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एक बार तो आंख खोलो ना पापा…: आईसीयू का एक अनुभव, जो जीवन का आईना दिखा गया

Tue, 14 Apr 2026 08:28 PM IST
Surendra Joshi Surendra Joshi
Updated Tue, 14 Apr 2026 08:28 PM IST
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An Experience in the ICU That Held Up a Mirror to Life
AI जनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : AI

इंदौर के एक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के आईसीयू में बिताए गए 36 घंटे मेरे लिए सिर्फ समय का एक हिस्सा नहीं थे, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच चल रहे उस अदृश्य संघर्ष का साक्षात्कार थे, जिसे हम अक्सर देख नहीं पाते या देखना नहीं चाहते। 

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आईसीयू… जहां मशीनों की आवाजें ही संवाद बन जाती हैं और इंसानी भावनाएं आंसुओं में बहती हैं। वहां हर बिस्तर पर एक कहानी थी- कहीं उम्मीद की धीमी लौ, तो कहीं बुझते जीवन का सन्नाटा। इन्हीं कहानियों के बीच एक बुजुर्ग की अधेड़ उम्र बेटी की करुण पुकार- 'एक बार तो आंख खोलो ना पापा…', बार-बार मेरे कानों में गूंजती रही और अब भी गूंज रही है।
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अस्पताल के नियमों के अनुसार दिन में केवल दो बार सिर्फ एक परिजन को मरीज से मिलने की अनुमति थी। हर बार बुजुर्ग की बेटी आती और अपने मरणासन्न पिता के सिरहाने खड़ी होकर, यही गुहार लगाती थी। उसकी आवाज में विनती थी, बेबसी थी, और एक आखिरी उम्मीद थी, लेकिन मृत्यु की दहलीज पर खड़े पिता उस पुकार को सुन नहीं पा रहे थे। 
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कुछ ही पलों में उसकी आंखों से निर्झर आंसू बहने लगते और वह फफक कर रो पड़ती। आईसीयू का महिला स्टाफ उसे सांत्वना देते हुए धीरे से गहन चिकित्सा कक्ष के बाहर कर देता। आईसीयू के उस माहौल में यह दृश्य सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं था, बल्कि जीवन के सबसे कठोर सत्य का आईना था कि एक दिन सब कुछ छूट जाना है। 

जिस पिता ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वही एक दिन खामोशी से विदा ले लेता है… और पीछे रह जाती हैं सिर्फ यादें, रिश्ते की अमर कहानी और अनसुनी पुकार...। यही वह क्षण होता है, जब हम इस संसार की असारता को समझ सकते हैं, लेकिन समझे कौन? मसानिया वैराग्य श्मशान की चारदीवारी से बाहर निकलते ही खत्म हो जाता है और व्यक्ति फिर मेरी-तेरी में लग जाता है। 

क्या होता है ऐसा?
अद्वैत वेदांत के प्रतिपादक आदि गुरु भगवान शंकराचार्य ने कहा है- ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः। यानी यह संसार नश्वर है, सत्य केवल ब्रह्म है। हम केवल शरीर नहीं, बल्कि उसी ब्रह्म का अंश हैं- अविनाशी, शाश्वत। फिर भी हम जीवन भर इसी माया के जाल में उलझे रहते हैं- रिश्तों, इच्छाओं और मोह के बंधनों में बंधे रहते हैं। शायद इसलिए जब जीवन की अंतिम घड़ी आती है, तब हमें अहसास होता है कि जो कुछ हम अपना मानते थे, वह सब यहीं रह जाने वाला है।


इसलिए संत कबीरदास की ये पंक्तियां 'जिन खोजा तिन पाईयां, गहरे पानी पैठ…' आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं, क्योंकि जो जीवन के इस गहरे सत्य को समझने की कोशिश करता है, वही वास्तव में जीवन को जान पाता है। भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल से सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई और वही कमल यह संदेश देता है कि जीवन या जगत में जल में खिलने वाले कमल की भांति निर्लिप्त और निर्मल रहना चाहिए। दुनिया के किसी गुण या अवगुण से परे निष्काम कर्मयोगी की तरह।

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