बाल विवाह पर सख्ती: हिमंता बिस्वा सरमा के फैसले का विरोध गैरवाजिब
हेमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने फैसला लिया है कि अब राज्य में 14 साल से कम उम्र की लड़कियों से शादी करने वालों के खिलाफ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेंस्ट सेक्सुअल ऑफेंस (पॉक्सो) के तहत कार्रवाई की जाएगी। उनका तर्क है कि राज्य में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर काफी अधिक है, जिसकी सबसे बड़ी वजह बाल विवाह है।
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भारतीय राजनीति अपनी स्थापना के समय से ही इतने गूढ़ तरीके से उलझी रही है कि किसी भी सरकार के लिए समाज सुधार वाले निर्णय लेना आसान नहीं रहा है। जाति, मजहब की दीवारें अक्सर इन निर्णयों को ऐसी खाई में धकेल देती हैं कि उनके पुनर्जन्म की कोई गुंजाइश नहीं रहती। लीग से हटकर चलना भारतीय राजनीति में एक चुनौती की तरह है, जिससे राजनेता बचते आए हैं या ऐसा करके अपनी सत्ता बचाते आए हैं।
हालांकि इस स्थिति में साल 2014 के बाद से कुछ बदलाव की आहट गाहे-बगाहे कानों में गूंजती रही है। ताजा मामले के केंद्र में हैं असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा। सरमा की सरकार ने फैसला लिया है कि अब राज्य में 14 साल से कम उम्र की लड़कियों से शादी करने वालों के खिलाफ प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन अगेंस्ट सेक्सुअल ऑफेंस (पॉक्सो) के तहत कार्रवाई की जाएगी। उनका तर्क है कि राज्य में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर काफी अधिक है, जिसकी सबसे बड़ी वजह बाल विवाह है।
14 से ज्यादा और 18 साल से कम उम्र की लड़की से शादी करने पर बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 के तहत कार्रवाई की जाएगी। असम सरकार ने बाल विवाह रोकने के लिए सभी 2,197 ग्राम पंचायत सचिवों को बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत बाल विवाह रोकथाम अधिकारी के रूप में नामित किया है। ये अधिकारी ही पॉक्सो एक्ट के उन मामलों में शिकायत दर्ज कराएंगे, जहां लड़की की उम्र 14 साल से कम है।
एनएफएचएस-5 के आंकड़े जानिए
असम सरकार ने यह कदम क्यों उठाया है? इसे समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डालना बेहद अहम है। बीते साल मई माह में आई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) की रिपोर्ट के अनुसार-
असम में 20 से 24 वर्ष की उम्र की 31 प्रतिशत से ज्यादा ऐसी महिलाएं हैं जिनकी शादी 18 वर्ष की उम्र से पहले ही कर दी गई। वहीं, इस मामले में राष्ट्रीय औसत तकरीबन 23 प्रतिशत है। असम में 11.7 फीसदी लड़कियां कम उम्र में गर्भवती हो रही हैं। यह आंकड़े बड़ी संख्या में होने वाले बाल विवाह का जीते-जागते गवाह हैं। राज्य के सीमावर्ती जिले धुबड़ी में आंकड़ा और भी भयावह है, जहां 50 फीसदी शादियां कम उम्र में हो रही हैं। ऐसे में लड़कियां कम उम्र में मां बनने को मजबूर हैं।
रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया की ओर से 2022 में जारी आंकड़ों के अनुसार असम, देश में सबसे ज्यादा मातृ मृत्यु दर वाला राज्य है, जबकि शिश मृत्यु दर के मामले में यह तीसरे नंबर पर है।
अगर आंकड़ों के आईने में देखें तो असम सरकार का फैसला स्वागतयोग्य प्रतीत होता है। कुछ समाजसेवी संगठनों ने भी इसे सराहा है। हालांकि दूसरी तरफ एक तबका ऐसा भी है जो इस फैसले को संदेहास्पद दृष्टि से देख रहा है। राज्य के कुछ हिस्सों में इस फैसले के खिलाफ लोग धरना-प्रदर्शन में भी जुट गए हैं। इन्हें आशंका है कि मुस्लिमों को परेशान करने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है।
दरअसल, मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह का प्रचलन अधिक है। हालांकि मुस्लिमों को वोट बैंक के रूप में देखने वाले राजनीतिक दल इस तथ्य को सिरे से नकार देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उनका वोट बैंक उनसे छिटक जाएगा और सत्ता की चाबी उनसे दूर हो जाएगी। असम में फैसले के विरोध के पीछे भी यही राजनीतिक कारण है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि कई बार ऐसे फैसलों का भी विरोध किया जाने लगता है जो कि समाज के हित में हों। अधिकांश मामलों में राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर पार्टियां बेवजह विरोध में उतर आती हैं, जबकि इस फैसले के देशहित में दूरगामी परिणाम होंगे।
‘बाल विवाह मुक्त भारत’ आंदोलन
यहां पर बीते साल हुए एक देशव्यापी आंदोलन का जिक्र करना लाजिमी है। इस आंदोलन का नाम था ‘बाल विवाह मुक्त भारत’। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने इस आंदोलन की शुरुआत 16 अक्टूबर, 2022 को की थी। देशभर के करीब 500 जिलों में 70,000 से ज्यादा महिलाओं ने बाल विवाह के विरोध में मशाल जुलूस निकाला था। महिलाओं की इतनी बड़ी हिस्सेदारी इस बात का सुबूत है कि बाल विवाह के दुष्परिणामों से देश चिंतित है।
आंदोलन से देशभर में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दो करोड़ से ज्यादा लोग जुड़े थे। जो लोग यह मानते हैं कि देश में बाल विवाह कोई समस्या नहीं है और बहुत ही छोटे स्तर पर या कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में ही बाल विवाह होता है, उनके लिए ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ आंदोलन को जानना जरूरी है।
जरूरत है कि असम सरकार के फैसले को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाए और बाल विवाह की बुराई को खत्म करने के लिए सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चला जाए। सरकार किसी विशेष राजनीतिक दल की हो सकती है लेकिन बेटियां तो हमारी हैं। आखिर एक बेटी से कैसे उसका भविष्य छीना जा सकता है? कैसे उनके सपनों की उड़ान को रोका जा सकता है। यदि बेटियों का बाल विवाह नहीं होगा तो वे भी उच्च शिक्षा हासिल कर सकती हैं, रोजगार हासिल कर सकती हैं, रोजगार दे सकती हैं।
इस तरह से वे देश की आर्थिक प्रगति में अपना अमूल्य योगदान दे सकती हैं। पढ़ी-लिखी और सशक्त बेटियों से आने वाली पूरी पीढ़ी की तकदीर बदल जाएगी। इसलिए असम सरकार के फैसले का समर्थन करना ही न्यायोचित है। साथ ही अन्य राज्य सरकारों को भी हेमंत बिस्वा सरमा के फैसले से सीख लेनी चाहिए और बाल विवाह जैसी बुराई के अंत के लिए कदम उठाना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।