Challenges in Artificial Intelligence: कृत्रिम बुद्धिमता बनाम हमारी संवैधानिक बुद्धिमता और विवेक
क्या मनुष्य के मनुष्य के प्रति ही लिए जाने वाले सारे महत्वपूर्ण निर्णय कृत्रिम बुद्धिमता विकृत नहीं करेगी? क्या गरिमा, न्याय, समानता, संवेदना, सहानुभूति और भावना जैसे संवैधानिक मूल्यों का कोई आधार होगा? या फिर मशीनी पैटर्न, तार्किक संजाल या फिर एल्गोरिदम को आधार बनाया जाएगा?
क्या मनुष्य के मनुष्य के प्रति ही लिए जाने वाले सारे महत्वपूर्ण निर्णय कृत्रिम बुद्धिमता विकृत नहीं करेगी? क्या गरिमा, न्याय, समानता, संवेदना, सहानुभूति और भावना जैसे संवैधानिक मूल्यों का कोई आधार होगा? या फिर मशीनी पैटर्न, तार्किक संजाल या फिर एल्गोरिदम को आधार बनाया जाएगा?
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विस्तार
भारत बीते दो दशकों में तकनीक संपन्न राष्ट्र के तौर पर उभरा है। दुनिया के बाजार में राष्ट्र की आईटी की ताकत और मानव संसाधन की शक्ति बढ़ी है। डिजिटल इंडिया के प्रसार के बीच आज करोड़ों भारतीय मोबाइल का प्रयोग कर रहे हैं। हर हाथ में स्मार्टफोन है और हर व्यक्ति डिजिटल सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है। टेक्नॉलॉजी ने समाज और प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर अनिवार्य उपस्थिति दर्ज कराई है। देश डिजिटल क्रांति से गुजरता हुआ आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दहलीज पर खड़ा है।
दरअसल, पूरी दुनिया में इस वक्त आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दस्तक है। भारत में कृत्रिम बुद्धिमता और उससे उपजने वाली चुनौतियों की आहट दर्ज हो रही है। अभी भारत डिजिटल संसार के संकट, समस्याओं और चुनौतियों से जूझ ही रहा है और राष्ट्र के सामने डीपफेक, साइबर क्राइम और युद्ध नई समस्याएं हैं जबकि दुनिया का भविष्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के समानांतर नए सिरे से ढूंढा जा रहा है। आगत् की तस्वीर विश्व के दिग्गज टेक्नॉलॉजी विशेषज्ञों, रोबोटिक साइंस के जानकार और आईटी क्षेत्र सहित बड़ी वैश्विक पूंजीधारक कंपनियां गढ़ने जा रही हैं।
आज बतौर एक विकासशील राष्ट्र देश सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विषमता और असंतुलन के बीच है। आजादी के बाद से हम विविधतापूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे में संवैधानिक बुद्धिमता और चेतना हासिल करने का संघर्ष कर रहे हैं।
संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर संवैधानिक बुद्धिमता और चेतना पर बहुत जोर देते थे। बाबा साहेब की इच्छा थी कि संस्कृति, समाज, धर्म और जातिगत् विविधता के विषम और विसंगतिपूर्ण भारतीय समाज में संवैधानिक साक्षरता फैले। देश का नागरिकता बोध संवैधानिक बुद्धिमता से संपन्न हो। जनता संविधान को लेकर जागरूक हो। राष्ट्र में संविधान लागू केवल कागजों में ही लागू ना हो बल्कि संवैधानिक मूल्य व्यवहारिक रूप से भारतीय समाज की चेतना और संस्कार का हिस्सा बनें।
