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Atal Bihari Vajpayee Birth Anniversary: आसान नहीं है अटल बिहारी वाजपेयी बनना 

Fri, 25 Dec 2020 07:31 AM IST
Rajesh Verma राजेश वर्मा
Updated Fri, 25 Dec 2020 07:31 AM IST
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atal bihari vajpayee birth anniversary 25 december biography achievements of atal bihari vajpayee
25 दिसंबर, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी के घर अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ - फोटो : Social media

25 दिसंबर, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी के घर अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया (लक्ष्मीबाई) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई। वाजपेयी ने कानून की पढ़ाई करने के लिए डीएवी कालेज कानपुर आने का मन बनाया तो उनके पिता जी ने कहा कि मैं भी तुम्हारे साथ कानून की पढ़ाई शुरू करूंगा क्योंकि पिता जी तब सेवानिवृत्त हो चुके थे।

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पिता पुत्र दोनों ने कानपुर आकर एक साथ प्रवेश लिया। कॅालेज के प्राचार्य के पास जब दोनों एकसाथ प्रवेश लेने के लिए पहुंचे तो उनके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। दोनों का प्रवेश एक ही सेक्शन में हो गया। मजेदार बात यह थी की जिस दिन वाजपेयी किसी कक्षा में नहीं जाते थे उस दिन प्राध्यापक उनके पिता जी से पूछते थे कि आपके पुत्र कहां है और जिस दिन पिता कक्षा में न जाएं तो वाजपेयी से प्रश्न किया जाता था कि आपके पिता जी कहां हैं।
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पिता पुत्र दोनों एक ही हॉस्टल में एक साथी के रूप में भी साथ रहे। हलांकि अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में नहीं आना चाहते थे। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया भी था कि वह तो हमेशा से एक पत्रकार बनना चाहते थे, लेकिन गलती से वह राजनीति में पहुंच गए। 
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उन्होंने एक ऐसे नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई जो देश व विश्व के प्रति एक उदारवादी सोच और लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता को महत्व देते आए। यही कुछ चीजें थी जिसकी वजह से भले ही वे संघ की पृष्ठभूमि व भाजपा से संबंध रखते थे, लेकिन देश की राजनीति में वह सबके लिए एक सम्मानीय नेता रहे।

यह उनके बोलने का अंदाज और सारगर्भित भाषण की कला का जादू था कि उनकी अपनी पार्टी के लोग ही नहीं विरोधियों के लिए भी प्रेरक थे। वाजपेयी की भाषा शैली ही ऐसी थी कि जब भी वे भाषण देते तो हर कोई उन्हें सुनने के लिए वहीं ठहर जाता फिर भले ही सुनने वाला किसी भी विचारधारा से संबंध क्यों न रखता हो। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में पहली बार दिया गया उनका भाषण कोई नहीं भूल सकता। 

वे अक्सर अपने दिल की बातों को कविताओं के द्वारा भी जाहिर करते थे, कलम के जादूगर थे, उन्होंने एक से बढ़कर एक बहुत सी कविताएं लिखी। अपने छात्र जीवन के दौरान पहली बार राष्ट्रवादी राजनीति में तब आए जब पिता की नाराजगी के बावजूद उन्होंने वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद का अंत भी बना, में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। लगभग 24 दिनों तक जेल में भी रहे।

वाजपेयी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित प्रचारक रहे। इसी निष्ठा व सेवाभाव के चलते उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लिया था। शादी भले ही न की हो लेकिन बेटी जरूर गोद ली। सर्वोच्च पद पर पहुंचने तक उन्होंने अपने संकल्प को पूरी निष्ठा से निभाया भी। लंबे समय तक राष्ट्रधर्म, पाञ्चजन्य और वीर अर्जुन आदि पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन भी उन्होनें किया।

कहते हैं अटल जी की बहन ने कई बार उनकी पैंट को घर के बाहर फेंक दिया था, क्योंकि उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे और वो नहीं चाहते थे कि अटल जी आरएसएस की खाकी पैंट पहनें।

1951 में भारतीय जन संघ में शामिल होने के बाद उन्होंने पत्रकारिता छोड़ दी। पं श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं दीन दयाल उपाध्याय के संपर्क में रह कर अटल जी ने सकारात्मक राजनीति की शिक्षा ग्रहण की।
 

वे पहले ऐसे गैर कांग्रेसी नेता थे, जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया...

