Odisha Train Accident: कहां गया रेलवे का सुरक्षा ‘कवच’? कैसे रुकेंगे भीषण रेल हादसे?
इतने बड़े रेल हादसे को तकनीकी खराबी या मानवीय भूल, क्या माना जाए? इस भीषण हादसे में सैंकड़ों लोगों की जान गई साथ में सैकड़ों लोग अभी भी घायल अवस्था में हैं जिनका इलाज चल रहा है।
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ओडिशा के बालासोर जिले में हुए भीषण रेल हादसे के बाद संभावित परिचालन खामियों के बारे में सवाल उठने लगे हैं। कैसे कोरोमंडल शालीमार एक्सप्रेस, एक खड़ी मालगाड़ी से टकराने के बाद पटरी से उतर गई और दूसरी ट्रेन, यशवंतपुर-हावड़ा सुपरफास्ट, पटरी से उतरे डिब्बों से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गई?
दरअसल, इतने बड़े रेल हादसे को तकनीकी खराबी या मानवीय भूल, क्या माना जाए? इस भीषण हादसे में सैंकड़ों लोगों की जान गई साथ में और कई लोग अभी भी घायल अवस्था में हैं जिनका इलाज चल रहा है। तीन ट्रेनों के बीच दो टक्कर हुई, टक्कर इतनी जोरदार थी कि पटरियों पर गिरने से पहले डिब्बे हवा में ऊंचे उठ गए थे। दोनों ट्रेनों के 17 डिब्बे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। दुर्घटना को लेकर उठ रहे सवालों में एक सवाल ये भी है कि कोरोमंडल शालीमार एक्सप्रेस मालगाड़ी के ट्रैक पर कैसे आ गई। क्या यह तकनीकी खराबी थी या फिर मानवीय भूल?
एक तरफ केंद्र सरकार देश को बुलेट ट्रेन के सपने दिखा रही है वहीं दूसरी तरफ भीषण रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं। इस भीषण रेल हादसे के बाद अब एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसे हादसों के लिए कौन जिम्मेदार हैं तथा देश में वह दिन कब आएगा जब यह सुनिश्चित होगा कि रेलयात्रा करने वाले यात्री अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचेंगे। दरअसल रेल दुर्घटना का असर बाकी किसी भी हादसे से कई गुना ज्यादा होता है। इसका सीधा कारण यात्रियों की संख्या है।
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भारत को जोड़ती है रेल
भारत में अंतर्देशीय परिवहन के लिए रेल सबसे बड़ा माध्यम है। दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक भारत में हर रोज सवा दो करोड़ से भी ज्यादा यात्री सफर करते हैं जबकि 87 लाख टन के आसपास सामान ढोया जाता है साथ ही कुल 67415 किलोमीटर के ट्रैक पर जरा-सी गफलत लाखों लोगों की जान को जोखिम में डाल सकती है।
प्रारंभिक जांच में हादसे के लिए ‘खराब सिग्नल’ को वजह बताया। रेलवे ने बताया कि रेलगाड़ियों को टकराने से रोकने वाली प्रणाली ‘कवच’ इस मार्ग पर उपलब्ध नहीं है। अगर ये कवच होता तो हादसे को रोका जा सकता था।
भारतीय रेलवे के प्रवक्ता के अनुसार-
‘इस मार्ग पर कवच प्रणाली उपलब्ध नहीं थी.’ कोरोमंडल एक्सप्रेस के स्लीपर क्लास के डिब्बे सबसे ज्यादा प्रभावित थे, जो छुट्टियों के दौरान लोगों से खचाखच भरे रहते हैं। आलम ऐसा होता है कि इन डिब्बों में जनरल डिब्बों के यात्री भी घुस जाते हैं और इस वजह से स्लीपर कोच की हालत भी कई बार जनरल जैसी हो जाती है।
ट्रेन हादसे के बाद एक बार फिर से रेलयात्रियों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हादसे की खबरों के बीच भारतीय रेलवे के उस 'कवच' की चर्चा हो रही है, जो अगर कोरोमंडल एक्सप्रेस में लगा होता तो इतना बड़ा रेल हादसा न हुआ होता। रेलवे के ‘कवच ‘ का उद्घाटन पिछले साल हुआ था। दरअसल रेलवे ने अपने पैसेंजर्स की सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए 'कवच' का निर्माण करवाया था जिसके अस्तित्व में आने के बाद ये माना जा रहा था कि भविष्य में ट्रेन हादसों पर एक दिन जरूर लगाम लग जाएगी।
आखिर क्या है रेलवे की कवच टेक्नोलॉजी?