दरअसल, संवैधानिक बुद्धिमता और चेतना से बाबा साहेब का तात्पर्य एक ऐसी दृष्टि को लेकर रहा जो राष्ट्र के नागरिकों को यह देखने में मदद करती है कि कब, कहां, कैसे और क्यों न्याय, समता, स्वतंत्रता, गरिमा, बंधुता के मूल्यों की उपेक्षा होती है। आज आजादी की 7 दशकों की लंबी यात्रा के बाद 21वी सदी का भारत विश्व में मजबूत राष्ट्र के रूप में उभरा है। हिंदुस्तान आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है।
भारत में बीते दो दशकों में राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक हर आयाम में बदलाव हुआ है। देश में परिवर्तन की सबसे बड़ी धुरी विज्ञान, प्रौद्योगिकी और हालिया दौर की डिजिटल क्रांति रही है। लेकिन आज डिजिटल क्रांति से भी बढ़कर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी की कृत्रिम बुद्धिमता की चुनौती हमारे नागरिक चेतना व बुद्धिमता के सामने है।
संवैधानिक बुद्धिमता के समानांतर कृत्रिम बुद्धिमता को यदि सरल शब्दों में समझें तो इसका अर्थ है मशीनी बुद्धि से निर्णय लेने की क्षमता। ऐसी काबिलियत जिसे मनुष्य मष्तिष्क के समानांतर मशीन के माध्यम से विकसित किया गया है। एक ऐसा निर्णय जिसे किसी भी स्तर पर एक झटके में मशीन तो ले लेगी लेकिन जिसे लेने के लिए मनुष्य अपनी बुद्धि, क्षमता, विवेक, चेतना, संवेदना, भावना व तर्क की कसौटी का उपयोग करता है।
आज चैट जीपीटी, बार्ड सहित AI के कई मॉडल्स दुनिया को नये सिरे से गढ़ रहे हैं। विजुअल एआई (Visual AI), इंटरैक्टिव एआई (Interactive AI) हो, एनालिटिक एआई (Analytic AI) फंक्शनल एआई हो (Functional AI) के बढ़ते प्रयोग और प्रभाव ने विश्व के वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी और यहां तक की राजनीतिज्ञों को सतर्क कर दिया है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने एक ओर जहां रोजगार का वैश्विक संकट खड़ा किया है तो वहीं एक संकट मनुष्य की बुद्धिमता और चेतनागत व्यवहार को लेकर भी सामने आ रहा है। एआई के आने और उसके विस्तार व व्यवस्था में हस्तक्षेप के बीच भविष्य में भारत के सामने एक नहीं कई चुनौतियां सामने होंगी। कुछ बड़े ज्वलंत सवाल कृत्रिम बुद्धिमता और संवैधानिक बुद्धिमता के समानांतर सामने होंगे - क्या भारत की राजनीतिक, प्रशासनिक और न्याय प्रणाली व नागरिक व्यवस्था संवैधानिक बुद्धिमता से चलेगी या फिर कृत्रिम बुद्धिमता से संचालित होगी?
क्या मनुष्य के मनुष्य के प्रति ही लिए जाने वाले सारे महत्वपूर्ण निर्णय कृत्रिम बुद्धिमता विकृत नहीं करेगी? क्या गरिमा, न्याय, समानता, संवेदना, सहानुभूति और भावना जैसे संवैधानिक मूल्यों का कोई आधार होगा? या फिर मशीनी पैटर्न, तार्किक संजाल या फिर एल्गोरिदम को आधार बनाया जाएगा?
विविधता से भरे देश में एक वृहद मनुष्य समाज की भलाई, उसकी सुख-सुविधाओं, संसाधनों के वितरण में संवैधानिक मूल्यों के बोध का अभाव खतरा नहीं बनेगा? जो कि पहले से ही मौजूद है। अवसरों की असमानता, रोजमर्रा के जीवन में चोटिल होती गरिमा, बाधित होता न्याय यह सबकुछ इसी चमकते भारत की गलियों में रोजाना का हिस्सा है तो आखिर ऐसे में एक मशीनी रोबोट डेटा और प्राप्त सूचना के आधार पर कितना निष्पक्ष और समता दृष्टि से संचालित होगा?
