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अयोध्या रामजन्म भूमि पूजन 2020: एक याद उस ‘ईंट’ की, जो ‘राम रथ यात्रा’ ने रखी थी.!

Wed, 05 Aug 2020 09:26 AM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Wed, 05 Aug 2020 09:26 AM IST
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ayodhya ram mandir bhumi pujan 2020 political history from lal krishna advani uma bharti ashok singhal and other significant people behind movement
जो जितनी विवादों में रही उतनी ही ऐतिहासिक होती चली गई। - फोटो : अमर उजाला

अयोध्या में राम मंदिर शिलान्यास के साथ ही तीन दशकों का वो ऐतिहासिक चक्र अपनी पूर्णता को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ेगा, जिसकी पहली धार्मिक-राजनीतिक र्ईंट 1990 में भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने रखी थी। भले ही 5 अगस्त को वो राम मंदिर शिलान्यास समारोह के डिजीटल दर्शक होंगे।

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विडंबना ये कि इतिहास की जिस ‘गलती’ को ठीक करने आडवाणी ने बीती सदी में धर्म के आवरण में, जिस बहुसंख्यक हिंदू समाज का ‘नवजागरण’ किया, वही इतिहास आडवाणी को श्रेय देने से मुकर रहा है।
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आडवाणी ही क्यों, उस ऐतिहासिक राम रथ यात्रा के जितने चालक पहिए थे, वो सब तारीख के पर्दे की आड़ में जा चुके हैं या कर दिए हैं। राम मंदिररूपी आम के फल आज जिनके गोदामों में जा रहे हैं, तब वो सब अपने  राजनीतिक कॅरियर की शैशवावस्था में थे। जो भी हो, तीस साल पहले निकली उस राम रथ यात्रा की कुछ स्मृतियां मेरे मस्तिष्क में अभी भी कौंध रही हैं। क्योंकि बतौर पत्रकार मुझे उस यात्रा के कवरेज के लिए चुना गया था।
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यूं राजनीतिक सभाएं, पदयात्राएं पहले भी हुई थीं, लेकिन राम रथ यात्रा जैसा अभूतपूर्व जनसमर्थन और दीवानगी मैंने पहले नहीं देखी थी। राम रथ पर लाल कृष्ण आडवाणी राम मंदिर को लेकर जन जागरण पर निकले थे। इस लंबी यात्रा का करीब तीन दिन का पड़ाव मध्य प्रदेश में भी था।

यह यात्रा पश्चिम की ओर से मप्र में प्रवेश करने वाली थी और भोपाल आकर जबलपुर होते हुए छिंदवाड़ा से राजनांदगांव होकर महाराष्ट्र में प्रवेश करने वाली थी।

आडवाणी की उस रथयात्रा ने पूरे देश में उथल-पुथल मचा दी थी। मीडिया में भी उसको लेकर गहरी जिज्ञासा थी। बीजेपी दफ्तर से खबर आई  की भोपाल से आडवाणीजी के साथ प्रेस पार्टी भी जाएगी, जो यात्रा को कवर करेगी। मैं उन दिनो ‘नईदुनिया’ भोपाल में था। मेरे संपादक स्व.मदन मोहन जोशी और उमेश त्रिवेदी ने कहा कि मुझे यात्रा के साथ जाना है और आज ही निकलना है।

तुरंत तैयारी की। तब बीजेपी दफ्तर 74 बंगले में स्व. लखीराम अग्रवाल के बंगले में हुआ करता था। पता चला कि हमे जबलपुर से यात्रा के साथ चलना है। यहां से प्रेस पार्टी को जबलपुर ले जाया जाएगा। तब बीजेपी में चौतरफा सादगी का माहौल था। नेता और कार्यकर्ता में आज जैसी  ‘डिस्टेंसिंग’ न थी।

बताया गया कि वाहनों की व्यवस्था की गई है। तभी हमारे दिल्ली स्थित राजनीतिक संवाददाता रामशरण जोशी भी मिले। वो भी यात्रा कवर करने आए थे। थोड़ी देर में पता चला कि सिटी में चलने वाली करीब चार-छ: मिनी बसों में बिठाकर हमे ले जाया जाएगा। इस पर कुछ पत्रकारों ने नाराजी जताई और कहा कि तीन दिन तक मिनीबसों में बैठकर तो हमारा कचूमर निकल जाएगा। तब मीडिया का काम रघुनंदन शर्मा देखते थे। किसी तरह आधा दर्जन एंबेसेडर कारों का इंतजाम कर हमे रवाना किया गया।
 

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रामराज्य रथयात्रा को अपार जनसमर्थन मिला। - फोटो : अमर उजाला

