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आर्थिक संकट: श्रीलंका और पाकिस्तान की राह पर बांग्लादेश!

Thu, 20 Jul 2023 04:00 PM IST
Kunal Verma कुणाल वर्मा
Updated Thu, 20 Jul 2023 04:00 PM IST
सार

बांग्लादेश का लक्ष्य साल 2031 तक संयुक्त राष्ट्र के सबसे कम विकासशील देशों (एलडीसी) की रैंक से निकलकर उच्च-मध्यम आय वाला देश बनना है। हालांकि बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले साल नवंबर महीने में बांग्लादेश सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से गुहार लगानी पड़ी थी।

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Bangladesh's economy is facing significant challenges, Asian Development Bank raised growth projection
बांग्लादेश में आर्थिक स्थिति - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

भारत के तीन प्रमुख पड़ोसी देश पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश विकट आर्थिक संकट से ग्रस्त हैं। श्रीलंका में पिछले साल जुलाई में जिस तरह आम लोगों ने क्रांति की थी उसने वहां की विषम परिस्थितियों से पूरे विश्व को अवगत कराया था। श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन तक क्रांति की आग पहुंच गई थी। हालात यहां तक बिगड़ गए थे कि राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को देश छोड़कर भाग जाना पड़ा था। पाकिस्तान के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। पिछले साल ही दिसंबर महीने में बांग्लादेश भी कुछ ऐसे ही संकटों से घिर गया था।

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प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतर गए थे। लगातार बिगड़ रही देश की अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर प्रमुख विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हजारों प्रदर्शनकारियों ने राजधानी ढाका में सरकार को हटाने की मांग को लेकर रैली की थी। हालात इतने बिगड़ गए थे कि प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों की मौत भी हो गई थी और सैकड़ों लोग घायल हो गए थे।
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बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले साल नवंबर महीने में बांग्लादेश सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से गुहार लगानी पड़ी थी।
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लगातार आर्थिक संकटों से जूझ रही शेख हसीना सरकार एक बार फिर अपने पैरों पर उठ खड़ा होने की पुरजोर कोशिश में लगी है। यह कोशिश विदेशी ऋण के जरिए अधिक हो रही है। इस क्रम में प्रधानमंत्री शेख हसीना की चीन से नजदीकियों ने भी बहुत सारे सवालों को जन्म दे दिया है।


एलडीसी रैंक से बाहर निकलने का लक्ष्य

बांग्लादेश का लक्ष्य साल 2031 तक संयुक्त राष्ट्र के सबसे कम विकासशील देशों (एलडीसी) की रैंक से निकलकर उच्च-मध्यम आय वाला देश बनना है। हालांकि, हाल ही में आई विश्वबैंक की एक रिपोर्ट ने वास्तविक स्थिति की तरफ ध्यान दिलाया है।

रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश का वित्तीय क्षेत्र कुछ विकृतियों का सामना कर रहा है, खासकर आर्थिक स्थिरता के रूप में। बांग्लादेश के लिए एक सुकूनदायक बात को भी रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है। विश्व बैंक ने कहा है कि इस आर्थिक संकट को इसके दक्षिण एशियाई पड़ोसियों, पाकिस्तान और श्रीलंका जितना गंभीर और तत्काल नहीं माना जा सकता है।

विभिन्न देशों की आर्थिक स्थिति पर नजर रखने वाली कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का ध्यान इस वक्त बांग्लादेश पर है। ऐसा इसलिए है कि छोटा देश होने के बावजूद बांग्लादेश में इतनी क्षमता है कि वो आर्थिक मोर्चे पर बेहतर कर सके। आर्थिक प्रगति और ऋण खर्च का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए अप्रैल 2023 में आईएमएफ ने ढाका का दौरा किया था। इस दौरान आईएमएफ प्रतिनिधिमंडल ने भी देश में व्याप्त वित्तीय विकृतियों के संबंध में चिंता व्यक्त की थी।

आईएमएफ ने कहा कि बांग्लादेश एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। बेहतर प्रदर्शन के बावजूद लगातार मुद्रास्फीति दबाव, वैश्विक वित्तीय स्थितियों की बढ़ी हुई अस्थिरता के कारण आर्थिक स्थिति गड़बड़ हुई है। आईएमएफ ने यह भी कहा कि प्रमुख उन्नत व्यापार भागीदारों में मंदी के  कारण विदेशी मुद्रा भंडार और बांग्लादेश की मुद्रा 'टका' पर व्यापक असर पड़ रहा है।

Bangladesh's economy is facing significant challenges, Asian Development Bank raised growth projection
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में सुधार की जरूरत - फोटो : Agency (File Photo)

