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बांकीपुर में 65.84 फीसदी की खामोशी: क्या जनता ने नेताओं को नोटा से भी बड़ा जवाब दे दिया?
सार
बांकीपुर में भाजपा ने प्रचार अभियान में कोई कमी नहीं छोड़ी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक चुनाव प्रचार में सक्रिय रहे और संगठन ने अपने स्तर पर पूरी ताकत लगाई। दूसरी तरफ चुनावी रणनीतिकार के रूप में देशभर में पहचान बनाने वाले प्रशांत किशोर स्वयं उम्मीदवार के रूप में मैदान में थे।
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बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव में दिग्गजों ने वोट किया, प्रतिशत कमजोर रहा।
- फोटो : amar ujala digital
विस्तार
बांकीपुर उपचुनाव में महज 34.16% मतदान गंभीर राजनीतिक संकेत है। 65.84% मतदाताओं की दूरी जनउदासीनता या असंतोष दर्शाती है। इसे नोटा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह राजनीतिक दलों के लिए स्पष्ट ‘मौन संदेश’ जरूर है।
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बांकीपुर विधानसभा का हाई प्रोफाइल उपचुनाव अपने परिणाम से पहले ही एक बड़ा राजनीतिक सवाल छोड़ गया है। इस सीट पर सिर्फ 34.16 फीसदी मतदाताओं ने मतदान किया, जबकि 65.84 फीसदी मतदाता मतदान केंद्र तक पहुंचे ही नहीं।
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आम तौर पर उपचुनावों में मतदान प्रतिशत कम रहता है, लेकिन जब किसी चर्चित सीट पर राजनीतिक दल पूरी ताकत झोंक रहे हों, बड़े नेता प्रचार में उतर रहे हों और चुनावी रणनीति के लिए देशभर में चर्चित व्यक्ति स्वयं उम्मीदवार हो, तब मतदान का इतना कम प्रतिशत निश्चित रूप से सामान्य राजनीतिक उदासीनता से आगे जाकर विश्लेषण की मांग करता है।
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भाजपा ने ताकत लगाई, प्रशांत किशोर स्वयं मैदान में थे, फिर मतदाता कहां गया?
बांकीपुर में भाजपा ने प्रचार अभियान में कोई कमी नहीं छोड़ी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक चुनाव प्रचार में सक्रिय रहे और संगठन ने अपने स्तर पर पूरी ताकत लगाई। दूसरी तरफ चुनावी रणनीतिकार के रूप में देशभर में पहचान बनाने वाले प्रशांत किशोर स्वयं उम्मीदवार के रूप में मैदान में थे।
इस लिहाज से देखें तो चुनाव में राजनीतिक आकर्षण की कमी नहीं थी। बड़े चेहरे थे, प्रचार था, चर्चा थी और मुकाबले को लेकर देशभर में उत्सुकता थी। इसके बावजूद यदि दो-तिहाई से अधिक मतदाता मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचे तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मतदाता की प्राथमिकता क्या थी और उसने चुनाव से दूरी क्यों बनाई?
उम्मीदवार पसंद नहीं थे तो नोटा का विकल्प मौजूद था
इस पूरे मामले में एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। यदि मतदाता किसी उम्मीदवार से संतुष्ट नहीं था या उसे चुनाव मैदान में मौजूद किसी भी प्रत्याशी पर भरोसा नहीं था, तो उसके पास ईवीएम में नोटा का विकल्प मौजूद था।
वह मतदान केंद्र तक जाकर अपनी असहमति दर्ज करा सकता था। लेकिन यहां सवाल यह है कि बड़ी संख्या में लोगों ने नोटा का विकल्प चुनने के बजाय मतदान केंद्र तक जाना ही क्यों उचित नहीं समझा? इसलिए 65.84 फीसदी लोगों का मतदान से बाहर रहना केवल उम्मीदवारों के प्रति नाराजगी मान लेना शायद इस पूरे घटनाक्रम को बहुत सीमित नजरिए से देखने जैसा होगा।
क्या यह राजनीति से बढ़ती दूरी का संकेत है?
नोटा दबाने वाला मतदाता चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनकर अपनी असहमति व्यक्त करता है, जबकि मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचने वाला मतदाता चुनावी प्रक्रिया से ही दूरी बना लेता है। दोनों स्थितियों के राजनीतिक अर्थ अलग-अलग हैं। इसलिए यह जानना जरूरी है कि बांकीपुर में मतदान से दूर रहने वाले लोग वास्तव में उदासीन थे या उनके भीतर किसी प्रकार का राजनीतिक असंतोष था।
क्या उन्हें लगा कि कोई भी उम्मीदवार उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगा, या फिर उन्हें यह विश्वास ही नहीं रहा कि उनका एक वोट उनकी जिंदगी में कोई ठोस बदलाव ला सकता है?
