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नवरात्रि की धूम: महज एक उत्सव ही नहीं है बंगाल की दुर्गा पूजा, इसके पौराणिक-आर्थिक महत्व के बारे में भी जानिए

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Thu, 22 Sep 2022 04:53 PM IST
सार

पूरे साल दुनियाभर में घटने वाली प्रमुख घटनाओं को पंडालों की सजावट और लाइटिंग के जरिए सजीव किया जाता है। इन आयोजनों के लिए महीनों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। आयोजकों में एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ मची रहती है। कोलकाता में कम से कम दो दर्जन पूजा समितियां ऐसी हैं जहां लोग घंटों कतार में खड़े रहते हैं।

बंगाल की दुर्गा पूजा की विशेषता
बंगाल की दुर्गा पूजा की विशेषता - फोटो : istock
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विस्तार

निर्विवाद रूप से पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार दुर्गा पूजा, महज एक उत्सव ही नहीं है। यह सामाजिक मेलजोल बढ़ाने और सियासत चमकाने के साथ ही आर्थिक लिहाज से भी सबसे बड़ा मौका है। यूनेस्को ने बीते साल कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया था। कोरोना के कारण दो साल तक इस त्योहार का रंग फीका जरूर रहा, लेकिन इस साल इसकी तैयारियां पूरी रंगत में हैं।



पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में दुर्गा पूजा का आयोजन करने वाली प्रत्येक समिति को दी जाने वाली दान राशि में पिछले साल के मुकाबले 10 हजार रुपये बढ़ा दिया है। अब पूजा समितियों को 50 हजार के बजाय 60 हजार रुपये मिलेंगे। उन्होंने इसके साथ ही पूजा पंडालों को 60 प्रतिशत की रियायत पर बिजली देने का भी फैसला किया है।

 

दुर्गा पूजा के दौरान पूरा बंगाल एक अलग ही रंग में नजर आता है। हर जगह मां दुर्गा की पूजा की गूंज उठती है। बंगाल सरकार की ओर से हर साल दुर्गा पूजा कार्निवल का भी आयोजन किया जाता है। विदेशों में भी दुर्गा पूजा का आयोजन साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है। इसके लिए दुर्गा प्रतिमाएं कोलकाता के कुम्हारटोली में तैयार होती हैं।


राज्य में छोटी-बड़ी करीब तीस हजार पूजा आयोजित की जाती है। इनमें से तीन हजार से कुछ ज्यादा तो कोलकाता और आसपास के इलाकों में ही हैं। पहले दुर्गा पूजा षष्ठी से लेकर नवमी यानी चार दिनों तक ही मनाई जाती थी। लेकिन अब यह दस दिनों तक चलती है। इस दौरान राज्य में बाकी सब गतिविधियां ठप रहती हैं। तमाम दफ्तर, स्कूल और कॉलेज बंद रहते हैं।


पूरे साल दुनिया भर में घटने वाली प्रमुख घटनाओं को पंडालों की सजावट और लाइटिंग के जरिए सजीव किया जाता है। इन आयोजनों के लिए महीनों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती है। आयोजकों में एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ मची रहती है। कोलकाता में कम से कम दो दर्जन पूजा समितियां ऐसी हैं जहां लोग घंटों कतार में खड़े रहते हैं। ऐसे पंडालों में रोजाना लाखों लोग जुटते हैं। हाल के वर्षों में थीम आधारित पूजा का प्रचलन बढ़ा है, लेकिन कुछ पंडालों में अब भी मां दुर्गा की पारंपरिक प्रतिमा ही रखी जाती है।

दुर्गा पांडालों में रहती है धूम
दुर्गा पांडालों में रहती है धूम - फोटो : Twitter
कब हुई शुरुआत

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा आयोजित करने की शुरुआत को लेकर कई कहानियां हैं। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का आयोजन वर्ष 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद शुरू हुआ। कहा जाता है कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की जीत पर भगवान को धन्यवाद देने के लिए पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन हुआ था। प्लासी के युद्ध में बंगाल के शासक नवाब सिराजुद्दौला की हार हुई थी।

युद्ध में जीत के बाद रॉबर्ट क्लाइव ईश्वर को धन्यवाद देना चाहता था, लेकिन युद्ध के दौरान नवाब सिराजुद्दौला ने इलाके के सारे चर्च को नेस्तानाबूद कर दिया था। उस वक्त अंग्रेजों के हिमायती राजा नव कृष्णदेव सामने आए। उन्होंने रॉबर्ट क्लाइव के सामने भव्य दुर्गा पूजा आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव पर रॉबर्ट क्लाइव भी तैयार हो गया। उसी वर्ष पहली बार कोलकाता में भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन हुआ। वर्ष 1757 के दुर्गा पूजा आयोजन को देखकर बड़े अमीर जमींदार भी आश्चर्यचकित रह गए।

पहली बार दुर्गा पूजा के आयोजन को लेकर कुछ अन्य कहानियां भी हैं। कहा जाता है कि पहली बार नौवीं सदी में बंगाल के एक युवक ने इसकी शुरुआत की थी। बंगाल के रघुनंदन भट्टाचार्य नाम के एक विद्वान के पहली बार दुर्गा पूजा आयोजित करने का जिक्र भी मिलता है। एक दूसरी कहानी के मुताबिक बंगाल में पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन कुल्लूक भट्ट नाम के पंडित के निर्देशन में ताहिरपुर के एक जमींदार नारायण ने करवाया था। यह समारोह पूरी तरह से पारिवारिक था। कहा जाता है कि बंगाल में पास और सेन वंश के लोगों ने पूजा को काफी बढ़ावा दिया।

पूजा का आर्थिक पहलू
 
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की अर्थव्यवस्था 32,377 करोड़ रुपये की है। इसमें खुदरा क्षेत्र की हिस्सेदारी 27,634 करोड़ रुपये की है। दुर्गा पूजा में मूर्ति निर्माण, रोशनी व सजावट, प्रायोजन, विज्ञापन जैसे करीब 10 उद्योग खास तौर पर सक्रिय रहते हैं। राज्य के पर्यटन मंत्रालय के निर्देश पर ब्रिटिश काउंसिल की ओर से किए गए शोध से यह आंकड़ा सामने आया है।

कोलकाता में हर साल करीब साढ़े चार हजार पूजा आयोजित की जाती है। इनमें 200 आयोजन ऐसे हैं, जिनमें हर पूजा में 50 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है। बाकियों में से हर पूजा में 20 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है। कुल मिलाकर करीब एक लाख रोजगार पैदा होते हैं। इनमें टैक्सी ड्राइवर औऱ टूर गाइड्स भी शामिल हैं।

जानकारों के मुताबिक, कोलकाता पूजा के दौरान कॉर्पोरेट घराने 800 से लेकर 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा तक खर्च करते हैं। इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स पहले ही अनुमान जता चुका है कि 2030 तक दुर्गा पूजा का टर्नओवर मेगा कुंभ मेला के बराबर हो जाएगा जो करीब एक लाख करोड़ रुपये है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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