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दिल्ली-एनसीआर ही नहीं पहाड़ भी वायु प्रदूषण की चपेट में, लोगों की औसत उम्र हो रही है कम

Sun, 03 Nov 2019 11:46 AM IST
Prakash Upretti प्रकाश उप्रेती
Updated Sun, 03 Nov 2019 11:46 AM IST
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Air pollution in uttarakhand increasing, new report claim
दिल्ली-एनसीआर ही नहीं बल्कि पहाड़ी राज्य उत्तराखंड भी जानलेवा वायु प्रदूषण की चपेट में है। - फोटो : डेमो

दिल्ली-एनसीआर ही नहीं बल्कि पहाड़ी राज्य उत्तराखंड भी जानलेवा वायु प्रदूषण की चपेट में है। प्रदूषण की वजह से लोगों की औसत उम्र घट रही है जो कि चिंता का विषय है। दिल्ली में तो आप देख ही रहे हैं कि किस कदर दिवाली के बाद आसमां में अचानक स्मॉग ने लोगों के सामने कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं खड़ी कर दी है। वहीं, नोएडा से सटे गाजियाबाद ने वायु प्रदूषण के मामले में दिल्ली का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया है। लेकिन वायु प्रदूषण की यह समस्या यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि पहाड़ी सूबे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

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वायु प्रदूषण की वजह से कम हो रही पहाड़ के लोगों की उम्र!
एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स के मुताबिक, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर की वायु गुणवत्ता अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा निर्देशों के अनुरूप होती तो यहां के लो क्रमशः 4.1 वर्ष, 6.6 वर्ष और 6.1 वर्ष ज्यादा जी सकते थे। दरअसल, उत्तराखंड में वायु प्रदूषण पर ऐसे ही चिंता नहीं जताई जा रही है एक रिपोर्ट ने इस तरफ ध्याकर्षण किया है। शिकागो यूनिवर्सिटी- एपिक (एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो) की तरफ से जारी वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक में सूबे की वायु प्रदूषण की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई गई है। एपिक का नया विश्लेषण दर्शाता है कि उत्तराखंड में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति राज्य के नागरिकों की ‘जीवन प्रत्याशा’ को औसतन 4.2 वर्ष कम कर रहा है। अगर वायु प्रदूषण की स्थिति मानकों के अनुरूप होती तो इस पहाड़ी सूबे के लोगों की उम्र बढ़ सकती थी।
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Air pollution in uttarakhand increasing, new report claim
शुद्ध हवा और पानी के लिए जिन पहाड़ों को जाना जाता है वो भी अगर वायु प्रदूषण की चपेट में आ जाए तो समझिए स्थिति वाकई में बेहद गंभीर है। - फोटो : PTI
इस गंभीर स्थिति की तरफ क्यों नहीं जा रहा हमारा ध्यान?
शुद्ध हवा और पानी के लिए जिन पहाड़ों को जाना जाता है वो भी अगर वायु प्रदूषण की चपेट में आ जाए तो समझिए स्थिति वाकई में बेहद गंभीर है। यह बात भी सही है कि उत्तराखंड में जहां एक तरफ मैदानी भागों के वायु प्रदूषण को जांचने की व्यवस्था है, वहीं पहाड़ी इलाकों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। यह रिपोर्ट साफ कहती है कि हिमालय के लोगों की जीवन प्रत्याशा बढ़ सकती है अगर यहां के वायुमंडल में प्रदूषित सूक्ष्म तत्वों एवं धूलकणों की सघनता 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के सापेक्ष हो। दरअसल, यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय सुरक्षित मानक है।

इसी तरह उधमसिंह नगर, नैनीताल, पौड़ी गढ़वाल, चंपावत और अल्मोड़ा में रहने वाले लोगों की जीवन प्रत्याशा भी क्रमश: 6.1 साल, 4.2 साल, 3.2 साल, 2.3 साल और 2.1 साल बढ़ सकती थी। अगर यहां के लोग विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानके के हिसाब से शुद्ध और सुरक्षित हवा में सांस लेते।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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