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धूप आने दो: बालखिल्य ऋषियों ने रचा नया 'इंद्र'

Sun, 15 Oct 2023 06:48 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 15 Oct 2023 06:48 AM IST
सार

कश्यप ने अपने पुत्र देवराज इंद्र से भी यज्ञ में सहयोग करने को कहा। वे इंद्र से बोले, ‘यज्ञ अत्यंत भव्य होगा इसलिए मुझे प्रचुर मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता है।’ ‘आप निश्चिंत रहें, पिताजी! लकड़ी की व्यवस्था हो जाएगी।’ इंद्र ने कहा और यज्ञ के लिए काष्ठ का प्रबंध करने निकल पड़ा।

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Balkhilya sages created new Indra know story
बालखिल्य - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भगवान ब्रह्मा के पौत्र तथा देवताओं के पिता कश्यप एक भव्य यज्ञ करने वाले थे। कश्यप ने उस यज्ञ के लिए ‘बालखिल्य’ नाम के ऋषियों से भी सहयोग देने का अनुरोध किया था। बालखिल्य एक विशिष्ट प्रकार के ऋषियों का समूह है। वे प्रजापति क्रतु एवं उनकी पत्नी संतति के पुत्र हैं। उनका आकार अंगूठे जितना होता है किंतु वे सूर्य की भांति तेजस्वी हैं। वे संख्या में साठ हजार हैं और सब मिलकर प्रतिदिन सूर्यदेव के रथ के आगे स्तुति करते हुए चलते हैं। ये ऋषिगण, वृक्षों पर उलटे लटककर उपासना करते हैं तथा केवल सूर्य के प्रकाश का सेवन करते हैं।

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यद्यपि कश्यप जानते थे कि बालखिल्य ऋषियों का आकार छोटा है और वे अधिक लकड़ी नहीं जुटा सकेंगे फिर भी उनका मान रखने के लिए कश्यप ने उनसे सहयोग मांगा था। बालखिल्य ने भी शारीरिक सीमाओं के पार जाकर यज्ञ में योगदान देना स्वीकार कर लिया। कश्यप ने अपने पुत्र देवराज इंद्र से भी यज्ञ में सहयोग करने को कहा। वे इंद्र से बोले, ‘यज्ञ अत्यंत भव्य होगा इसलिए मुझे प्रचुर मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता है।’ 
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‘आप निश्चिंत रहें, पिताजी! लकड़ी की व्यवस्था हो जाएगी।’ इंद्र ने कहा और यज्ञ के लिए काष्ठ का प्रबंध करने निकल पड़ा। उसे वन में एक विशाल काष्ठ-खंड मिल गया, जिसे लेकर वह अपने पिता कश्यप के आश्रम की ओर चल पड़ा। इसी बीच, बालखिल्य ऋषि भी लकड़ी ढूंढ़ने निकले हुए थे। घूमते हुए उन्हें एक टहनी दिखाई दी जो उन्हें यज्ञ के लिए पसंद आ गई। सभी साठ हजार अंगुष्ठाकार ऋषि, टहनी को लेकर लड़खड़ाते हुए कश्यप के आश्रम की ओर चल पड़े।
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मार्ग में इंद्र और बालखिल्य ऋषियों की भेंट हो गई। इंद्र ने अहंकारवश उनका अपमान करत हुए पूछा- ‘ऋषिवर, आप यह गज-भर की टहनी लेकर कहां जा रहे हैं? ऋषियों ने इंद्र के उपहास को समझ लिया था परंतु उन्होंने कश्यप मुनि का ध्यान करके सिर्फ इतना कहा, ‘हम तुम्हारे पिता के यज्ञ में योगदान स्वरूप समिधा की लकड़ी लेकर जा रहे हैं।’

‘समिधा...हा! हा!!’ इंद्र ने हंसते-हुए कहा। ‘इस पतली-सी टहनी से क्या होगा? कहीं आप मेरे पिता के यज्ञ को अपने आकार का तो नहीं समझ बैठे?’ ‘इंद्र! सहयोग, आकार से नहीं अपितु समर्पण-भाव से मापा जाता है। तुम इंद्र हो किंतु यह ध्यान रखो कि सृष्टि में कोई वस्तु अथवा व्यक्ति अपरिहार्य नहीं है।’ यह बालखिल्य की इंद्र को चेतावनी थी।

इंद्र के सिर पर अहंकार सवार था। वह बोले, ‘आपको पता है कि आप देवताओं के स्वामी इंद्र से बात कर रहे हैं?’ यह सुनकर बालखिल्य ऋषियों ने टहनी नीचे रख दी और हाथ में जल लेकर बोले, ‘तुम्हें अपने ‘इंद्र’ पद का बहुत घमंड है। इसलिए हम संकल्प लेते हैं कि हम अपने योगबल से एक नए इंद्र की रचना करेंगे जो सद्गुणी होने के अलावा तुमसे कहीं अधिक शक्तिशाली और बुद्धिमान होगा।’ फिर ऋषियों ने नीचे रखी टहनी को उठाया और कश्यप के आश्रम की ओर चल पड़े।


कश्यप को इस घटना का पता लगा तो उन्होंने बालखिल्य से कहा कि संसार में इंद्र केवल एक ही हो सकता है इसलिए वे इंद्र को क्षमा कर दें और अपना संकल्प त्याग दें। बालखिल्य दुविधा में पड़ गए। किंतु संकल्प को वापस लेना और भी कठिन था। आखिर, बालखिल्य ने एक उपाय सोच लिया। वे कश्यप से बोले, ‘हम संकल्प वापस नहीं ले सकते किंतु इसमें संशोधन कर सकते हैं। जिस इंद्र का जन्म होगा, वह ‘पक्षियों का इंद्र’ कहलाएगा! इससे संकल्प भी पूर्ण हो जाएगा और इंद्र-पद का प्रभुत्व भी अक्षुण्ण रहेगा।’ कालांतर, कश्यप की पत्नी विनता ने गरुड़ को जन्म दिया जो भगवान विष्णु का वाहन बना तथा ‘पक्षियों का इंद्र’ (पक्षिराज) कहलाया।

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