नॉर्थ-ईस्ट डायरी: शरणार्थियों के बोझ से कराहता मिजोरम
राज्य सरकार अब तक इन शरणार्थियों पर करीब 25 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। उसके अलावा कई गैर-सरकारी संगठन भी उनकी मदद करते हैं, उसका कोई हिसाब नहीं है। राज्य सरकार के बार-बार अपील करने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल में शरणार्थियों में राशन बांटने के लिए पांच करोड़ की रकम भेजी है।
विस्तार
पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम, म्यांमार और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से आने वाले शरणार्थियों के बोझ से कराह रहा है। इससे स्थानीय आबादी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। मिजोरम पूर्वोत्तर में सबसे ज्यादा शरणार्थियों को रखने वाला राज्य है। यहां म्यांमार और बांग्लादेश के अलावा पड़ोसी मिजोरम के करीब 50 हजार शरणार्थी रह रहे हैं। राज्य की आबादी करीब 11 लाख है यानी कुल आबादी का पांच फीसदी शरणार्थी हैं। अब भी सीमा पार से हर महीने सैकड़ों म्यांमारी शरणार्थी राज्य में पहुंचते हैं।
दूसरी ओर, राज्य सरकार अब तक म्यांमार से आने वाले शरणार्थियों का बायोमेट्रिक आंकड़ा जुटाने का काम भी नहीं शुरू कर सकी है। केंद्र ने दिसंबर तक इस काम को पूरा करने की समयसीमा तय की थी।
राज्य के 11 में से सात जिलों में बने करीब डेढ़ सौ राहत शिविरों में 40 हजार से ज्यादा शरणार्थी रह रहे हैं। इनके अलावा हजारों शरणार्थियों ने राज्य में अपने रिश्तेदारों के घर शरण ली है।
राज्य सरकार अब तक इन शरणार्थियों पर करीब 25 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। उसके अलावा कई गैर-सरकारी संगठन भी उनकी मदद करते हैं, उसका कोई हिसाब नहीं है। राज्य सरकार के बार-बार अपील करने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल में शरणार्थियों में राशन बांटने के लिए पांच करोड़ की रकम भेजी है।
मिजोरम की 510 किमी लंबी सीमा म्यांमार से लगी है। वर्ष 2021 में वहां सैन्य तख्तापलट के बाद से ही सीमा पार से 30 हजार से ज्यादा शरणार्थियों ने पलायन कर मिजोरम में शरण ली है। सीमा के दोनों ओर चिन समुदाय के लोग ही रहते हैं और उनमें बेटी-रोटी का रिश्ता है। स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने भी सीमावर्ती जिलों में बने राहत शिविरों में उनके रहने-खाने का इंतजाम किया है। उनके अलावा हजारों लोग इन इलाकों में बसे अपने रिश्तेदारों के घर रह रहे हैं।
पहले म्यांमार के साथ खुली सीमा नीति के तहत दोनों ओर के लोग बिना किसी कागजात के ही एक-दूसरे की सीमा में 16 किमी तक भीतर जा सकते थे लेकिन इस साल फरवरी में सरकार ने फ्री मूवमेंट रेजिम (एफएमआर) नामक उस समझौते को रद्द कर दिया। बावजूद इसके सीमा खुली होने की वजह से हर महीने सैकड़ों शरणार्थी जान बचाने के लिए मिजोरम पहुंच रहे हैं।
राज्य सरकार के अलावा सबसे ताकतवर सामाजिक संगठन यंग मिजो एसोसिएशन, चर्च और दूसरे संगठन उनकी मदद कर रहे हैं। केंद्र सरकार उनको शरणार्थी का दर्जा नहीं दे सकती लेकिन मुख्यमंत्री लालदूहोमा ने साफ कर दिया है कि वो किसी भी शरणार्थी को राज्य से नहीं निकालेंगे। मुख्यमंत्री का कहना है कि केंद्र इनको शरणार्थी का दर्जा भले नहीं दे सकता, वह उनको राहत मुहैया कराने के लिए हमारी मदद के लिए सहमत हो गया है।
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म्यांमार के अलावा कुछ महीने पहले बांग्लादेश के चटगांव पर्वतीय इलाके के करीब दो हजार शरणार्थी राज्य में पहुंचे थे। इसके साथ ही पड़ोसी मणिपुर में जातीय हिंसा शुरू होने के बाद वहां से आने वाले कुकी जो जनजाति के दस हजार से ज्यादा शरणार्थियों ने महीनों से मिजोरम में शरण ली है।
केंद्र सरकार ने मिजोरम को म्यांमार से आने वाले शरणार्थियों का बायोमेट्रिक आंकड़ा जुटाने का निर्देश दिया था लेकिन अब तक यह काम शुरू नहीं हो सका है। राज्य के गृह विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि बायोमेट्रिक आंकड़ों के लिए तैयार मौजूदा ऑनलाइन पोर्टल म्यांमार के शरणार्थियों के लिए उपयुक्त नहीं है। यह उन शरणार्थियों के लिए बना है जिनको उनके देश वापस भेजा जाना है। केंद्र ने राज्य सरकार को भरोसा दिया है कि म्यांमार में शांति बहाल नहीं होने तक इन शरणार्थियों को वहां वापस नहीं भेजा जाएगा।
राज्य सरकार के एक अधिकारी बताते हैं कि शरणार्थियों की बढ़ती तादाद से राज्य के खजाने पर भी बोझ बढ़ रहा है। यह छोटा-सा पर्वतीय राज्य अपनी 80 फीसदी से ज्यादा वित्तीय जरूरतों के लिए केंद्र पर ही निर्भर है। इसके अलावा स्थानीय लोगों में भी नाराजगी बढ़ रही है। इन शरणार्थियों में कई लोग सीमा पार से हथियारों और दूसरी अवैध वस्तुओं की तस्वीर में जुटे हैं। बीते दो-तीन वर्षो के आंकड़ों से साफ है कि शरणार्थी समस्या बढ़ने के साथ ही सीमा पार से तस्करी की घटनाएं भी बढ़ी हैं।