जबलपुर में रात्रि विश्राम के बाद हमे यात्रा के साथ चलना था। इस बीच भोपाल से खबर आई कि बीएचईल क्षेत्र, जहां से यात्रा प्रविष्ट हुई थी, तड़के चार बजे तक लोग स्वागत के लिए खड़े थे। मानोंं होली दिवाली एक साथ हो। कुछ वैसा ही माहौल जबलपुर और आगे भी दिखा। पहले मैंने सभाएं कवर की थीं, मेले भी देखे थे। लेकिन राम रथ यात्रा को लेकर लोगों का जोश और उत्साह अद्भुत था।

महिलाएं आरती के थाल लिए रात-रात भर इंतजार करती थीं। पुरूष फूलमालाएं और गुलाल लिए नाचने लगते थे। बस यही नारा था, ‘ राम लला हम आएंगे, मंदिर वही बनाएंगे।‘ लगता था  मानो हिंदुओं के सारे देवता राम में और राम का अंशावतार आडवाणी में समाहित हो गया था। यात्रा जहां से गुजरती, वहां हर गांव-मोहल्ले की तमन्ना होती कि आडवाणी उनका सत्कार स्वीकारें और मंदिर निर्माण की शुभेच्छाएं अपने साथ अयोध्या लेकर जाएं।

यात्रा के साथ हमे भी रूकना पड़ता था। हर जगह रथ पर से आडवाणी संबोधन देते और मंदिर निर्माण का सांस्कृतिक-धार्मिक मंतव्य लोगो को समझाते। साथ ही उनका राजनीतिक मंतव्य अंडर ग्राउंड केबल की तरह पूरे उत्तर-पश्चिम भारत में स्वत: बिछता जाता। हालांकि आडवाणी, अटलजी जैसे लोक वक्ता नहीं थे, फिर भी वो अपनी शैली में बात रखते और लोग कथा श्रवण की तरह उसे श्रद्धा भाव से सुनते।

एक मीडियाकर्मी के रूप में उन दिनो चलती रथयात्रा की रिपोर्टिंग कठिन काम था, क्योंकि संचार के साधन सीमित थे। केवल लैंडलाइन टेलीफोन थे, जिस पर एसटीडी से समाचार नोट कराया जा सकता था। दूसरा उपाय फैक्स का था। दिक्कत यह थी कि टेलीफोन इक्का-दुक्का ही होते थे। उन पर भी खबर नोट कराने वालों की भीड़ रहती थी। कहीं ज्यादा रूकना इसलिए संभव न था, क्योंकि तब तक यात्रा आगे बढ़ जाती थी।

किसी तरह एक-दो स्थानों से फोन पर खबर नोट कराई और शाम को फैक्स ‘नईदुनिया’ भेजा। कुछ वरिष्ठो ने सुझाव दिया कि अब बाकी अनुभव बाद में जाकर लिखना। इस बीच मैं आस्था के इस सैलाब का अपने ढंग से आकलन करने की कोशिश करता रहा। जो दिख रहा था, वह ‘धर्म विहीन राज्य’ के आग्रह को ताक पर रखने जैसा था।

राम रथ यात्रा का वो अनुभव सचमुच लोकमन से साक्षात्कार का अविस्मरणीय अनुभव था।  पहली बार देखा कि लोग जात-पांत, ऊंच-नीच, लिंग और निजी दुख-दर्द भूलकर एक धुन में दीवाने हुए जा रहे थे। अयोध्या में रामलला का मंदिर बनाना ही है। हालांकि तब तक अयोध्या में बाबरी मिस्जद का ध्वंस नहीं हुआ था, इसलिए रथ यात्रा पर धार्मिक कटुता की कोई दृश्य छाया न थी।

राम रथ यात्रा की आयोजना और उसकी अंतर्कथा का जिक्र आडवाणी ने अपनी आत्म कथा ‘मेरा देश, मेरा जीवन’ में विस्तार से किया है। आडवाणी लिखते हैं कि शुरू में राम मंदिर आंदोलन से भाजपा ने खुद को दूर रखा था। केवल श्रीमती विजया राजे सिंधिया और विनय कटियार ने निजी तौर पर इसे समर्थन दिया था। लेकिन मुझे लगा कि अब समय आ गया है कि वास्तविक पंथ निरपेक्षवाद तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की रक्षा की लड़ाई में स्वयं को शामिल करना जरूरी है।

आडवाणी के अनुसार जून 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुआ। यह प्रस्ताव मैंने ( आडवाणी) ही तैयार किया था। इसमें ‘धर्मनिरपेक्ष’ राज्य की उस व्याख्या को स्वीकार किया गया, जिसमें हमारे संविधान निर्माताओं के अनुसार ‘पंथनिरपेक्षता’ ( सेक्युलर) का मतलब सर्व धर्म समभाव था। इसका अर्थ ‘धर्मविहीन’ राज्य नहीं था। अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को ठुकरा देना भी कतई नहीं था।

