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केले में छिपा पर्यावरण की समस्या का समाधान: ग्रीन इकोनॉमी का नया स्तंभ बन सकता है केला

Mon, 20 Apr 2026 07:50 AM IST
Deepak Kohli दीपक कोहली
Updated Mon, 20 Apr 2026 07:50 AM IST
सार

केले के तनों से प्राप्त फाइबर की तन्यता शक्ति इसे जूट और कुछ हद तक फ्लैक्स जैसे प्राकृतिक रेशों के समकक्ष बनाती है।
 

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banana benefits for environment cloths fiber rich sustainable solution
केला की फसल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां संसाधनों की कमी, पर्यावरणीय संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां विकास के पारंपरिक मॉडल को पुनः परिभाषित करने के लिए मजबूर कर रही हैं। ऐसे समय में एक साधारण-सा दिखाई देने वाला कृषि अवशेष, केले का तना, एक असाधारण वैज्ञानिक संसाधन के रूप में उभर रहा है। केले के तनों का उपयोग केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत लगभग 3.4-3.5 करोड़ टन वार्षिक उत्पादन के साथ विश्व के अग्रणी केला उत्पादकों में शामिल है।
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केले का तना पत्तियों के आवरणों से बना होता है, जिसमें अत्यधिक मात्रा में जल, सेल्यूलोज, हेमीसेल्यूलोज और लिग्निन पाए जाते हैं। ताजे तनों में लगभग 80–90 प्रतिशत जल होता है, जबकि शुष्क तने में 60–65 प्रतिशत तक सेल्यूलोज पाया जाता है। यही सेल्यूलोज इसे फाइबर उत्पादन के लिए अत्यंत उपयोगी बनाता है। पहले केले की कटाई के बाद इन तनों को अनुपयोगी मानकर खेतों में छोड़ या जला दिया जाता था। पर अब इस अपशिष्ट को एक मूल्यवान संसाधन में बदल दिया जाता है।
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आज केले के तनों को बायोमास संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इन तनों से प्राप्त फाइबर की तन्यता शक्ति इसे जूट और कुछ हद तक फ्लैक्स जैसे प्राकृतिक रेशों के समकक्ष बनाती है। यही गुण इसे वस्त्र और कागज निर्माण के लिए अत्यंत उपयोगी बनाता है। केले के फाइबर से बने वस्त्र आज वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो रहे हैं। ये कपड़े हल्के, मजबूत और पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल होते हैं। इनका उपयोग इको-फैशन उद्योग में तेजी से बढ़ रहा है। ये वस्त्र एलर्जी-रहित होते हैं, जिससे यह संवेदनशील त्वचा के लिए भी उपयुक्त है। कागज उद्योग में केले के तनों का उपयोग करने से वनों की कटाई में कमी आती है। जब कृषि अपशिष्ट को जलाया जाता है, तो यह कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन करता है। केले के तनों का औद्योगिक उपयोग इसे रोकता है और वनों पर दबाव को कम करता है। 
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अनुमान है कि एक टन प्राकृतिक फाइबर उपयोग करने से लगभग 1.5–2 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की बचत हो सकती है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक है।


विश्व भर में उपभोक्ता अब ऐसे उत्पादों की ओर झुक रहे हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल हों और जिनका कार्बन फुटप्रिंट कम हो। केले के फाइबर से बने उत्पाद इसे पूरा करते हैं। यदि इस तकनीक को संगठित औद्योगिक ढांचे के साथ अपनाया जाए, तो यह न केवल भारत जैसे कृषि प्रधान देशों के लिए, बल्कि वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था के लिए भी मजबूत स्तंभ सिद्ध हो सकती है।
 
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