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भगत सिंह: हिंदी पत्रकारिता और भाषा क्रांति का अनमोल हथियार, स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा

Mon, 23 Mar 2026 06:56 AM IST
Shivam Garg विवेक शुक्ला
विवेक शुक्ला Published by: Shivam Garg Updated Mon, 23 Mar 2026 06:56 AM IST
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Bhagat Singh Hindi Writing as a Revolutionary Weapon in India Freedom Struggle
भगत सिंह - फोटो - फोटो : अमर उजाला

शहीद-ए-आजम भगत सिंह महान क्रांतिकारी, कुशल लेखक और विचारक भी थे, जिन्होंने अपनी कलम से जन-चेतना जगाने का काम किया। उन्होंने विभिन्न भाषाओं में लिखा, जिसमें हिंदी को भी विशेष महत्व दिया। भगत सिंह की मातृभाषा पंजाबी थी। वे पंजाबी, हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और संस्कृत में पारंगत थे—सभी भाषाओं में सही ढंग से लिख और पढ़ सकते थे। उनका पहला महत्वपूर्ण हिंदी निबंध संभवतः ‘पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या’ था, जो उन्होंने मात्र 16-17 वर्ष की उम्र में  लिखा। यह निबंध पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन की प्रतियोगिता के लिए था, जिसमें उन्हें 50 रुपये का प्रथम पुरस्कार मिला। बाद में यह 28 फरवरी, 1933 को ‘हिंदी संदेश’ में प्रकाशित हुआ। इस लेख में भगत सिंह ने पंजाब की भाषाई समस्या के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण किया और भाषा को मजहबी रंग देने पर दुख जताया।

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भगत सिंह का जन्म 1907 में उस पंजाब में हुआ, जहां पंजाबी और उर्दू का बोलबाला था, लेकिन हिंदी भी प्रिंट मीडिया और हिंदू परिवारों में व्यापक थी। भगत सिंह का परिवार आर्य समाज से जुड़ा था-उनके दादा सरदार अर्जुन सिंह दयानंद सरस्वती के करीबी थे। कई सिख भी आर्य समाज से जुड़े रहे। इसलिए घर, स्कूल और कॉलेज में हिंदी सीखना स्वाभाविक था। दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. चंद्रपाल सिंह, जो ‘भगत सिंह- रीविजिटेड’ किताब के लेखक हैं, बताते हैं कि परिवार में हिंदी की परंपरा पहले से मजबूत थी। उन्होंने कई हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं-जैसे, ‘प्रताप’, ‘चांद’, ‘किरती’ आदि में योगदान दिया। छद्म नामों जैसे- 'बलवंत सिंह', 'रणजीत' और 'विद्रोही' से लिखना गिरफ्तारी से बचने का तरीका था। इस कारण उनके लेखों का व्यवस्थित संकलन नहीं हो सका, जो एक बड़ा नुकसान रहा।
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1925 के आसपास भगत सिंह कानपुर गए, जहां गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘प्रताप’ में काम किया। पीलखाना में प्रेस के पास रहते हुए उन्होंने हिंदी लेखन को और निखारा। ‘चांद’ पत्रिका ने शहीदों पर विशेषांक निकाला, जिसमें भगत सिंह ने योगदान दिया। हिंदी में उनकी सरल, लेकिन प्रभावशाली शैली से पाठकों की संख्या बढ़ती गई। ‘प्रताप’ में रहते हुए उन्होंने रिपोर्टिंग भी की। उनके अधिकांश लेख ‘किरती’, ‘प्रताप’ और ‘चांद’ में छपे, जहां वे क्रांतिकारी विचार, राजनीतिक दर्शन और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर लिखते थे। वह पारंपरिक पत्रकार नहीं थे, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान अमूल्य था, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। भगत सिंह की कलम आज भी प्रेरणा देती है—यह बताती है कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि क्रांति का हथियार भी हो सकती है।

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