‘कवच ‘ के सफल परीक्षण के बाद उसे रेलवे का मास्टर स्ट्रोक और बड़ी क्रांति माना जा रहा था। इस तकनीक में रेलवे वो तकनीक विकसित कर चुका है जिसमें अगर एक ही पटरी पर ट्रेन आमने सामने भी आ जाए तो एक्सीडेंट नहीं होगा। रेल मंत्रालय ने तब बताया था कि इस ‘कवच’ टेक्नोलॉजी को धीरे-धीरे देश के सभी रेलवे ट्रैक और ट्रेनों पर इंस्टॉल कर दिया जाएगा। अब रेलवे के इन्हीं दावों पर सवाल उठ रहे हैं ।
पिछले साल मार्च 2022 में हुए कवच टेक्नोलॉजी के ट्रायल में एक ही पटरी पर दौड़ रही दो ट्रेनों में से एक ट्रेन में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव सवार थे और दूसरी ट्रेन के इंजन में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन खुद मौजूद थे। एक ही पटरी पर आमने सामने आ रहे ट्रेन और इंजन ‘कवच’ टेक्नोलॉजी के कारण टकराए नहीं, क्योंकि कवच ने रेल मंत्री की ट्रेन को सामने आ रहे इंजन से 380 मीटर दूर ही रोक दिया और इस तरह परीक्षण सफल रहा।
कामयाब ट्रायल के बाद रेल मंत्री ने कहा था कि अगर एक ही ट्रैक पर दो ट्रेनें आमने सामने हों तो कवच टेक्नोलॉजी ट्रेन की स्पीड कम कर इंजन में ब्रेक लगाती है। इससे दोनों ट्रेनें आपस में टकराने से बच जाएंगी। 2022-23 में कवच टेक्नोलॉजी को 2000 किलोमीटर रेल नेटवर्क पर इस्तेमाल करने का लक्ष्य था, इसके बाद हर साल 4000-5000 किलोमीटर रेलवे नेटवर्क जोड़ने का लक्ष्य था लेकिन इस काम में जिस तेजी की उम्मीद की गई थी शायद उस स्तर पर काम नहीं हो पाया।
कवच टेक्नोलॉजी को देश के तीन वेंडर्स के साथ मिलकर आरडीएसओ (रिसर्च डिजाइन एंड स्टेंडर्ड्स ऑर्गेनाइजेशन) ने डेवलप किया था ताकि पटरी पर दौड़ती ट्रेनों की सेफ्टी सुनिश्चित की जा सके। आरडीएसओ ने इसके इस्तेमाल के लिए ट्रेन की स्पीड लिमिट अधिकतम 160 किलोमीटर/घंटा तय की थी। इस सिस्टम में 'कवच' का संपर्क पटरियों के साथ-साथ ट्रेन के इंजन से होता है। पटरियों के साथ इसका एक रिसीवर होता है तो ट्रेन के इंजन के अंदर एक ट्रांसमीटर लगाया जाता है जिससे की ट्रेन की असल लोकेशन पता चलती रहे।
'कवच' की खासियत यह है कि वो उस स्थिति में एक ट्रेन को ऑटोमेटिक रूप से रोक देगा, जैसे ही उसे निर्धारित दूरी के भीतर उसी पटरी पर दूसरी ट्रेन के होने का सिग्नल मिलेगा। इसके साथ-साथ डिजिटल सिस्टम रेड सिग्नल के दौरान 'जंपिंग' या किसी अन्य तकनीकी खराबी की सूचना मिलते ही ‘कवच’ के माध्यम से ट्रेनों के अपने आप रुकने की बात कही गई थी।
पिछले साल कवच के सफल परीक्षण के बावजूद इसको पुरे देश में रेल नेटवर्क पर लागू करना चाहिए था लेकिन रेलवे ने इस पर ठीक से काम नहीं किया। यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरे रेलवे सिस्टम को जल्दी ही कवच प्रणाली से लैस करना होगा, साथ ही रेलवे की तकनीकी खामिया दूर करने के लिए ठोस और समयबद्ध प्रयास करने होंगे।
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