फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Assembly Election Result: It was bound to happen in all the four states

विधानसभा चुनाव नतीजे: चारों राज्यों में यह तो होना ही था   

Sun, 02 May 2021 08:11 PM IST
राजेश बादल राजेश बादल
राजेश बादल Published by: राजेश बादल Updated Sun, 02 May 2021 08:11 PM IST
विज्ञापन
Assembly Election Result: It was bound to happen in all the four states
पीएम मोदी- अमित शाह- राहुल गांधी - फोटो : self

बंगाल के चुनाव परिणामों से बाकी चार प्रदेशों का चुनाव विश्लेषण अलग से करने की वजह है। उनके नतीजे उस अंदाज़ में चौंकाते हुए नहीं आए, जैसे कि बंगाल के। असम को छोड़कर भाजपा के लिए अन्य राज्य कोई बहुत मायने नहीं रखते हैं। तय था कि तमिलनाडु में द्रमुक और कांग्रेस का गठबंधन नई सरकार बनाने जा रहा है। केरल में भी इस बार विजयन की विजय सुनिश्चित थी और तीस सीटों वाले शिशु प्रदेश पुड्डुचेरी में रंगास्वामी की बदौलत भारतीय जनता पार्टी की जीत की इबारत साफ़ साफ़ लिखी हुई थी।

विज्ञापन


लेकिन शुरुआत असम से। इस खूबसूरत प्रदेश के चुनावी मंच पर पहली बार कांग्रेस के दिग्गज तरुण गोगोई नहीं थे। कांग्रेस के पास सितारा नेता अनुपस्थित था। यह भी कह सकते हैं कि जैसी हालत बंगाल में भाजपा की थी, ठीक वही असम में कांग्रेस की थी। चेहरा विहीन कांग्रेस के शिखर नेताओं ने भी इस प्रदेश में धुआंधार अभियान नहीं चलाया। इसके उलट सर्वानंद सोनोवाल और हेमंत विस्वा सरमा की जोड़ी ने पहले दिन से ही आक्रामक तेवर बनाए हुए थे। इस जोड़ी को व्यवस्था विरोधी वोटों का सामना अधिक भी नहीं करना पड़ा। लेकिन दूसरी बार की जीत में भी हेमंत विस्वा सरमा का कम योगदान नहीं है। पिछले बार चुनाव के समय वे कांग्रेस से सीधे ही आए थे इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का सवाल ही नहीं उठता था। मगर इस बार असम एक नया चेहरा अवश्य चाहेगा। सोनोवाल की केंद्र में फिर वापसी एक विकल्प हो सकता है।
विज्ञापन


तमिलनाडु में एआईएडीएमके के मंच पर जयललिता नहीं थीं। उनकी अनुपस्थिति में दल के दो ध्रुव बन गए थे। पनीरसेल्वम और पलानीसामी के धड़ों में बंटी अन्ना द्रमुक ने पंद्रह सौ से लेकर ढाई हज़ार रुपये तक मतदाताओं को बांटे। यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है। तमिलनाडु की राजनीति में बरसों से यह कुप्रथा चल रही है। अफ़सोस ! हमारा चुनाव आयोग चुनाव तो नहीं रोकता, लेकिन बंगाल के चुनाव में एक इंस्पेक्टर को निलंबित करने का निर्देश देता है, पर उसे तमिलनाडु में व्यवस्था का मख़ौल उड़ता नहीं दिखाई देता। फिर भी राज्य सरकार ने बाढ़, तूफ़ान और फिर कोरोना से निपटने में सराहनीय काम किया है - इसे कोई नकार नहीं सकता। इसलिए हार का अंतर वह कम करने पर क़ामयाब रही है। दूसरी ओर एम के स्टालिन जो वर्षों से पिता की छाया तले काम कर रहे थे। एक बार उन्हें उप-मुख्यमंत्री के पद पर काम करने का अवसर मिला था। इसलिए नए चेहरे के रूप में जनता ने उन पर भरोसा जताया है। पुड्डुचेरी में रंगास्वामी के दल से गठजोड़ का फायदा ही भाजपा को मिला है। तीस सदस्यों वाली इस विधानसभा में यह सरकार भी पूरे पांच साल चलेगी कोई नहीं कह सकता। 
विज्ञापन
विज्ञापन


केरल में भी तमिलनाडु की तरह परिणाम साफ़-साफ़ था। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भले ही वहां से सांसद हों, लेकिन मुख्यमंत्री पी विजयन की लोकप्रियता के मुकाबले में वे नहीं ठहर पाए। माना जा रहा था कि इस बार नायर वोट बैंक विभाजित थे और वे इस बार कांग्रेस के प्रति झुकाव रखते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस उनका लाभ नहीं ले पाई। उसके पास ओमान चांडी जैसा कद्दावर नेता था, लेकिन कांग्रेस उनकी छवि को मतों में बदल नहीं पाई। इसके अलावा पी विजयन की सबसे बड़ी उपलब्धि उनका अपने तंत्र पर नियंत्रण था, जिसके कारण कोरोना से यह प्रदेश बड़ी कुशलता से निपट सका।
 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed