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हर महीने एक त्रासदी: भीड़ प्रबंधन के नाम पर औपचारिकता

Mon, 03 Nov 2025 02:50 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 03 Nov 2025 02:50 PM IST
सार

सितंबर में तमिलनाडु के चेंगलपट्टू जिले में भगदड़ में लगभग 40 लोग मारे गए, अगस्त में मध्य प्रदेश के शिवपुरी में चार श्रद्धालुओं की जान गई, जुलाई में उत्तर प्रदेश के हाथरस में दो और उत्तराखंड के हरिद्वार में छह लोग मरे, जून में ओडिशा के पुरी में तीन और कर्नाटक के बेलगावी में 11 श्रद्धालु काल के ग्रास बने।

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Andhra Pradesh A tragedy every month: formality in the name of crowd management
श्री वेंकटेश्वर मंदिर में हादसा - फोटो : ANI+PTI

विस्तार

किसी ने कभी भगदड़ को परिभाषित करते हुए कहा था कि यह एक “भयानक अपराध है, जिसे लगभग निर्दोष लोगों के समूह द्वारा किया जाता है।” दुर्भाग्यवश, भारत अक्सर इस “अपराध” का स्थल बनता जा रहा है। भगदड़ की हर खबर हमारे समाज और शासन-प्रणाली पर एक नया कलंक छोड़ जाती है।

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आंध्र प्रदेश के तिरुपति स्थित वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में हुई ताज़ा भगदड़ में नौ लोगों की मौत ने एक बार फिर यही याद दिला दिया कि भारत में भीड़ प्रबंधन अब भी किस्मत के भरोसे चलता है। प्रशासन, पुलिस और आयोजन समितियां हर बार जांच और मुआवजे का राग अलापती हैं, मगर हकीकत यह है कि न तो किसी को सज़ा मिलती है और न कोई सबक सीखा जाता है।
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किसी ने सही कहा है कि भगदड़ एक भयानक अपराध है जिसे निर्दोष लोगों के समूह द्वारा किया जाता है।

यह अपराध इसलिए दोहराया जाता है क्योंकि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था इसे अपराध मानती ही नहीं। वह इसे दुर्घटना कहकर रफा-दफा कर देती है। केवल एक वर्ष पर नज़र डालें तो तस्वीर भयावह है।
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एक साल में हुईं कई त्रासदियां

सितंबर में तमिलनाडु के चेंगलपट्टू जिले में भगदड़ में लगभग 40 लोग मारे गए, अगस्त में मध्य प्रदेश के शिवपुरी में चार श्रद्धालुओं की जान गई, जुलाई में उत्तर प्रदेश के हाथरस में दो और उत्तराखंड के हरिद्वार में छह लोग मरे, जून में ओडिशा के पुरी में तीन और कर्नाटक के बेलगावी में 11 श्रद्धालु काल के ग्रास बने।

साल की शुरुआत ही आंध्र प्रदेश के तिरुपति में भगदड़ से हुई थी। उसके बाद कुंभ मेले में, दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर और महाराष्ट्र के नासिक में भी ऐसी घटनाएँ हुईं। इन सबके बावजूद कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई गई जो यह सुनिश्चित कर सके कि अगली भीड़ त्रासदी न हो।

अंतरराष्ट्रीय तुलना: लापरवाही का परिणाम, नियति नहीं

अक्सर कहा जाता है कि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में ऐसी घटनाएँ टाली नहीं जा सकतीं। मगर यह तर्क सच नहीं है। अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी लाखों लोग धार्मिक, राजनीतिक या खेल आयोजनों में शामिल होते हैं। फिर भी वहाँ भगदड़ें अब विरल हैं। अमेरिका में आखिरी बड़ी भगदड़ 2023 में हुई थी, जिसमें केवल दो लोगों की मौत हुई, और उससे पहले 2021 में।

चीन में भी 2014 में शंघाई में हुए नववर्ष उत्सव के दौरान 62 मौतों के बाद सरकार ने भीड़ नियंत्रण के लिए कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किए। उसके बाद वहां ऐसी घटनाएँ लगभग बंद हो गईं। यह साबित करता है कि भगदड़ें नियति नहीं बल्कि लापरवाही का परिणाम हैं। भारत में पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के पास ‘क्राउड कंट्रोल एंड क्राउड मैनेजमेंट’ पर विस्तृत दिशानिर्देश मौजूद हैं।

