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उत्तराखण्ड में भू-कानून आन्दोलन: कितनी जायज है मांग? क्यों गरमा रहा है माहौल?

Wed, 28 Jul 2021 09:32 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 28 Jul 2021 09:32 AM IST
सार

अपने पुरखों से विरासत में मिली जमीनों को बाहरी जमीनखोरों से बचाने के लिए कुछ अन्य हिमालयी राज्यों की तरह विशिष्ट कानूनी प्रावधानों की मांग को लेकर उत्तराखण्ड में एक और जनान्दोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।

दरअसल,पहाड़वासियों को आशंका है कि राज्य में देश के पहले भूमि सुधार कानून, उत्तर प्रदेश (उत्तराखण्ड) जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम में कई छेद कर मूल निवासियों की जमीनों पर नई तरह की जमीदारी विकसित हो रही है।

जानिए क्या है पूरा मामला, बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत।

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Agitation over land law heats up In Uttarakhand
उत्तराखण्ड में एक और जनान्दोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। - फोटो : social media

विस्तार

अपने पुरखों से विरासत में मिली जमीनों को बाहरी जमीनखोरों से बचाने के लिए कुछ अन्य हिमालयी राज्यों की तरह विशिष्ट कानूनी प्रावधानों की मांग को लेकर उत्तराखण्ड में एक और जनान्दोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।

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पहाड़वासियों को आशंका है कि राज्य में देश के पहले भूमि सुधार कानून, उत्तर प्रदेश (उत्तराखण्ड) जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम में कई छेदकर मूल निवासियों की जमीनों पर नई तरह की जमीदारी विकसित हो रही है। प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैण में स्थानीय लोगों की जमीनों पर नेताओं और धन्नासेठों द्वारा की जा रही खरीद-फरोख्त से पहाड़वासियों की आशंका को बल मिल रहा है।

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स्वाधीनता आन्दोलन में जमींदारी विनाश की भावना

दरअसल, स्वाधीनता आन्दोलन के साथ ही सवाल उठ गया था कि अंग्रेजों से देश की आजादी का तब तक कोई अर्थ नहीं रह जाएगा जब तक कि आम किसान को जमीदारों और सामन्तों से मुक्ति नहीं मिलती। इसीलिए संयुक्त प्रान्त की असेंबली ने 8 अगस्त 1946 को काश्तकार और सरकार के बीच के बिचौलिए (जमींदार) समाप्त करने का प्रस्ताव पारित करने के साथ ही प्रान्त के प्रीमियर गोविन्द बल्लभ पन्त की अध्यक्षता में एक 15 सदस्यीय जमींदारी उन्मूलन कमेटी का गठन कर दिया था जिसमें तत्कालीन राजस्व मंत्री हुक्मसिंह और पन्त जी के साथ संसदीय सचिव चैधरी चरणसिंह भी शामिल थे। कमेटी की रिपोर्ट स्वयं चैधरी चरणसिंह ने ड्राफ्ट की थी। लेकिन स्वाधीनता आन्दोलन से उपजी वह भावना जमीनखोरों ने निगल ली।

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उत्तराखण्ड राज्य के साथ धारा 371 की मांग भी थी

नब्बे के दशक में चले ऐहिासिक उत्तराखण्ड आन्दोलन में जहां पृथक राज्य की मांग की जा रही थी, वहीं पहाड़वासियों की जमीनें एवं उनकी सांस्कृतिक पहचान बचाए रखने के लिए उत्तर पूर्व के राज्यों की तरह संविधान के अनुच्छेद 371 के विभिन्न प्रावधानों की व्यवस्था की मांग की जा रही थी।


अंग्रेजों ने भी आज के उत्तर प्रदेश, जिसे तब आगरा एवं अवध संयुक्त प्रान्त के नाम से जाना जाता था, के प्रशासन से भिन्न तत्कालीन असम के जनजातीय क्षेत्रों की तरह उत्तराखण्ड को भी शेड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट एक्ट 1874 के तहत प्रशासित किया था। धारा 371 की मांग करने वालों में भाजपा के तत्कालीन सांसद मनोहरकान्त ध्यानी भी थे, जिन्होंने बाकायदा यह प्रस्ताव राज्यसभा में भी रखा था।

Agitation over land law heats up In Uttarakhand
सरकारों ने कानून तो बनाए, लेकिन वह धीरे-धीरे ढीले पड़ते चले गए और एक समय बाद बदल ही दिए गए। - फोटो : Social media

तिवारी और खण्डूड़ी ने बनाया था हिमाचल का जैसा कानून

हालांकि इस हिमालयी राज्य को उत्तर पूर्व की तरह संवैधानिक दर्जा तो नहीं मिला मगर नारायण दत्त तिवारी और फिर भुवनचन्द्र खण्डूड़ी सरकारों ने हिमाचल प्रदेश के काश्तकारी एवं भूमि सुधार अधिनियम 1972 की धारा 118 की तर्ज पर उत्तराखण्ड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950) (अनुकूलन एवं उपान्तरण आदेश, 2001) (संशोधन) अधिनियम 2008 में जो संशोधन कर लोगों की जमीनें भूखोरों से बचाने के प्रयास किए थे उनमें 2017 में सत्ता में आई सरकार ने कई संशोधन कर इस कानून के उदेश्य को ही समाप्त कर जमीनों की लूटखसोट की खुली छूट दे दी।

