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कृषि कार्य में क्रांतिकारी सुधार के लिए जीएम फसलों की अनुमति जरूरी

Fri, 13 Nov 2020 10:12 AM IST
Avinash chandra अविनाश चंद्र
Updated Fri, 13 Nov 2020 10:12 AM IST
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agriculture bill 2020 in hindi: GM crops is necessary for revolution in farming and farmers
आज जरूरत बिजनेस के क्षेत्र में आंत्रप्रेन्योरशिप की तर्ज पर कृषि के क्षेत्र में फार्मप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने की है

कृषि के क्षेत्र में सुधार के उपायों के तहत केंद्र की मोदी सरकार द्वारा विगत माह तीन विधेयक पारित कराए गए। ये तीन विधेयक हैं; कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। 

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कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020 का उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फसल बेचने और खरीदने की आजादी मिल सके, वहीं कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 का उद्देश्य कृषि करारों के संबंध में एक राष्ट्रीय तंत्र की स्थापना करना है। 
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इससे कृषि उत्पादों की बिक्री, फार्म सेवाओं, कृषि व्यवसाय से जुड़े फर्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों को किसानों के साथ जोड़ कर उन्हें सशक्त बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण विधेयक, आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020 है जिसका उद्देश्य अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दलहन सहित आलू-प्याज आदि को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाना है। इससे उपरोक्त उत्पादों के भंडारण की सीमा तय करने वाले नियमों से राहत मिल सकेगी।  
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इन कानूनों के लागू होने पर किसानों की मंडी पर निर्भरता कम होगी और उन्हें अपने उत्पादों को बेचने के लिए बाजार का विकल्प भी प्राप्त होगा। हालांकि किसानों के मन में एमएसपी को लेकर कुछ डर हैं जो कि वाज़िब भी हैं और सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि किसानों के साथ संवाद स्थापित कर उनके मन से इस डर को निकाले। निसंदेह उपर वर्णित कानून/संविधान कृषि सुधार के क्षेत्र में सकारात्मक कदम है लेकिन सिर्फ इन्हीं कदमों से क्रांतिकारी बदलाव आ जाएगा, किसान समृद्ध हो जाएगा और हर तरफ खुशहाली आ जाएगी यह मानना अतिशयोक्ति होगी।

आज जरूरत बिजनेस के क्षेत्र में आंत्रप्रेन्योरशिप की तर्ज पर कृषि के क्षेत्र में फार्मप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने की है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस देश में किसानों को अबतक बाजार का विश्लेषण करने और उसके आधार पर जोखिम लेते हुए फसल पैदा करने और बाजार में बेचकर उसका पुरस्कार प्राप्त करने में अयोग्य माना जाता रहा है। परिणामस्वरुप देश का किसान सदैव समाज और सरकार की दया पर निर्भर रहने वाला वर्ग बन कर रह गया है। 

90 के दशक में देश ने आर्थिक सुधारों के लिये प्रयास शुरु किये लेकिन तीन दशक बीत जाने के बाद भी कृषि क्षेत्र इससे अछूता रहा है। परिणामस्वरूप सभी दावों के बावजूद भारत का सबसे बड़ी निजी क्षेत्र कृषि, कानून की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। भूमि से लेकर बीज तक और विभिन्न प्रकार के निवेशों से लेकर उत्पादों तक खेती की सभी अवस्थाएं कानूनों और नियमों के चक्रव्यूह में फंसी हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की खराब गुणवत्ता और गैर-कृषि क्षेत्रों में आर्थिक अवसरों की कमी के कारण किसान न तो खेती छोड़ सकते हैं और न ही गैर कृषि क्षेत्र में आजीविका के वैकल्पिक साधन तलाश सकते हैं। 

गैर-कृषि क्षेत्रों में आर्थिक अवसरों की कमी को देखते हुए किसान न तो कृषि छोड़ सकते हैं और न ही गैर कृषि क्षेत्र में आजीविका के वैकल्पिक साधन खोज सकते हैं। ज्यादातर किसान न सिर्फ परेशान हैं बल्कि जीवित रहने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। 

agriculture bill 2020 in hindi: GM crops is necessary for revolution in farming and farmers
प्रौद्योगिकी का उपयोग फसलों को कीटों और रोगों के प्रति उनके प्रतिरोध में सुधार करने के लिए किया गया है

वर्ष 2019 में दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश करते समय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और ईज ऑफ लिविंग को अन्य वर्गों के साथ साथ कृषक वर्ग पर भी लागू करने की बात कही थी। हालांकि इस अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु पर बाद में किसी प्रकार की चर्चा नहीं हुई, न राजनीतिक दलों के द्वारा और न ही किसान संगठनों के द्वारा। 

राजनीतिक मंच से इस बात पर चर्चा तो सदैव होती है कि किसानों की आय को बढ़ाना ही उनके जीवन में खुशहाली लाने का तरीका है लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह संभव कैसे होगा? इस पर गंभीर बहस कभी नहीं होती। किसान की आय बढ़ाने के लिये उसके उत्पादों का समर्थन मूल्य बढ़ा देना ही सबसे आसान काम दिखाई देता है जबकि पैदावार की लागत और किसानों के नुकसान को कम करने पर चर्चा विरले ही होती है। 

