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पंछियों के स्मृति गीत: आकाश के जादूगर सारस क्रेन का अनूठा संसार

Thu, 17 Feb 2022 01:45 PM IST
Radhika Bhagat राधिका भगत
Updated Thu, 17 Feb 2022 01:45 PM IST
सार

क्या आप जानते हैं, संस्कृत का पहला श्लोक और वाल्मीकि रामायण की रचना, दोनों ही सारस के एक जोड़े से प्रेरित है? कहा जाता है की एक दिन ऋषि वाल्मीकि तमसा नदी में स्नान करने के लिए निकले। थोड़ी दूर पर एक नर और मादा सारस पक्षी थे, जो पूरी तरह से एक दूसरे में लीन थे।

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An unforgettable song The Astounding story of stork crane
सारस दुनिया का सबसे बड़ा उड़ने वाला पक्षी है और आई. यू. सी. एन  रेड लिस्ट मे वल्नरबल घोषित किया गया है। - फोटो : फोटो: राहुल सिंह

विस्तार

क्या आप जानते हैं, संस्कृत का पहला श्लोक और वाल्मीकि रामायण की रचना, दोनों ही सारस के एक जोड़े से प्रेरित है? कहा जाता है की एक दिन ऋषि वाल्मीकि तमसा नदी में स्नान करने के लिए निकले। थोड़ी दूर पर एक नर और मादा सारस पक्षी थे, जो पूरी तरह से एक दूसरे में लीन थे।

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ऋषि के देखते ही एक शिकारी ने अपने बाण से नर पर प्रहार किया और नर पक्षी चीत्कार करते गिर पड़ा। मादा पक्षी इस शोक से व्याकुल होकर विलाप करने लगी। इस दुखद घटना से वाल्मीकि ऋषि के मुख से अनायास ही शिकारी के लिए एक श्राप निकल गया जो की कविता और लय में परिपूर्ण संस्कृत का पहला श्लोक था।
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मा निषाद ! प्रतिष्ठां त्वम् गमः शाश्वतिः समाः
यत् क्रौञ्चनां मिथुनादेकंसवधि काममोहितं ||

 


उपरोक्त श्लोक का अर्थ कुछ इस प्रकार है- 

 

हे निषाद! तुझे कभी भी शांति और प्रतिष्ठा न मिले क्योंकि तूने इस क्रौंच पक्षी को बिना किसी अपराध के ही मार डाला। इस घटना की उपरांत, ब्रह्माजी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य की रचना की। सरस शब्द संस्कृत शब्द "सरसा" से आया है, जिसका अर्थ है "झील का पक्षी"।

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कहानी सरसा क्रेन की 

सारस क्रेन न केवल भारतीय, बल्कि दुनिया के कई देशों जैसे की नेपाल, विएतनाम, चीन, कोम्बोडिया की संस्कृति में उल्लेखित है और इन्हें प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। 


हमारी प्राचीन सभ्यताओं में कुछ जानवरों और पक्षियों को पुज्य दर्शाया गया है। यहां तक कि जंगल, पर्यावरण और इसके तत्वों के प्रति भी भारतीय पौराणिक कथाओं में श्रधा प्रकट की गई है। गोंडी जनजाति के लोग सारस क्रेन को पवित्र मानते हैं (बर्डलाइफ इंटरनेशनल, 2001)। प्राचीन हिंदू शास्त्रों में सारस का मांस वर्जित माना जाता था (बोर्ड एट अल।, 2001)।


यह दुनिया का सबसे बड़ा उड़ने वाला पक्षी है और आई. यू. सी. एन  रेड लिस्ट मे वल्नरबल घोषित किया गया है। सारस क्रेन उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के कृषि क्षेत्रों और बाढ़ के मैदानों में पाए जाते हैं।  


