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अमेरिका के इस बड़े फैसले से उड़ी अफगानिस्तान सरकार की नींद, चिंता में भारत

Sat, 02 Feb 2019 05:34 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Sat, 02 Feb 2019 05:34 PM IST
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america donald trump agrees to pull out' troops from afghanistan taliban officials
अमेरिका और तालिबान अठारह साल संघर्ष के बाद थक -हार कर समझौते की मेज़ पर हैं। - फोटो : Instagram

तो आखिरकार अमेरिका और तालिबान अठारह साल संघर्ष के बाद थक -हार कर समझौते की मेज़ पर पहुंच ही गए। दो हज़ार एक में ओसामा बिन लादेन की तलाश में अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से हटाया था और वहां  निर्वाचित सरकार ने काम शुरू किया था। नाटो देशों की सेना ने इस सरकार को अपना संरक्षण दिया और तालिबान से लड़ाई जारी रखी। इस लड़ाई में दोनों पक्षों ने अठारह साल के दौरान भारी नुकसान उठाया।

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इस संघर्ष का कोई स्थाई नतीजा नहीं निकल रहा था और दोनों ओर से बातचीत कर किसी शांति समझौते पर पहुंचने का अंदरूनी दबाव भी था। अमेरिकी सैनिकों के परिवार अपने उन सदस्यों के लिए परेशान हैं ,जो बरसों से वहां लड़ रहे हैं।
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डोनाल्ड ट्रंप को भी यह अहसास हो चला था कि उनके देश को इस लड़ाई में अब पाने के लिए कुछ भी नहीं है। दूसरी ओर तालिबान को भी अंदाज़ा हो चला था कि नाटो सैनिकों की मौजूदगी उनके लिए कभी भी सत्ता का रास्ता नहीं खोलेगी, इसलिए साझा दुश्मन आईएस के सफाए के संकल्प ने दोनों को संधि के क़रीब ला दिया। 

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america donald trump agrees to pull out' troops from afghanistan taliban officials
तालिबान अरसे से तीन मोर्चों पर लड़ रहा है। - फोटो : फाइल फोटो

तालिबान से कैसे  निपटेगी अफगानिस्तान सरकार
दरअसल, तालिबान अरसे से तीन मोर्चों पर लड़ रहा है। अफ़ग़ान सरकार की सेना,नाटो सेना और आईएस के ख़िलाफ़ उसने समान मोर्चा खोल रखा था। मुल्क़ के उत्तरी भाग से तालिबान ने आईएस का एक तरह से ख़ात्मा कर दिया। अब उसका ध्यान अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सेना की वापसी पर है। इसके बाद अंत में वह अफ़ग़ानिस्तान सरकार और सेना से निपटेगा।

तालिबान जानते हैं कि नाटो फ़ौज़ की विदाई के बाद उनके देश की सरकार निर्बल हो जाएगी और उससे मुक़ाबला कोई बड़ी समस्या नहीं रह जाएगा, इसीलिए उसने अमेरिका के साथ समझौते की मेज़ पर अफगानी सरकार को दूर ही रखा। क़तर में सप्ताह भर चली शिखर वार्ताओं के बाद तालिबानी प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने एक महीने में आईएस का पूरी तरह ख़ात्मा कर देने का दावा किया है। हालांकि उसने यह आरोप भी लगाया है कि अमेरिका और अफगानिस्तान सरकार ने ही आईएस को पनपने के मौक़े दिए हैं।
 

 

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तालिबान आतंकवादियों और अमेरिका के बीच समझौते की ख़बरें हिन्दुस्तान के लिए चिंता का सन्देश लेकर आई हैं। - फोटो : ANI

सुहैल का कहना है कि अमेरिका से समझौता हो जाने के बाद ही वह अफ़ग़ान सरकार से कोई चर्चा करेगा। अमेरिका चाहता है कि तालिबान अफगान सरकार से भी साथ साथ बातचीत करे। अशरफ गनी सरकार की चिंता का एक कारण यह भी है कि अगर अमेरिकी सेना चली गई तो वह तालिबान से कैसे मुक़ाबला करेगा?      
 

भारत के लिए चिंता का विषय
दरअसल, तालिबान आतंकवादियों और अमेरिका के बीच समझौते की ख़बरें हिन्दुस्तान के लिए चिंता का सन्देश लेकर आई हैं। अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण और आधारभूत संरचना- ढांचे के विकास में भारत का काम ज़ोर शोर से चल रहा है। तालिबान मज़बूत हों और अफ़ग़ानिस्तान सरकार कमज़ोर हो- दोनों ही स्थितियां भारत की उलझने बढ़ाने वाली हैं। अगर ऐसा कोई फॉर्मूला निकला,जिसमें तालिबान सरकार में शामिल होते हैं तो भी यह भारतीय हित में नहीं होगा।

तालिबान आतंकवादियों की पाकिस्तान इकाई पाकिस्तान के वजीरिस्तान इलाक़े में अपनी समानांतर सत्ता चला रही है। प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी के तालिबानियों से मधुर रिश्ते रहे हैं। मदरसों में शिक्षा के नाम पर उनकी पार्टी अंतर्राष्ट्रीय दान का पैसा  तालिबान को मुहैया कराती रही है। इसके अलावा ईरान में चाबहार बंदरगाह का उपयोग भारत अफ़ग़ानिस्तान के लिए और अन्य देशों तक माल पहुँचाने में करता है।

पाकिस्तान और चीन चाबहार बंदरगाह को फूटी आंखों नहीं देखते। अगर तुलना करें तो पाते हैं कि पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह से चीन को जो लाभ मिलता है उसके मुक़ाबले में चाबहार भारत के लिए अधिक उपयोगी है। भारत की इस चिंता से अमेरिका को भी कुछ लेना-देना नहीं है। ईरान से तेल आयात नहीं रोकने के कारण अमेरिका और भारत के संबंधों में पहले जैसी ऊष्मा नहीं रह गई है। इस हाल में भारत के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। लोकसभा चुनाव के शोर में भी भारत को अपनी इस समस्या पर विचार करना ज़रूरी है।  

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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