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विमर्श: कानून की पतली गलियां क्या पॉक्सो के अपराधियों को बचाने के काम तो नहीं आएंगी?

Fri, 30 May 2025 06:20 PM IST
Shruti Agrawal श्रुति अग्रवाल
Updated Fri, 30 May 2025 06:20 PM IST
सार

पारिवारिक और सामाजिक दबाव के कारण आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट हो जाते हैं, तो कभी-कभी अदालतें भी ऐसा फैसला सुनाती हैं जिससे केस समाप्त हो जाता है। इसी तरह का एक मामला हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की गलियों से बाहर आया है।

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bengal case and pocso act Court declines to sentence man convicted in POCSO case
पॉक्सो अधिनियम और कोर्ट के फैसले - फोटो : Freepik.com

विस्तार

पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत दर्ज अधिकांश मामले अदालत की चौखट तक पहुंचने के बाद भी दम तोड़ देते हैं। कहीं पारिवारिक और सामाजिक दबाव के कारण आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट हो जाते हैं, तो कभी-कभी अदालतें भी ऐसा फैसला सुनाती हैं जिससे केस समाप्त हो जाता है। इसी तरह का एक मामला हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की गलियों से बाहर आया है।

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय.एस. ओक ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के दोषी को सजा माफ करने का फैसला सुनाया। जस्टिस ओक और जस्टिस उज्जवल भुइसां की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए यह निर्णय दिया। जबकि इससे पहले हाईकोर्ट से आरोपी को 20 साल कारावास की सजा सुनाई गई थी। 
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ऐसे निर्णय यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि यदि ‘रेयर ऑफ द रेयरेस्ट’ केस को छोड़ दिया जाए तो भारत के कई हिस्सों में बाल विवाह अब भी प्रचलित है, जो कानूनन अपराध है। क्या ऐसी “पतली गलियां” अपराधियों को बचाने का रास्ता तो नहीं बन रही हैं?
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यह मामला पश्चिम बंगाल का है। यहां 24 वर्षीय युवक ने 2018 में नाबालिग लड़की से संबंध बनाए, जिसके बाद पॉक्सो अधिनियम के तहत केस दर्ज हुआ। बाद में दोनों ने शादी कर ली और उनका एक बच्चा भी है। कोर्ट ने इसे असाधारण मामला मानते हुए दोनों पक्षों की स्थिति को ध्यान में रखकर फैसला दिया। इसी तरह का एक निर्णय मध्यप्रदेश से भी सामने आया है।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का मामला

ग्वालियर बेंच में न्यायमूर्ति आनंद पाठक की एकल पीठ ने 15 मई 2024 को यह फैसला सुनाया था। अदालत ने माना कि दोनों पक्षों के बीच विवाह और एक बच्चे के जन्म को देखते हुए पुनर्वासात्मक न्याय की आवश्यकता है, न कि दंडात्मक कार्रवाई की। आरोपी के खिलाफ पॉक्सो के तहत केस दर्ज था।

मामले में लड़की के पिता ने 2021 में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने लड़की को 2022 में कानपुर से बरामद किया, जहां लड़की ने अपने पिता के साथ लौटने से इनकार करते हुए कहा कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ रहना चाहती है। अदालत में भी उसने यह पुष्टि की कि उसने आरोपी के साथ अपनी मर्जी से संबंध बनाए और वे एक साथ शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

मामलों में साम्यता-

ये दोनों ‘रेयर ऑफ द रेयरेस्ट’ (बहुत दुर्लभ) मामले हैं, जिनमें प्रेम संबंध हैं और दोनों पक्ष शादीशुदा हैं। लेकिन समाज में कई बार पीड़िता के ऊपर पारिवारिक और सामाजिक दबाव बनाकर जबरदस्ती आरोपी के साथ शादी करवा दी जाती है। ऐसी शादी पीड़िता के लिए रोज उस भयंकर घटना को जीने जैसा होती है।

क्या यह सही है? भारतीय समाज में शादी को पवित्र और जीवन पर्यंत का रिश्ता माना जाता है। ऐसे में पीड़िता की मजबूरी में शादी करवाना क्या उसके साथ अन्याय नहीं? यदि मामला नाबालिग लड़की से जुड़ा हो तो यह और भी गंभीर हो जाता है।

पॉक्सो अधिनियम की धाराएं और अपराध की व्याख्या

पॉक्सो अधिनियम, 2012 यौन अपराधों के खिलाफ एक कड़ा कानून है, जिसमें बाल यौन शोषण की व्यापक परिभाषा दी गई है। 18 वर्ष से कम उम्र को कानूनी रूप से बाल माना गया है।

  • धारा 3: बच्चों के साथ सभी प्रकार के यौन उत्पीड़न अपराध हैं, जिनमें यौन हमला, बलात्कार, आपराधिक बलात्कार, अश्लीलता दिखाना आदि शामिल हैं।
  •  धारा 4: बाल के साथ यौन हमला (Penetrative Sexual Assault) को अपराध माना गया है।
  • धारा 5: बाल के साथ यौन उत्पीड़न (Sexual Assault) दंडनीय अपराध है।
  • धारा 6: बाल के साथ यौन शोषण (Sexual Harassment) के लिए दंड निर्धारित है।
  • धारा 9: बाल के साथ पॉक्सो अपराधों के लिए विशेष अदालतों में मुकदमा चलाने का प्रावधान है।

इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(3) के तहत भी 16 से 18 वर्ष की आयु के बालकों के साथ यौन संबंध को बलात्कार माना गया है।

केंद्रित बहस का मुख्य विषय होता है कि क्या 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सहमति को कानूनी दृष्टि से मान्यता दी जा सकती है या नहीं। पॉक्सो अधिनियम स्पष्ट करता है कि 18 वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे की सहमति को वैध नहीं माना जाएगा। इसका अर्थ यह है कि चाहे बच्चा सहमत हो, फिर भी उसके साथ शारीरिक संबंध अपराध ही होंगे। यह कानून इस आधार पर बनाया गया है कि बच्चे स्व-निर्णय लेने के लिए परिपक्व नहीं होते और उनका यौन शोषण रोकना जरूरी है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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