क्या राष्ट्रीय मुद्दों का पड़ा असर?
देश में पिछले कुछ समय से छात्रों और युवाओं के विरोध प्रदर्शन, किसान आंदोलन, राम मंदिर के चंदे को लेकर उठे सवाल, भरत तिवारी एनकाउंटर का विवाद, कमर तोड़ती महंगाई, एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का मुद्दा, बेरोजगारी और आम नागरिक से जुड़े अनेक दूसरे सवाल लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि इन सभी मुद्दों ने सीधे तौर पर बांकीपुर में मतदान प्रतिशत कम किया, क्योंकि उसके लिए ठोस आंकड़ों और मतदाताओं के प्रत्यक्ष अध्ययन की जरूरत होगी। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि क्या इन मुद्दों ने मतदाताओं के एक हिस्से में राजनीतिक व्यवस्था के प्रति निराशा, असंतोष या उदासीनता पैदा की है?
क्या मतदाता उम्मीदवार से नहीं, पूरी व्यवस्था से नाराज है?
संभव है कि बांकीपुर के मतदाता की नाराजगी किसी एक उम्मीदवार या राजनीतिक दल तक सीमित न हो। यह भी संभव है कि मतदाता स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति के बीच अपने लिए कोई ऐसा विकल्प नहीं देख रहा हो, जिसके प्रति वह उत्साह के साथ मतदान केंद्र तक पहुंचे।
लोकतंत्र में मतदान तभी व्यापक भागीदारी का रूप लेता है, जब नागरिक को यह भरोसा हो कि उसका वोट उसके जीवन, उसके परिवार और उसके आसपास की परिस्थितियों में बदलाव ला सकता है। यदि यह भरोसा कमजोर पड़ता है तो चुनाव लोकतांत्रिक अधिकार तो बना रहता है, लेकिन उसके प्रति नागरिक का उत्साह धीरे-धीरे कम हो सकता है।
65.84 फीसदी की खामोशी को पढ़ना होगा
राजनीतिक दल आमतौर पर यह विश्लेषण करते हैं कि किस उम्मीदवार को कितने वोट मिले, कौन कितने मतों से जीता और किस बूथ पर किस दल का प्रदर्शन बेहतर रहा। लेकिन बांकीपुर का आंकड़ा राजनीतिक विश्लेषण की दिशा बदलने वाला सवाल भी खड़ा करता है—कितने लोगों ने वोट नहीं दिया और क्यों नहीं दिया?
चुनाव में पड़े वोट परिणाम का गणित बताते हैं, लेकिन चुनाव से बाहर रहे मतदाता उस समाज की खामोशी का संकेत देते हैं जिसे समझना भी उतना ही जरूरी है।
क्या बांकीपुर भविष्य की राजनीति के लिए चेतावनी है?
बांकीपुर के कम मतदान को फिलहाल किसी व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक प्रवृत्ति का प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा। इसके पीछे मौसम, छुट्टी, शहरी मतदाताओं की व्यस्तता, उपचुनाव के प्रति सामान्य उदासीनता, स्थानीय परिस्थितियां और कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। लेकिन जब 65.84 फीसदी मतदाता मतदान नहीं करते, तो राजनीतिक दलों और चुनावी विश्लेषकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इस आंकड़े को केवल उपचुनाव की सामान्य कम वोटिंग कहकर आगे न बढ़ जाएं।
बूथवार मतदान, पिछले चुनावों की तुलना, आयु वर्ग और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का अध्ययन ही बताएगा कि यह सामान्य उदासीनता थी या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक मनोदशा काम कर रही थी।
असली सवाल चुनाव परिणाम से बड़ा है
बांकीपुर में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसका फैसला आखिरकार पड़े हुए वोटों से होगा। लेकिन इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल शायद परिणाम के बाद भी बना रहेगा—65.84 फीसदी मतदाता मतदान करने क्यों नहीं निकले?
यदि यह केवल उम्मीदवारों के प्रति उदासीनता थी तो राजनीतिक दलों को चिंता करने की जरूरत है; यदि यह राजनीतिक व्यवस्था के प्रति असंतोष था तो चिंता और बड़ी है; और यदि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बढ़ती दूरी का संकेत है तो यह केवल बांकीपुर नहीं, पूरी राजनीतिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
क्योंकि नोटा का बटन दबाने वाला मतदाता भी अपनी बात कहता है, लेकिन मतदान केंद्र तक न पहुंचने वाला मतदाता अपनी खामोशी से सवाल छोड़ जाता है। बांकीपुर में फिलहाल यही खामोशी सबसे बड़ा चुनावी आंकड़ा है—34.16 फीसदी ने मतदान किया, लेकिन 65.84 फीसदी ने क्या संदेश दिया, यह समझना शायद चुनाव जीतने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।