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बदलाव की आवश्यकता: बाहरी ताकतों से तो मिल गई आजादी, पर देश के भीतर की अराजक मानसिकता का क्या करें?

Thu, 01 Sep 2022 01:12 PM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Thu, 01 Sep 2022 01:12 PM IST
सार

 एक तरफ जब पूरा देश इस साल आजादी के अमृत महोत्सव के उल्लास और उमंग में है तो दूसरी तरफ राजस्थान के एक स्कूल में घटित घटना और फिर झारखंड में अंकिता की हत्या जैसे मामलों ने हमें देश के भीतर की अराजक व संकीर्ण मानसिकता से भरी ताकतों के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया है।

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azadi ka amrit mahotsav, chaotic and narrow mentality is new challenge of the society
अंकिता की हत्या ने खड़े कर दिए हैं कई तरह के सवाल - फोटो : Twitter

विस्तार

हमें आजादी के 75 वर्ष पूरे हो गए हैं और देश में इसे 'आजादी का अमृत महोत्सव' के रूप में मनाया भी गया। इस अमृत महोत्सव के मूल में ब्रिटिश हुकूमत से भारत की आजादी है। हम बाहरी ताकतों से देश के आजाद होने का उत्सव हर वर्ष मनाते ही हैं किंतु यह वर्ष आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर आजादी के अमृत महोत्सव के रूप में विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

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एक तरफ जब पूरा देश आजादी के इस महापर्व के उल्लास और उमंग में था तो दूसरी तरफ राजस्थान के एक स्कूल में घटित घटना हमें देश के भीतर की अराजक व संकीर्ण मानसिकता से भरी ताकतों से घिरे होने का अहसास कराती है। बाहरी ताकतों से तो हमें आजादी मिल गई, हम देशवासी पुन: बाहरी ताकतों से एकजुट होकर लड़ सकते हैं, सीमाएं निर्धारित कर सकते हैं लेकिन जो ताकतें देश के भीतर विराजमान हैं उनसे लड़ना और उनकी सीमाओं का निर्धारण करना सरल नहीं है। 

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हम आजाद देश के नागरिक हैं मगर भीतर से परंपराओं के नाम पर रूढ़ियों से बंधे हैं। यह रूढ़ियां हमारे विचार व व्यवहार में इतनी अधिक संकीर्ण हैं कि यह समाज को भीतर से खोखला और अपंग बना रही हैं। यह अपंगता व्यक्ति के विचार व व्यवहार में देखी जा सकती है। हम चाहकर भी इससे बाहर नहीं आ पा रहे हैं। तभी तो कहीं राजस्थान में मासूम बच्चे द्वारा पानी पीने के मटके को छू देने भर के कारण उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है तो कहीं स्त्री होने के कारण यौन शोषण से शोषित होना पड़ता है और जीवन भर अपने ही खिलाफ हुए अन्याय के खिलाफ अकेले लड़ना पड़ता है।

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दुमका की घटना उठाती है कई सवाल
अभी हाल ही में झारखंड के दुमका की घटना में अंकिता नाम की लड़की को उससे प्रेम करने का दावा करते लड़के द्वारा  जिंदा जला दिया गया। हमारे आसपास ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जो हमें ख़ुद से ही सवाल करने पर मजबूर करती हैं और हम उन सवालों के जवाब न पाकर व्यवस्था के प्रति आक्रोश जाहिर करने लगते हैं। यह आक्रोश कभी न्याय का मजबूत पक्ष बनता है, तो कभी अन्याय का। 

यह हमारे समय की विडंबना ही कही जाएगी कि एक तरफ़ हम देश को वैश्विक फलक पर मजबूत प्रतिनिधि के रूप में खड़ा करना चाहते हैं, हम राष्ट्र प्रेम व सौहार्द का गीत गाते हैं मगर वहीं हमारे ही बीच के कुछ लोग उस राष्ट्रभाव व एकता के बंधन को अपनी संकीर्ण, जड़ व हिंसक प्रवृति के कारण खंडित करते देखे जाते हैं। फिर वह जाति व जेंडर की संकीर्ण मानसिकता ही क्यों न हो?

किसी भी देश की उन्नति उसके नागरिकों के आपसी सहयोग व सौहार्द से होती है। जब आम नागरिक ही सामाजिक, जातिगत, जेंडरगत रूढ़ियों व भेदभाव की बंदिशों से घिरा होगा तो हम किस राष्ट्र का विकास करेंगे? पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा भी था कि-
 

कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या काम संकीर्ण रहेगा’।


शिक्षा में भी कई स्तर का भेद

शिक्षा व्यक्ति को मनुष्य बनाती है, उसमें आत्मसम्मान, प्रेम, आजादी, सौहार्द, भाईचारे, समानता का भाव जगाती है लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था में आपसी सौहार्द से अधिक जातिगत, कभी जेंडरगत तो कभी क्षेत्रगत वैमनस्य का भाव देखने को मिलता है। यह भाव कभी श्रेष्ठता बोध की ग्रंथि से तो कभी हीनता बोध की ग्रंथि से ग्रसित मिलता है। दोनों ही स्थितियों में यह समाज को खोखला व नई पीढ़ी को वैमनस्य के भाव से भर रहा है।

यह वैमनस्य का भाव किताबी शिक्षा से अधिक व्यवहारिक शिक्षा व ज्ञान से दूर किया जा सकता है अन्यथा राजस्थान और झारखंड जैसी कितनी ही घटनाएं घटित होती रहेंगी और एक व्यक्ति की संकीर्ण मानसिकता पूरे समाज व राष्ट्र को कटघरे में खड़ा करती रहेगी। 

हम इस सच से भी वाकिफ हैं कि हमारे समाज की इस जड़ मानसिकता को खाद पानी देने का काम भी राजनीति ने ही किया है। क्योंकि राजनीति इसी व्यवस्था को हथियार बनाकर अपना वोट बैंक तैयार करती रही है। यही वोट बैंक फिर समाज में राजनीति के समीकरण तैयार करता है और जड़ संकीर्ण मानसिकता को पैदा करता है। यही कारण है कि एक ओर समाज में जाति व्यवस्था टूट रही है तो दूसरी ओर जाति के भीतर उप-जातियां अधिक मजबूत बनकर उभर रही है।

लिंग के स्तर पर समता और समानता की बात कही जा रही है। बेटा-बेटी एक समान, पढ़ेगी बेटियां तो बढ़ेंगा समाज के स्लोगन दिए जा रहे हैं। वहीं बेटियां अपने ही देश में एकतरफा अंधे प्रेम की सज़ा में जिंदा जला दी जा रही हैं क्योंकि वह न कहना सीख रही हैं। हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ इस तरह के अपराधी, अपराध के बाद भी बेख़ौफ़ नजर आते हैं और बेटियां अपने ही घरों में कैद होती जाती हैं। हम सभी को जीने का अधिकार है, यह अधिकार हमारा मौलिक अधिकार भी है। बावजूद इसके कभी जाति तो लिंग के स्तर पर समाज में इस अधिकार का हनन होता रहा है और वैश्विक स्तर पर हमारा देश अपने ही लोगों की इस जड़ और क्रूर मानसिकता के कारण शर्मिंदा होता है। 




डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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