न्याय, रोजगार का अधिकार, गरिमा के साथ जीने का अधिकार कितना हासिल होगा जो कि पहले ही नहीं है। आखिर लोककल्याण की भावना का निर्वहन कैसे होगा? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मनुष्य को समझेगी कैसे? खासकर एजीआई यानी की आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस जिसके खतरे ज्यादा बड़े हैं। देखा जाए तो अभी तो मनुष्य ही मनुष्य के प्रति संवेदनहीन हुआ जा रहा है? क्रूरता, जघन्यता, अन्याय, परस्पर सहिष्णुता का अभाव, कट्टरता की भावना काम कर रही है तो आखिर ऐसे में कृत्रिम बुद्धिमता संवैधानिक बुद्धिमता की तरह निर्णय ले पाएगी? और उन संवैधानिक मूल्यों का ध्यान रख पाएगी जिसकी आज हमारे समाज में सबसे ज्यादा आवश्यकता है। जाहिर है डिजिटल दुनिया के आभासीय संसार में जी रहा मनुष्य समाज बीते एक दशक में कितना संवदेनहीन और विचार शून्य हुआ है यह किसी से छिपा नहीं है।
आखिर एआई कितना और कैसा प्रभाव मनुष्य की चेतना पर डालेगा यह एक गंभीर प्रश्न है। सवाल यह भी उठता है कि क्या एक मनुष्य दूसरे के साथ सद्भावनापूर्ण, प्रेम और करुणा जैसे मूल्यों से शांतिपूर्ण तरीके से आपसी व्यवहार करेगा या फिर वह एक सब्जेक्ट, टास्क और टारगेट बन जाएगा।
क्या हमारा राष्ट्र और समाज नैसर्गिक, नैतिक मूल्यों के साथ संवैधानिक मूल्यों को अपनाकर जीवन को खुशहाल बना पाएगा? या फिर हम सब बतौर नागरिक, एक समाज के रूप में एक मोहल्ला, मकान नंबर, पहचान-पत्र, वित्तीय, जातीय, धार्मिक, प्रोफेशनल पहचान से जाने जाएंगे जो एक मशीन में फीड है?
क्या हम किसी मेटा या गूगल जैसी कंपनी के लिए एक वोटर, खाने-पीने, शॉपिंग करने के तौर-तरीकों, रुचियों के रूप में एक उपभोक्ता डेटा में तब्दील होने जा रहे हैं? (कुछ हद तक हो ही चुके हैं) और अब हमारे जीवन के सारे निर्णय इसी आधार पर एक मशीन लेने जा रही है? आखिर अशिक्षित, असाक्षर, तकनीकी रूप से विपन्न व इंटरनेट साक्षरता के अभाव में जी रही देश की एक बड़ी आबादी के पास एआई किस रूप में प्रभाव डालेगा? एक देश जिसके पास आज भी रोजगार और कुपोषण, भुखमरी जैसे बड़े सवाल सामने हैं आखिर उसके जीवन में एआई क्या करने जा रहा है?
दरअसल, एआई के आने की आहट के बीच यह कुछ ऐसे ज्वलंत सवाल हैं जो इस समय बड़े तो नहीं दिखाई दे रहे हैं लेकिन बेहद सूक्ष्म स्तर पर कुछ ही समय में यह हमारे सामने होंगे। दरअसल, उपरोक्त प्रश्न एआई और भारत के भविष्य के संबंध में बेहद महत्वपूर्ण हैं। आज तकनीकी विकास के चरम् की ओर बढ़ रही दुनिया में भारत का नागरिक समाज, और वह स्वयं एक राष्ट्र के रूप में किस दिशा में बढ़ने जा रहा है?
यहां आज भी व्यवस्थाएं और संस्थाएं व उसकी मशीनरी संवैधानिक प्रदत्त मूल्यों, संस्कारों, चेतना और बुद्धिमता के अभाव में संचालित है, जिसके भीषण प्रभाव सामने हैं। न्यायालयों में करोड़ों केस लंबित हैं, शिक्षा, बेरोजगारी, प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्थाएं, मूलभूत जीवन जीने के संसाधन व अधिकार, पेयजल से लेकर भुखमरी, कुपोषण, गरीबी, अपराध, लैंगिक असमानता, बाल-अपराध, बंधुआ मजदूरी, किसान आत्महत्या, बढ़ती महंगाई, जनसांख्यकीय दबाव, विस्थापन, सांप्रदायिकता, जातिवादी, छुआछूत, महिला उत्पीड़न के लगातार बढ़ते मामले, आखिर ऐसी सामाजिक व्यवस्था जहां पहले संवैधानिक मूल्यों और बुद्धिमता के अभाव में धराशायी हैं, तो वहां कृत्रिम बुद्धिमता संकट कम करेगी या बढ़ाएगी?