इस अधिनियम के मूल संशोधनों में व्यवस्था थी कि जो व्यक्ति धारा 129 के तहत राज्य में जमीन का खातेदार न हो, वह 500 वर्ग मीटर तक बिना अनुमति के भी जमीन खरीद सकता है। साथ ही इस कानून में यह भी व्यवस्था थी कि इस सीमा से अधिक जमीन खरीदने पर राज्य सरकार से क्रेता को विशेष अनुमति लेनी होगी। उसके बाद 2007 में भुवन चन्द्र खण्डूड़ी सरकार ने 500 वर्ग मीटर की सीमा घटा कर 250 वर्गमीटर कर दी थी। इस कानून में व्यवस्था थी कि 12 सितम्बर, 2003 तक जिन लोगों के पास राज्य में जमीन है, वह 12 एकड़ तक कृषि योग्य जमीन खरीद सकते हैं।

लेकिन जिनके पास जमीन नहीं है, वे आवासीय उद्देश्य के लिए भी इस तारीख के बाद 250 वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन नहीं खरीद सकते हैं। इस कानून को जब नैनीताल हाइकार्ट ने असंवैधानिक घोषित किया तो राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई जहां इसे वाजिब और संवैधानिक घोषित कर दिया गया।

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया था भू कानून

उत्तराखण्ड में पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने 2003 में नए भू-कानून की प्रस्तावना में कहा था कि उन्हें बड़े पैमाने पर कृषि भूमि की खरीद फरोख्त अकृषि कार्यों और मुनाफाखोरी के लिए किए जाने की शिकायतें मिल रहीं थीं। उनका कहना था कि प्रदेश की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं को देखते हुए असामाजिक तत्वों द्वारा भी कृषि भूमि के उदार क्रय-विक्रय नीति का लाभ उठाया जा सकता है।

अतः कृषि भूमि के उदार क्रय-विक्रय को नियंत्रित करने और पहाड़वासियों के आर्थिक स्थायित्व तथा विकास के लिए सम्भावनाओं का माहौल बनाए जाने हेतु यह कानून लाया जाना जरूरी है। उत्तराखण्ड में कृषि के लिए केवल 13 प्रतिशत जमीन वर्गीकृत है जिसका एक बड़ा हिस्सा पलायन के कारण उपयोग से बाहर हो गया।

राज्य गठन के बाद ही लगभग 1 लाख हेक्टेअर कृषि योग्य जमीन कृषि से बाहर हो गई और ऐसी जमीन में या तो इमारतें उग गईं या फिर जंगल-झाड़ियां दग गई हैं। अगर इतनी सीमित जमीन भी पहाड़ के लोगों से छीन ली गई तो उनकी पीढ़ियां ही भूमिहीन हो जाएंगी।

Agitation over land law heats up In Uttarakhand
डॉ. यशवन्त सिंह परमार ने की थी वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था। - फोटो : Social media

उद्योग तो नहीं आए मगर जमीनें जरूर चली गईं

वर्ष 2018 के 7 एवं 8 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में आयोजित निवेशक सम्मेलन में हुए 1.25 लाख करोड़ के पूंजी निवेश प्रस्तावों के एमओयू से तत्कालीन त्रिवेन्द्र सिंह सरकार इतनी गदगद हुई कि उसको जमीदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 के पीछे छिपी जमींदारी के विनाश और काश्तकार की भूमि बचाने की भावना नजर नहीं आई और उन्होंने उद्योगों के नाम पर पैतृक राज्य उत्तर प्रदेश से विरासत में मिले एतिहासिक जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 को ही दांव पर लगा दिया।

त्रिवेन्द्र सरकार ने 2018 में उत्तराखंड (उत्तरप्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950)(अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश, 2001) में संशोधन कर उक्त कानून में धारा 154 (2) जोड़ते हुए पहाड़ों में भूमि खरीद की अधिकतम सीमा खत्म कर दी। इस के साथ ही 143 (क) जोड़कर कृषकों की जमीनों को अकृषक बाहरी लोगों द्वारा उद्योगों के नाम पर खरीद कर उसका भू-उपयोग परिवर्तन आसान कर दिया।

अब कोई भी धन्नासेठ उद्योग लगाने के नाम पर बहुत ही सीमित मात्रा में उपलब्ध कृषि भूमि खरीद कर उसका कुछ भी उपयोग कर सकता है। उस दौरान राज्य की जमीनों की नीलामी कर राजस्व कमाने की योजना भी बनी मगर योजना के धरातल पर उतरने से पहले सरकार ही चली गयी।

डॉ. परमार को चिन्ता थी पहाड़ियों की जमीनों की

आधुनिक हिमाचल के निर्माता डॉ. यशवन्त सिंह परमार ने नए राज्य के अस्तित्व में आते ही 1972 में हिमाचल प्रदेश काश्तकारी और भूमि सुधार अधिनियम 1972 बनवा कर उसकी धारा 118 में ऐसी व्यवस्था कर दी थी जिससे जमीन का मालिक अकृषक को सेल, डीड, लीज, गिफ्ट, हस्तांतरण और गिरबी के माध्यम से जमीन हस्तांतारित नहीं कर सकता था। यद्यपि हिमाचल में भी बाहरी दबाव के चलते इस कानून में अब तक पांच बार संशोधन हो चुके हैं।

नये प्रावधानों के तहत वहां अटल बिहारी बाजपेयी और प्रियंका गांधी सरीखे वीआइपी को मकान बनाने के लिये जमीनें मिल चुकी है। शिमला से लेकर मनाली और डलहौजी तक देश के नामी कारोबारियों एनं नेताओं ने प्रदेश में होटलों का निर्माण इन्हीं प्रावधानों के तहत किया है। वहां भी आवासीय भवन के लिये 500 और दुकानों के लिए 300 वर्गमीटर तक जमीनें खरीदने की छूट है लेकिन वे गैर कृषक ही माने जाएंगे। इनके अलावा वहां उद्योगों के लिए भी जमीन खरीदने की छूट है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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