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क्या आप भी बुरी यादों से घिरे हैं: उम्र चाहे जितनी भी हो, मन में थोड़ा-सा खुलापन बनाए रखना जरूरी

Sun, 18 Jan 2026 06:08 AM IST
लव गौर क्रिस्टीना कैरन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
क्रिस्टीना कैरन, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: लव गौर Updated Sun, 18 Jan 2026 06:08 AM IST
सार

जिंदगी के कठिन पलों में मन सबसे पहले जिस चीज की तलाश करता है, वह है क्लोजर, यानी बुरे अनुभव का अंत, लेकिन जरूरी नहीं कि यह हमेशा फायदेमंद ही हो।

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Are you also haunted by bad memories No matter your age, it's important to maintain little openness in mind
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : gemini-AI

विस्तार

जब जिंदगी कोई दर्दनाक या कठिन झटका देती है, तो हमारी पहली स्वाभाविक प्रतिक्रिया उसके कारणों का पता लगाने की होती है। ऐसे में, हम क्लोजर यानी उस बुरे अनुभव का अंत चाहते हैं।
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विशेषज्ञों के अनुसार, यह कई लोगों के लिए उपचार का अहम जरिया बन सकता है। मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर एरी डब्ल्यू क्रुगलांस्की के शब्दों में,  बुरे अनुभव का अंत निर्णय लेने और प्रतिबद्ध होने में तो मदद कर सकता है, लेकिन ऐसा न होने पर जीवन मुश्किल हो सकता है। दूसरी तरफ, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें इस तरह के क्लोजर की जरूरत नहीं होती। ऐसे लोग निर्णय लेने में कुछ अधिक समय ले सकते हैं, पर ये अनिश्चितता को बेहतर ढंग से सहन करते हैं और अपेक्षाकृत अधिक खुले विचारों वाले होते हैं।
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हालांकि, जब भविष्य को लेकर आत्मविश्वास डगमगाता है, समय का दबाव बढ़ता है या व्यक्ति मानसिक रूप से थका होता है, तब उसे बुरे अनुभव के अंत की तीव्र इच्छा होती है। नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के प्रोफेसर डैन पी मैकएडम्स के अनुसार, जो लोग जीवन से संतुष्ट होते हैं, वे अपने अतीत की नकारात्मक घटनाओं को ऐसी कहानियों में ढाल लेते हैं, जो उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। वहीं, जो लोग लगातार संघर्ष कर रहे होते हैं, वे ऐसा कम कर पाते हैं।
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ड्रेक यूनिवर्सिटी की समाजशास्त्र की प्रोफेसर नैन्सी बर्न्स के अनुसार, क्लोजर (बुरे अनुभव का अंत) का विचार हमें इस वादे के साथ आकर्षित करता है कि हमारा दर्द खत्म हो जाएगा। पर उनके मत में, जीवन में खुशी और शोक, दोनों के लिए जगह होनी चाहिए, क्योंकि कई बार वे एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं। हालांकि, डॉ. क्रुगलांस्की के अनुसार, बुरे अनुभव के अंत का मतलब हमेशा अच्छा महसूस करना नहीं होता। वह इस बात पर निर्भर करता है कि आप प्राप्त जानकारी को कितना स्वीकार कर पाते हैं और उस पर कितना भरोसा करते हैं।


मनोवैज्ञानिक डॉ. डैन मैकएडम्स के मुताबिक, बुरे अनुभव के अंत को किसी स्थायी समाधान के बजाय अस्थायी समझौते की तरह देखना बेहतर है, क्योंकि कई बार हम उन्हीं मुद्दों पर दोबारा सोचते हैं, जिन्हें कभी सुलझा हुआ मान लिया था। इसलिए, उम्र चाहे जितनी भी हो, मन में थोड़ा-सा खुलापन बनाए रखना भी जरूरी है। 
The New York Times 2026
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