क्या न्याय, समता, स्वतंत्रता, गरिमा, बंधुता जैसे मूल्यों को आधार पर बनाकर विकास कार्यों और जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लिए जाएंगे? क्या एआई संचालित व्यवस्था से केवल और केवल मुनाफे, शोषण और तर्कों के आधार पर पक्षपाती फैसले लेने का खतरा बढ़ेगा नहीं? क्या मशीनें अदालतों में न्याय करेंगी? यदि हां तो फिर न्याय का सम्मान होगा? क्या एआई का उपयोग उस न्याय के प्रति उस गरिमा, संवेदना और समता के मूल्य के प्रति निष्पक्ष होगा?
आज विचारणीय प्रश्न यह है कि जब कृत्रिम बुद्धिमता भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के हर आयाम में प्रभावी होगी जैसा कि डिजिटल और इंटरनेट की दुनिया प्रभावी है तो फिर कल्याणकारी राज्य की स्थापना का उद्देश्य पूरा होगा? निश्चित ही डिजिटल टेक्नॉलॉजी के प्रभाव और हस्तक्षेप ने व्यवस्था के भीतर पारदर्शिता और संचालन में सुचारू स्वरूप दिया है। बैंकिंग प्रणाली में हाशिये के और एक बड़े गरीब तबके तक सेवाएं और धनराशि पहुंचाई है लेकिन दूसरी ओर साइबर क्राइम ने एक अलग संकट खड़ा किया है।
सवाल यह भी है कि क्या संवैधानिक मूल्यों, संस्कारों के अभाव में हम एआई का ठीक से उपयोग कर पाएंगे? या फिर उसके दुरुपयोग की संभावनाएं ज्यादा होंगी? उद्योग, व्यापार, शिक्षा, चिकित्सा, इंफ्रास्ट्रक्चर, अर्थतंत्र, समाजतंत्र, राजनीति, प्रशासनिक मशीनरी में गहरे तक पैठ बनाने की क्षमता रखने वाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्षमता का मूल्यांकन आखिर होगा कैसे? क्या एआई से होने वाला इलाज, न्याय, सेवा केवल गणनाओं और फॉर्मूला अप्लाय कर होगा या फिर एक मनुष्य की भावना भी उसके पीछे कार्य करेगी? क्या ऐसी कृत्रिम बुद्धिमता मनुष्य के नैसर्गिक मूल्यों, प्रेम, करुणा, संवेदना, सहानुभूति, भावना जैसे मूल्यों को सहेज पाएगी?
बात यदि भारत जैसे राष्ट्र की करें तो यहां खतरे दूसरे किस्म के हैं। देश में किसी भी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और विकासात्मक प्रक्रिया के भीतर संवैधानिक संस्कारों का होना आज भी चुनौती है। यहां पहले से ही संवैधानिक मूल्यों, न्याय, समता, स्वतंत्रता, गरिमा बंधुता की उपेक्षा हो रही है। आजादी के बाद से अब तक संवैधानिक मूल्यों के हिसाब से ना नागरिक चेतना विकसित हुई है ना बुद्धिमता जागृत हुई है। आखिर अनियंत्रित रूप से क्रियाशील होने वाले एआई के प्रभाव भारतीय समाज और लोकतंत्र के लिए कैसे होंगे? क्या एआई का इस्तेमाल गलत तरीके से होने का खतरा नहीं बढ़ेगा? क्या यह शोषण का आधार नहीं बनेगा? क्या यह आपसी वैमनस्य, सांप्रदायिक सद्भाव, स्त्री, पुरुष, बच्चों की गरिमा से छेड़छाड़ के मामलों में इजाफा नहीं करेगा जो पहले से ही डिजिटल युग में आसान तो हुए ही हैं बल्कि बढ़ भी गए हैं?
क्या न्याय को लेकर इसकी उपयोगिता संदेहापस्पद नहीं होगी? या फिर जिन भी क्षेत्रों में इसका उपयोग होगा क्या वह ऐसी चेतना, बुद्धि और इरादों से होगा जिसके पास मनुष्यता को देखने की समान दृष्टि ना हो। जाहिर है यदि इन सवालों को हमारे बौद्धिक वर्ग ने नहीं तलाशा तो आने वाला समय लोकतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों के लिए कैसा होगा?
इस संदर्भ में महत्वपूर्ण यह है कि पश्चिम में एआई पर हो रही तमाम तरह की रिसर्च के बीच इस तरह के सवाल सामने आने लगे हैं। क्या भारत यह प्रश्न चिंता के दायरे में शामिल होंगे?
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