उदहारण तौर, दक्षिण पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वेटलॅंड और मुख्यतः चावल के खेतों में ये देखे जा सकते हैं। उनके जटिल व्यवहारों की श्रृंखला में एक व्यवहार युगल है, जहां नर और मादा समन्वय में गाते हैं। 

An unforgettable song The Astounding story of stork crane
सारस क्रेन न केवल भारतीय, बल्कि दुनिया के कई देशों जैसे की नेपाल, विएतनाम, चीन, कोम्बोडिया की संस्कृति में उल्लेखित है और इन्हें प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।  - फोटो : फोटो: राहुल सिंह

हमारे बचपन में सारस 

बचपन में जब भी हम गर्मियों की छुट्टियों में परिवार सहित कहीं घूमने निकलते तो रेलगाड़ी से सफर किया करते। खिड़की के बाहर हरे-भरे खेतों को निहारते समय बहुत से सारस पक्षी हमें दिखाई देते, और मैं और मेरी बेहने इनकी गिनती किया करती थीं।

हमारे दादा दादी के खेतों में ये पक्षी सावन के महीनों में जोर से पुकारते और नाचते हुए आम दिखाई दिया करते थे। कभी-कभी फसलों के बीच इनके घोसले मिलने पर हम उस पूरे इलाके की निगरानी करते ताकि कोई भी उनके अंडों या बच्चों को परेशान ना करे।
 
क्या बच्चों में प्रकृति की तरफ कुदरती प्रेम होता है? और अगर ये सच है तो फिर ये प्रेम, उदासीनता में कब और कैसे परिवर्तित हो जाता है? यह गंभीरता से सोचने की बात है।

भारत में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जहां फसलों के उत्पादन में कीटनाशकों का इस्तेमाल न किया जाता हो। नतीजतन, कीटनाशकों का प्रयोग और इनके प्राकृतिक आवास का विनाश इस उत्तर प्रदेश के राज्य पक्षी के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

An unforgettable song The Astounding story of stork crane
गोंडी जनजाति के लोग सारस क्रेन को पवित्र मानते हैं (बर्डलाइफ इंटरनेशनल, 2001)। - फोटो : फोटो: राहुल सिंह

शायद हम इस कल्पना में रहते हैं कि यह सारस हमारे बीच हमेशा रहेंगे और उनकी आवाज जंगलों और खेतों में रोज गूंजेगी। यह मुझे 60 के दशक के आविष्कारक और रेडियो पायनियर, गुग्लिएल्मो मार्कोनी की अद्भुत कहानी की याद दिलाता है। मार्कोनी का यह विश्वास था की वह एक ऐसा उपकरण बनाएंगे जिससे वह बीते हुए समय की ध्वनियां एक बार फिर सुन सकेंगे।

मार्कोनी को यकीन हो गया कि ध्वनियां कभी नहीं मरती। कितना मनमोहक हो अगर मोजार्ट्स की फर्स्ट सिम्फनी, अपने प्रेमी के प्यार का पहला इजहार, अपने बच्चे की पहली हंसी की आवाज को हम दोबारा सुन सकें और वे सभी बेशकीमती यादें, हमेशा के लिए इन आवाजों में सीटें हुई रहें।

लेकिन जैसा हम जानते हैं, यह एक व्यर्थ सपना था और यह सभी ध्वनियाँ चाहे हमें कितनी भी प्रिय हों, समय के विस्तार में हमेशा के लिए खो जाती हैं। और यही वास्तविकता से मुझे डर लगता है की कहीं इन सारस के गीत, इनके विलुप्त होने पर बस सिफ हमारी यादों में ही ना गूंजती रह जाए।


नोट: राधिका भगत एक वन्यजीव संरक्षणवादी हैं जिन्होंने पिछले एक दशक में भारत और पड़ोसी देशों में विभिन्न संरक्षण मुद्दों पर काम किया है। वह एक आध्यात्मिक साधक, योग शिक्षक भी हैं।


यह श्रंखला 'नेचर कन्जर्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशंस' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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