खेती के कार्य में टेक्नोलॉजी के प्रयोग की बात भी बस ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और ड्रिप इरिगेशन से आगे नहीं बढ़ पाती है जबकि दुनिया के तमाम देश नई प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बीजों को संशोधित विशेषकर अनुवांशिक रूप से संशोधित कर न केवल उत्पादन को बढ़ा रहे हैं बल्कि कीट पतंगों व अन्य खरपतवार के कारण होने वाले नुकसान को भी कम कर पा रहे हैं। 

ऐसा नहीं है कि जीएम बीजों के प्रयोग और इसके लाभ से देश के नीति निर्माता व किसान अनभिज्ञ हैं। पिछले एक दशक के दौरान अनुवांशिक रूप से संशोधित (जीएम) बीजों का प्रयोग कर देश दुनिया में कपास का सबसे बड़ा उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है। कपास की खेती करने वाले तमाम किसान इससे लाभान्वित भी हुए हैं।

हालांकि इस उपलब्धि का जश्न मनाने की बजाय हम जैव प्रौद्योगिकी को अब भी शंका की दृष्टि से देख रहे हैं। दुनिया के अन्य देश जहां चौथी व पांचवी पीढ़ी के जीएम कपास के माध्यम से मुनाफा कमा रहे हैं हम अब भी पहली पीढ़ी को ही पूर्णता में स्वीकार नहीं कर सके हैं। 

दुनिया में एक दर्जन से अधिक फसलों और एक मछली में अनुवांशिक संशोधनों को मंजूरी दी गई है। प्रौद्योगिकी का उपयोग फसलों को कीटों और रोगों के प्रति उनके प्रतिरोध में सुधार करने के लिए किया गया है या फिर खरपतवार व सूखा प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ावा देने के लिये। गैरकानूनी होने के बावजूद देश के किसानों में बीटी बैंगन की खेती इसका प्रमाण है कि किसान इससे लाभ प्राप्त कर रहा है। 

दरअसल, बैंगन के पौधों को कीटों से होने वाले नुकसान की प्रतिशतता अन्य सब्जियों की तुलना में अधिक होती है और औसतन हर दूसरे दिन इसपर कीटनाशक का छिड़काव करना होता है जबकि बीटी बैंगन पर कीटनाशक के छिड़काव की जरूरत दो या तीन हफ्ते में एक बार की हो जाती है। इससे जहां लागत में कमी आती है वहीं बैंगन का सेवन करने वालों पर कीटनाशकों के दुष्प्रभाव पड़ने के मौके में भी कमी आती है। ऐसा ही अन्य सरसों व अन्य फसलों के साथ भी है।

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देश में कम से 154 कानून ऐसे हैं जो किसानों की खुशहाली की राह में रोड़े अटकाते हैं

थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के सालाना शोध कार्यक्रम 'रिसर्चिंग रियालिटी' के तहत प्रकाशित शोधपत्रों के संकलन 'रेग्युलेशन फॉर न्यू रियालिटीज़ः ए क्रॉस सेक्टोरल एनालिसिस ड्यूरिंग कोविड19' के मुताबिक देश में बीटी बैंगन की खेती में व्यापक वृद्धि देखने को मिली है। प्रकाशित शोधपत्र में बताया गया है कि वर्ष 2014 में देश में जहां 20 किसान ही बीटी बैंगन उपजाते थें, वहीं 2018 में ऐसे किसानों की संख्या बढ़कर 27000 से अधिक हो गई। 

किसानों के सबसे बड़े संगठन शेतकरी संगठन के द्वारा तो बीटी और एचटीबीटी बीजों के प्रयोग की अनुमति के लिए पिछले साल सत्याग्रह तक छेड़ा गया था और सामूहिक रूप से कानून का उल्लंघन कर इन बीजों की बुआई की गई थी। शेतकरी संगठन के प्रवक्ता व अकोला, महाराष्ट्र के किसान नेता ललित पाटिल बहाले कहते हैं कि ‘देश में कम से 154 कानून ऐसे हैं जो किसानों की खुशहाली की राह में रोड़े अटकाते हैं लेकिन सबसे अधिक परेशानी का सबब सीड एक्ट, एमएससी और फूड प्रोसेसिंग कार्य पर आरोपित कड़ी लाइसेंसिंग प्रक्रिया है। 

इस तरह की नियामक विकृतियों के परिणामस्वरूप, निजी कंपनियां अनुसंधान में अपने निवेश को कम कर रही हैं और नए उत्पादों को वापस ले रही हैं। ठीक इसी समय सार्वजनिक क्षेत्र के अनुसंधान सुविधाओं में कृषि जैव प्रौद्योगिकी पर काम कर रहे अग्रणी भारतीय वैज्ञानिक जीएम सरसों और जीएम बैंगन की स्वीकृति के लिए अत्यधिक देरी का अनुभव किया है। युवा वैज्ञानिक भारत में कृषि जैव प्रौद्योगिकी में प्रवेश करने में संकोच कर रहे हैं, जबकि विदेशों में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिक लगातार नई संभावनाएं की खोज कर रहे हैं।’

लगभग 40 साल पहले, सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति ने अदूरदर्शी सरकारी नीतियों के कारण भारत को लगभग बायपास कर दिया था। ठीक वैसी ही गलती अब कृषि जैव प्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) को दबाने के क्रम में दोहराई जा रही हैं। अंतत: किसानों को विशेष कृषि पद्धतियों को चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए जो वे अपने संदर्भ में उपयुक्त पाते हैं। फिर आधुनिक विज्ञान और कृषि के अन्य वैकल्पिक स्कूलों के बीच कोई संघर्ष नहीं होगा।

(लेखक थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी में सहायक निदेशक हैं।)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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