीय नौजवान में जी उठे। शरीर नष्ट होने से विचार नहीं मरा करते। शहीद-ए-आजम की शहादत ने यह साबित किया, वो आज भी जिंदा हैं। भारत के हर नौजवान के जोश में, जज्बे में, वतन पर मर मिटने वाले उन असंख्य युवाओं के फौलादी इरादों में, जिनके आगे दुश्मनों के नापाक इरादे आज भी पस्त हो जाते हैं। भगत सिंह भारत के युवाओं के हाथों में क्रान्ति की मशाल थमा यकीनन आज भी जिंदा हैं। 

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के भारत में ही दीवाने नहीं है बल्कि आज भी सरहद पार कई देशों में उनके बहादुरी के कसीदे पड़े जाते हैं। दुनिया में कम ही लोग होते हैं जो हर शख्स की आंखों का तारा और दिलो पर बादशाहत कायम करने में कामयाब होता है लेकिन भगत सिंह उन रियल लाइफ हीरोज की फ़ेहरिस्त के सबसे आगे हैं। 

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की ओर से जेल से भेजा गया एक पत्र जो 19 अक्टूबर 1929 को पंजाब छात्र संघ, लाहौर के दूसरे अधिवेशन में जिसके सभापति सुभाष चन्द्र बोस थे, उस सभा में सुनाया गया। जिसके शब्द आज भी युवाओं को नसीहत है।
 

"इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वह बम और पिस्तौल उठाएं आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम है आने वाले लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस देश की आजादी की लड़ाई के लिए जबरदस्त लड़ाई की घोषणा करने वाली है। राष्ट्रीय इतिहास के इस कठिन क्षणों में नौजवानों के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ेगी। यह सच है कि स्वतंत्रता के इस युद्ध में अग्रिम मोर्चो पर विद्यार्थियों ने मौत से टक्कर ली है। क्या परीक्षा की इस घड़ी में वे उसी प्रकार की दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय देने से हिचकिचाएंगे?


नौजवानों को क्रांति का यह संदेश देश के कोने कोने में पहुंचाना है। फैक्ट्री कारखाने के क्षेत्र में, गंदी बस्तियों और गांव की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है, जिससे आजादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असंभव हो जाएगा।

पंजाब वैसे ही राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता है। इसकी भी जिम्मेदारी युवा वर्ग पर ही है। आज वे देश के प्रति अपनी असीम श्रद्धा और शहीद यतींद्रनाथ दास के महान बलिदान से प्रेरणा लेकर यह सिद्ध कर दें की स्वतंत्रता के इस संघर्ष में वे दृढ़ता से टक्कर ले सकते हैं।"

Bhagat Singh Jayanti life Message for Youngsters of Shaheed Bhagat Singh
देश की आजादी के लिए भगत सिंह ने खुद के प्राण न्योछावर क दिए थे। - फोटो : Twitter/@Singhfarmer1313

22 अक्टूबर 1929 के ट्रिब्यून (लाहौर) में प्रकाशित

दुनिया की आजादी का इतिहास हो या फिर भारत की स्वतंत्रता का लंबा संघर्ष, युवाओं की शक्ति और साहस से गुलामी की बेड़ियां पिघली हैं। इस बात को भगत सिंह 23 वर्ष की आयु में जान चुके थे इसलिए आजादी की मशाल कोने कोने में पहुंचाने की ज़िम्मेदारी वे युवा पीढ़ी को सौंपने की वकालत करते थे।

भगत सिंह का (मैं नास्तिक क्यों हूं एवं अन्य लेख) शहादत के पहले साथियों को अंतिम पत्र 22 मार्च 1931


साथियों,

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियां ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया। इतना ऊंचा की जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊंचा मैं हरगिज नहीं हो सकता।

आज मेरी कमजोरी जनता के सामने नहीं है। अगर मैं फांसी से बच गया तो वह जाहिर हो जाएंगी और क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा। या संभवतः मिट ही जाए। लेकिन दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी।

वहीं, देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी की क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी। हां, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवां भाग भी पूरा नहीं कर सका।

अगर स्वतंत्र जिंदा रह सकता तब शायद उन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता। इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फांसी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक भाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।

आपका साथी- भगत सिंह

निसंदेह भगत सिंह का यह सन्देश भारत के युवाओं को सन्देश भी है और हिदायत भी। भारत की मिट्टी में जन्में शेर का सपना सिर्फ़ आज़ादी नहीं बल्कि आजादी के साथ सामाजिक न्याय और शोषण मुक्त स्वतंत्रता थी जो मानवता से भरी हुई हो।

बहुत गहरा सन्देश है भगत सिंह का जीवन,  जिसे युवाओं को समझना और अमल में लाना होगा, स्वंम से पहले देश है और अपने सुख से पहले राष्ट्र हित। तभी उनका सन्देश सही मुकाम हासिल कर पाएगा और उनकी शहादत सही मायने में सार्थक हो पाएगी। भारत की आजादी, एकता और अखंडता को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी अब देश के युवाओं पर है। जय हिन्द!

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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