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वाजपेयी राजनीति के क्षेत्र में चार दशकों तक सक्रिय रहे - फोटो : पीटीआई

वाजपेयी राजनीति के क्षेत्र में चार दशकों तक सक्रिय रहे। वे लोकसभा में 9 बार और राज्य सभा में दो बार सांसद चुने गए जो अपने आप में ही एक कीर्तिमान है। वाजपेयी एक मात्र ऐसे नेता रहे थे जो चार अलग-अलग राज्यों उतर प्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात और दिल्ली से चुनकर संसद में पहुंचे। 1994 में उन्हें भारत का ‘सर्वश्रेष्ठ सांसद’ चुना गया।

अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार देश की बागडोर संभाली। पहली बार साल 1996 में 16 मई से 1 जून तक जब 13 दिन में ही सरकार अल्पमत में आ गई, और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 19 मार्च 1998 से 26 अप्रैल 1999 तक और फिर 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई 2004 तक देश के प्रधानमंत्री रहे।

राजनीति में जिस शुचिता की बात तो सभी करते हैं, लेकिन उसे अपने जीवन में कोई नहीं अपनाता उसे वाजपेयी ने अपनाया। उन्होनें ही देश की राजनीति में जोड़-तोड़ की राजनीति को अलग राह दिखाई। वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद खोने के साथ सरकार भले ही गिरने दी लेकिन अन्य दलों से जोड़-तोड़ नहीं की। सिद्धांतों व राजधर्म पर चलने वाला वाजपेयी के सिवा शायद ही इस देश में कोई दूसरा हो।

वे पहले ऐसे गैर कांग्रेसी नेता थे, जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया। वाजपेयी 26 पार्टियों के साथ सरकार चलाने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री थे। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे तो वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में एक भाषण के दौरान उन्हें भारतीय राजनीति का 'भीष्म पितामाह' करार दिया था।

जय जवान, जय किसान ' नारे पर देश कई दशकों तक चलता रहा लेकिन वाजपेयी ने विज्ञान की शक्ति को बढ़ावा देने के लिए एक और नारा दिया जिसका नाम था "जय विज्ञान" इस नारे ने देश को एक नई दिशा व दशा देने की शुरुआत की। 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण कर भारत को न्यूक्लियर स्टेट बनाने का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को ही जाता है।

भारत को कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर गुवाहाटी तक सभी राज्यों को सड़कों के जरिए जोड़ने का काम अटल बिहारी वाजपेयी ने किया तभी उन्हें सड़कों वाला प्रधानमंत्री भी कहा जाता है। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरुआत भी की।

देश की सुरक्षा व सामरिक दृष्टि से जिस टनल के बारे में देशवासी सपने में भी नहीं सोच सकता था, उस सपने को हकीकत में बदलने वाला कोई और नहीं अटल बिहारी वाजपेयी ही थे। देश के शिक्षा ढांचे में जो सुधार हमें आज देखने को मिल रहा है वह वाजपेयी के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में शुरू किए गए बहुआयामी अभियान "सर्व शिक्षा अभियान" की ही देन है। इस अभियान ने सरकारी विद्यालयों में ऐसा कायाकल्प  किया जिससे हर स्कूल को छत और हर कक्षा को शिक्षकों के अलावा आधारभूत ढांचा उपलब्ध हुआ।

2015 में देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रोटोकॉल तोड़ते हुए उन्हें उनके आवास पर जाकर भारत रत्न से सम्मानित किया। एक प्रखर वक्ता, कवि, पत्रकार, राजनेता, देश में अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों को साथ लेकर चलने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिसके नाम की शुरुआत ही अटल से हो वह भला कैसे मिट सकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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