पुण्यतिथि विशेष: आजादी की क्रांति के जननायक थे भगत सिंह, हिलाकर रख दी थी अग्रेजी हुकूमत की जड़ें
भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में है। भगत सिंह का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसकी पांच पीढ़ियों ने क्रांति की ज्वाला का उदघोष किया था। भगत सिंह अपने चाचा अजीत सिंह से बहुत प्रभावित थे, अजीत सिंह उस समय भारत की आजादी के आंदोलन में सक्रिय थे।
विस्तार
भगत सिंह का नाम जब-जब लिया जाता है तो मानों शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, उनके बलिदान के 93 वर्ष बाद भी उनके विचार युवाओं के खून में दौड़ते हैं। भगत सिंह एक क्रांतिकारी ही नहीं बल्कि क्रांति के वह नायक हैं जो इस ब्रह्माण्ड में विरले ही होते हैं।
आज का दिन हमारे देश को आजादी दिलाने वाले भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान का दिवस है। सम्पूर्ण राष्ट्र में आज के दिन को क्रांति दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। हम सभी के दिलों में यह दिन बेहद पीड़ादायक है, क्योंकि इसी दिन हमारे देश के क्रांतिकारी सपूतों को 'कायर' ब्रिटिश सरकार ने फांसी के फंदे पर चढ़ाया था। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को ये ज्ञात नहीं था कि वह किसी व्यक्ति के प्राण तो ले सकते हैं लेकिन उसके विचारों को कभी नहीं मार सकते।
महान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के विचार हमारे बीच आज भी इतनी मजबूती से मौजूद हैं कि हमें लगता है कि वह हमें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत देते हैं। यह भारत की इस वीर भोग्य धरा का ही परिणाम है कि हमने अपने ऊपर हुए तमाम अत्याचारों का बदला अपना बलिदान देकर लिया है। यह इस धरा की खूबसूरती है कि हम अपने स्वाभिमान को अपने प्राणों से ज्यादा समझते हैं।
भगत सिंह का जीवन परिचय
भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में है। भगत सिंह का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसकी पांच पीढ़ियों ने क्रांति की ज्वाला का उदघोष किया था। भगत सिंह अपने चाचा अजीत सिंह से बहुत प्रभावित थे, अजीत सिंह उस समय भारत की आजादी के आंदोलन में सक्रिय थे।
भगत सिंह की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के स्कूल में ही सम्पन्न हुई, जिसके बाद उनका दाखिला लाहौर के एक एंग्लो वैदिक स्कूल में हुआ, जिसके पश्चात भगत सिंह लाहौर के नेशनल लॉ कॉलेज में अध्ययन के लिए गए।इस कॉलेज की स्थापना महान क्रांतिकारी लाला लाजपत राय ने की थी। भगत सिंह के जीवन में इस कॉलेज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, यहीं से उन्होंने आजादी के रण में अपने कदमों को आगे बढ़ाया।
पढ़ाई के दौरान उनका संपर्क जुगल किशोर,भाई परमानन्द और जयचंद विद्यालंकार से हुआ, उसके बाद वर्ष 1923 में उन्होंने अपना घर छोड़ा और वो कानपुर आ गए, जहां उन्होंने अपना नाम बलवंत सिंह रखकर गणेश शंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र दैनिक प्रताप में काम किया। वहां पुलिस की सक्रियता बढ़ती देख वो कानपुर से अलीगढ़ आए और एक स्कूल में अध्यापन का कार्य करने लगे। कुछ समय बाद वो वापस लाहौर चले गए।
लाहौर में उन्होंने नई रणनीतियों पर काम किया और फिर दिल्ली आकर दैनिक अर्जुन समाचार पत्र में काम करने लगे। वहां उनका परिचय हुआ बटुकेश्र्वर दत्त, अजय घोष, विजयकुमार सिन्हा और योगेश चन्द्र चटर्जी से, अपने इन्हीं साथियों के साथ मिलकर भगत सिंह ने 1923 में स्थापित हुए हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन को दोबारा खड़ा करने का बीड़ा उठाया और आखिरकार हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन की स्थापना कर डाली। देश के युवाओं को आजादी की लड़ाई के लिए तैयार करना हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन का मकसद था।
भगत सिंह के जीवन की सबसे बड़ी घटना तब हुई जब 30 अक्तूबर 1928 को लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में सायमन कमीशन का विरोध किया गया, जिसमें पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स को लाठी चार्ज की अनुमति दी हुई थी। इस लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए थे, जिसके बाद 17 नवम्बर 1928 को वह वीरगति को प्राप्त हो गए। इस घटना से भारत के क्रांतिकारियों के रक्त में ज्वाला का उदघोष हो रहा था, जिसके बाद भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,राजगुरु और जयगोपाल ने इसका बदला लेने का निर्णय लिया और स्कॉट की हत्या का प्लान बनाया लेकिन उन्होंने स्कॉट को नहीं बल्कि सांडर्स को गोली मार दी।
ब्रिटिश सरकार में इस घटना के बाद खलबली मच गई। इस घटना के बाद कई महीनों तक भगत सिंह और उनके साथी फरार रहे, लेकिन क्रांति की ज्वाला रुकने वाली कहां थी। अप्रैल 1929 में भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव ने सोई हुई ब्रिटिश सरकार को जगाने के लिए कोलकाता असेम्बली में कम तीव्रता वाले बम फेंककर नारेबाजी की और अपनी गिरफ्तारी दी, जिसके बाद उन पर सांडर्स की हत्या का मुकदमा चलाया गया।
23 मार्च 1931 को 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह को उनके साथी राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी दे दी गई। ब्रिटिश सरकार ने ये कृत्य कर तीन क्रांतिकारियों की सांसो को तो छीन लिया परन्तु उनके द्वारा प्रसारित क्रांति के विचारों का पतन वो नहीं कर पाई। आज भी हमारे बीच भगत सिंह के विचारों का प्रवाह है, जो अन्याय के खिलाफ और राष्ट्र के प्रति समर्पण के भाव को जगाता है। भारत की यह धरा धन्य है की उसने ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया।
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