कोरोना महामारी और यूक्रेन संकट का भी असर

बांग्लादेश की मौजूदा आर्थिक स्थिति पर कोरोना महामारी और यूक्रेन संकट ने भी व्यापक असर डाला है। इसके परिणामस्वरूप बिजली और ईंधन की कीमतों में बड़ी वृद्धि हुई है। मई 2023 तक ढाका में मुद्रास्फीति दर पिछले वर्ष के 5.7 प्रतिशत से बढ़कर 9.24 प्रतिशत हो गई। इसके अलावा, बांग्लादेश का भुगतान संतुलन (बीओपी) घाटा भी देश के लिए लगातार आर्थिक चिंता का विषय है। बीओपी घाटा 2022 में 5.3 बिलियन डॉलर से बढ़कर 7.2 बिलियन डॉलर हो गया है। इसके कारण बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित हुआ है। विदेशी मुद्रा भंडार 30 अरब डॉलर से नीचे गिरकर 29.85 अरब डॉलर पर आ गया है।

बांग्लादेश के लिए एक महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा स्रोत रेमिटेंस (प्रवासियों द्वारा भेजे जाना वाला धन) है। इसमें भी 16.2% की गिरावट दर्ज की गई है। इसके कारण चुनौतियां और भी जटिल हो गई हैं। रेडीमेड कपड़ों (आरएमजी) के निर्यात में भी गिरावट ने बांग्लदेश को परेशानी में डाला है। इसमें भी अप्रैल 2023 में 15.4% की गिरावट आई है।

अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए शेख हसीना सरकार ने जो कदम उठाए हैं उस पर तमाम देशों की नजर है क्योंकि जिस तरह के कदम सरकार उठा रही है वे कई पड़ोसी देशों के लिए आत्मघाती भी साबित हुए हैं। सरकार ने सबसे बड़ा कदम उठाया है विदेशी ऋण लेने की तरफ। वित्तीय वर्ष 2023 की दूसरी तिमाही में औसत बाहरी उधारी में 3.35 बिलियन डॉलर से अधिक की वृद्धि हुई है। ढाका ने हाल ही में विश्व बैंक से 2.25 बिलियन डॉलर, आईएमएफ से 4.7 बिलियन डॉलर और एडीबी  से 3.0 बिलियन डॉलर के ऋण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।

आईएमएफ, विश्व बैंक और एडीबी जैसे आर्थिक संगठनों के साथ सरकार की भागीदारी को मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक संकट को दूर करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों से कर्ज लेना एक राजनीतिक रणनीति का संकेत भी देती है। पर इन सबके अलावा कर्ज के मामले में चीन से नजदीकियों ने बांग्लादेश के भविष्य के लिए कई गंभीर प्रश्न भी पैदा किए हैं।


कहीं चीन के जाल में न फंस जाए बांग्लादेश?

दरअसल चीन की विस्तारवादी नीति का सबसे अहम हिस्सा उसका कर्ज जाल (डेब्ट ट्रैप) है। इसके तहत वह गरीब और आर्थिक संकट से जूझ रहे देशों को भारी भरकम कर्ज देकर उन्हें ऐसे मकड़जाल में फंसा देता है जहां से निकलना आसान नहीं। पिछले साल श्रीलंका के मामले में पूरा विश्व यह देख चुका है। श्रीलंका जब कर्ज नहीं चुका पाया तो चीन ने उसका हंबनटोटा पोर्ट ही अगले 99 साल के लिए लीज पर रख लिया।

पाकिस्तान को भी चीन ने कर्ज के बोझ तले इतना दबा दिया है कि वहां कभी भी कुछ कर सकता है। इसीलिए हाल के दिनों में शेख हसीना से चीन की नजदीकियों के कारण सवाल उठना लाजिमी है।

असल में चीन गरीब देशों को इतना बड़ा कर्ज जानबूझकर देता है। उसे यह अच्छी तरह मालूम है कि वह देश कर्ज नहीं चुका पाएगा। ऐसे में वह उस देश के संसाधनों को परोक्ष और अपरोक्ष रूप से अपनी विस्तारवादी नीतियों के लिए उपयोग में लाता है।

हालांकि, पिछले दिनों एक मीडिया इंटरव्यू में शेख हसीना ने स्पष्ट कहा था कि हम सभी के करीब हैं, चाहे चीन हो या अमेरिका। जो भी हमें हमारे विकास कार्यों में सहयाता कर रहा है हम उनके साथ हैं। चीन भी हमारा एक बड़ा पार्टनर है। साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया था कि हमने किसी से भी फिजूल में कर्ज नहीं लिया है।

निश्चित तौर पर बांग्लादेश सरकार अपने तमाम आर्थिक प्रयासों से बेहद कम विकासशील देशों (एलडीसी) की श्रेणी से आगे बढ़ने की नीति पर काम कर रही है। पर यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या बांग्लादेश चीन की आर्थिक ऋण जाल रणनीति से सफलतापूर्वक छुटकारा पा लेगा या फिर श्रीलंका और पाकिस्तान की तरह अपना हाल कर लेगा?

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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