इनमें प्रवेश और निकास मार्गों की चौड़ाई, भीड़ की गति, बैरिकेडिंग, आपातकालीन निकासी, संचार प्रणाली और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की भूमिका तक विस्तार से बताई गई है। लेकिन इन दिशानिर्देशों का पालन कितने आयोजनों में होता है? लगभग किसी में नहीं।

तिरुपति घटना और ऐतिहासिक भगदड़ें

तिरुपति की हालिया घटना में भी पुलिस ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें आयोजन की जानकारी ही नहीं थी। सवाल यह है कि जब बीस हजार श्रद्धालु इस कार्यक्रम की तैयारी में शामिल थे, तो पुलिस को सूचना कैसे नहीं थी? यह केवल असमर्थता नहीं, बल्कि प्रशासनिक बेईमानी का मामला है।

भारत में भगदड़ों का इतिहास दशकों पुराना है। 1988 में मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर में 50 श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैनादेवी मंदिर में भगदड़ से 162 लोगों की जान गई।

2013 में मध्य प्रदेश के रतलाम में मंदिर के पास पुल पर भगदड़ से 115 मौतें हुईं। 2016 में वाराणसी के मालवीय पुल पर धार्मिक शोभायात्रा के दौरान भगदड़ में 25 लोगों की जान गई और 2022 में जम्मू के माता वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ से 12 श्रद्धालु मारे गए।

कारण और समाधान की अनदेखी

पुलिस और प्रशासन हर बार दावा करता है कि व्यवस्थाएँ संतोषजनक थीं, जबकि मौतें यह साबित करती हैं कि सब कुछ कागजों पर था। भगदड़ों के पीछे मुख्य कारण वही हैं- जनसमूह का गलत आकलन, अपर्याप्त निकास मार्ग, स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता और जनता व मीडिया की अल्पकालिक स्मृति। आयोजक यह मान लेते हैं कि श्रद्धालु स्वयं अनुशासन बनाए रखेंगे।

अधिकांश मंदिरों, मेलों और रेलवे प्लेटफॉर्मों पर एक ही संकरी गली या दरवाजा होता है। पुलिस और प्रशासन आयोजन के पहले और बाद में फोटो सेशन तक सीमित रहते हैं। कुछ दिन बाद कोई भी उन मरे हुए लोगों का नाम तक याद नहीं रखता।

यदि चीन ने अपने अनुभवों से सीख लेकर ठोस कदम उठाए, तो भारत क्यों नहीं? हर बड़े आयोजन के लिए पहले से यह आकलन किया जा सकता है कि कितने लोगों के आने की संभावना है। इसके लिए आधुनिक तकनीक और ‘क्राउड सिमुलेशन’ सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जा सकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को भीड़ प्रबंधन प्रोटोकॉल को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाना चाहिए।

पुलिस और स्वयंसेवकों को भीड़ के व्यवहार और मनोविज्ञान पर प्रशिक्षण दिया जाए। ड्रोन और कैमरों की मदद से भीड़ की गति, ठहराव और दबाव बिंदुओं की निगरानी रीयल टाइम में की जा सकती है। सबसे जरूरी है जवाबदेही तय करना—हर घटना के बाद “अज्ञात कारणों” की जांच से आगे बढ़कर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

चेतावनी और बदलाव की आवश्यकता

भारत जैसे विविध और आस्थापूर्ण देश में भीड़ का जुटना अवश्यंभावी है, लेकिन भीड़ का कुचलना नहीं। हर महीने एक नई भगदड़ केवल यह बताती है कि हमने न तो तकनीक से सीखा, न प्रशासनिक ईमानदारी से। मंदिरों, मेलों और रेलवे स्टेशनों की भीड़ में हर बार वही भय, वही अफरातफरी, वही जानलेवा गलती दोहराई जाती है।

भगदड़ें किसी प्राकृतिक आपदा की तरह नहीं आतीं, वे हमारे समाज की अव्यवस्था, प्रशासन की उदासीनता और जिम्मेदारी की कमी का प्रतीक हैं। यदि हम अब भी नहीं चेते, तो अगली त्रासदी केवल ‘कब’ और ‘कहाँ’ होगी—यही सवाल बाकी रह जाएगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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