उधर केन्द्र की तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार, जिसे भाजपा भी बाहर से समर्थन दे रही थी ने दावा किया कि वह अयोध्या का मसला चार माह में सुलझा लेगी। लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ तो अयोध्या में मंदिर के ताले खुलने के बाद वहां राम मंदिर निर्माण की मांग कर रहे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने 30 अक्टूबर 1990 से कार सेवा का ऐलान कर दिया।

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लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह - फोटो : अमर उजाला

आडवाणी के अनुसार ‘राम रथ यात्रा’ निकालना उनकी अंतरात्मा की आवाज थी। पहले वो अयोध्या तक पदयात्रा निकालने के पक्ष में थे, जो 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचती। लेकिन भाजपा नेता प्रमोद महाजन के कहा कि पद यात्रा से ( राम मंदिर के लिए) जनसमर्थन जुटना मुश्किल है। इसमें काफी समय भी लगेगा। क्यों न हम रथ यात्रा निकालें। यह यात्रा भी राम मंदिर  के लिए ही तो होगी।

आडवाणी को यह सुझाव जमा। तय हुआ कि इसे पं. दीनदयाल उपाध्याय की जयंती 25 सितंबर से शुरू किया। शंका केवल तैयारियों को लेकर थी। लेकिन वह काम भी हो गया और 12 सितंबर को आडवाणी ने दिल्ली में पत्रकार वार्ता में ऐलान कर डाला कि वो राम मंदिर के पक्ष में जनमानस तैयार करने के उद्देश्य से 10 हजार किमी लंबी  राम रथ यात्रा निकालेंगे, जो 30 अक्टूबर को अयोध्या में समाप्त होगी।

इसका शुभारंभ 25 सितंबर को सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग पूजन के साथ हुआ। प्रमोद महाजन पूरी यात्रा में मेरे साथ थे। हालांकि उन्हें आम जनता के प्रतिसाद को लेकर संशय था। लेकिन इस यात्रा ने सिद्ध कर दिया कि जन आस्था का अर्थ क्या होता है। बकौल आडवाणी मैंने पहले कभी नहीं सोचा था कि भारतीय जनता के मन में धार्मिकता इतनी गहराई से बसी हुई है। इसी यात्रा में मुझे समझ आया कि यदि राष्ट्रवाद का संदेश देना है तो उसे धर्म की भाषा में ही दिया जाए।  

आडवाणी लिखते हैं कि 24 अक्टूबर को यात्रा यूपी के देवरिया में प्रवेश करने वाली थी। लेकिन जैसा कि अंदेशा था 23 अक्टूबर को बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यअमंत्री लालू प्रसाद यादव के निर्देश पर रथयात्रा रोककर मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मैं पांच सप्ताह तक बंदी रहा।

हालांकि 1992 में दूसरी कारसेवा के वक्त आडवाणी अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढांचे के पास मौजूद थे। अति उत्साही कार सेवकोंं ने मस्जिद का ढांचा ढहा दिया था। आडवाणी के अनुसार- यह देखकर मेरा मन व्यथित हो गया।

उन्होंने कहा यह मेरे जीवन का सबसे दुखद दिन है। कई लोगों ने इस घटना की कड़ी निंदा की और ढांचा ढहाने को देश का सेक्युलर ढांचा ढहने के रूप में देखा। लेकिन बहुतों ने इसे ‘ऐतिहासिक मोड़’ कहा। नोबेल विजेता लेखक वी.एस.नायपाल ने कहा ‘भारतीय जन मानस अपने इतिहास के प्रति जाग रहा है। यह भारत का ऐतिहासिक नवजागरण है।‘

अगर यह ऐतिहासिक नवजागरण था तो अब इसे आरंभ हुए भी 30 बरस होने को हैं। इस बीच एक पूरी पीढ़ी बदल गई। मर्यादा पुरूषोत्तम राम अब राजा और विजेता राम के रूप में प्रतिष्ठित होने जा रहे हैं। भावी इतिहास इस मंदिर को कैसे नमन करेगा, यह देखने की बात है। अयोध्या में राम मंदिर की पहली ईंट भले नरेन्द्र मोदी रखें, लेकिन राम मंदिर आंदोलन की नींव रखने वाले तमाम चेहरे अब स्क्रीन से या तो गायब हैं या केवल इतिहास के जर्जर झरोखों से झांक रहे हैं। शायद इतिहास अपनी ‘गलती’ खुद ठीक नहीं करता।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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