आनंद फिल्म का रीमेक: क्या क्लासिक फिल्म के साथ न्याय कर पाएगी रीमेक?
घोषणा हुई है कि फिल्म 'आनंद' का रीमेक तैयार किया जाएगा। सन 1971 में इसका निर्माण एनसी सिप्पी ने किया था। उनके पोते समीर राज सिप्पी यह रीमेक बनाएंगे।
विस्तार
मुंबई में सुपारी लेने और देने का चलन शगुन जैसी लोकप्रियता हासिल कर चुका है। एक और ताजा सुपारी ली गई है। घोषणा हुई है कि फिल्म 'आनंद' का रीमेक तैयार किया जाएगा। सन 1971 में इसका निर्माण एनसी सिप्पी ने किया था। उनके पोते समीर राज सिप्पी यह रीमेक बनाएंगे।
अब बाप-दादा के माल के साथ कोई कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है। यह अभिव्यक्ति की आजादी का दौर है। फिर यहां तो बात बपौती की आजादी की भी है।
तो किस-किस तरह से इस रीमेक को 'मॉडर्न टच' दिए जाएंगे?
बेहतर होगा कि आनंद को किसी जानलेवा गुप्त रोग से पीड़ित बता दें। नायक अपने दोस्त डॉ. भास्कर बैनर्जी को बताएगा, 'बाबू मोशाय! मेरी 'एक्स' दरअसल गूंगीबाई काठियावाड़ी की बैचमेट थी। वहीं से उसको और उससे मुझको ये रोग लग गया रे।'
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इसी बहाने फ्लैशबैक के नाम पर आनंद बाबू और उनकी एक्स के बीच वाले कुछ गुदगुदाते पल परदे पर उतार दिए जा सकेंगे। साथ ही 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' गीत भी बज जाएगा। अंतर केवल यह कि इसकी आगे की पंक्तियों में 'सांझ की आयटम बदन दिखाए...' जैसा नवयुगीय क्रांतिकारी परिवर्तन करना होगा।
रीमेक ट्रेंड सेटर भी बन सकता है। करना केवल यह है कि इस बीमारी के चलते आनंद को औरतों के लिए वितृष्णा से भरा दिखा दिया जाए। लिहाजा अब वह अपनी बची-खुची जिंदगी के ख़ास आनंद के लिए भास्कर बाबू में संभावनाएं टटोल रहा है। इसलिए रीमेक में आनंद 'मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने' गाते हुए रह-रह कर एलजीबीटीक्यू वाला झंडा दिखाकर भास्कर को अपनी बात कन्वे करने का प्रयास करेगा।
लेकिन भास्कर का ध्यान तो अपनी एक ख़ास मरीज की तरफ है। वह याद कर रहा है कि कैसे अस्पताल आई उस मरीज के लगभग पूरे खुले जिस्म पर चिन्दी के बराबर पड़े कपड़े का एक नटखट बटन अचानक खुल गया था। यह दृश्य भी यादों के झरोखों से परदे पर उतारकर दर्शकों के आनंद में और वृद्धि की जा सकती है।
हमारी आनंद आज की होगी, इसलिए इसमें नायक के दर्द को ख़ास तरीके से दिखाया जाएगा। वह रेलवे पटरी के पास ग़मगीन खड़ा है। अपनी बीमारी को याद कर गा रहा है, 'ज़िंदगी, कैसी है थकेली हाय।'
पटरी से लगी दीवार पर बाबू मोशाय के चित्र के साथ 'खोई हुई ताकत और जवानी फिर से पाएं' वाला विज्ञापन दिख रहा है। उफ़ ! कितना जबरदस्त कंट्रास्ट उतरेगा इस दृश्य से नायक की दशा और डॉ. बैनर्जी के किरदार की विवशता का।
'विवशता' के फैक्टर को और सजीव करने के लिए बैनर्जी के विज्ञापन के ठीक बगल में फिल्म 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' का पोस्टर भी दिखाया जा सकता है।
ऋषिकेश मुख़र्जी तो दकियानूसी थे। उन्होंने 'आनंद' में 'ना जिया लागे ना' वाला गीत गाते समय नायिका को नायक के घर की सफाई करते हुए दिखा दिया। धत! हमारी आनंद प्रोग्रेसिव किस्म की होगी।
गीत के ठीक पहले नायक घर के लिए बाथटब खरीद कर लाएगा। वह नायिका से आग्रह करेगा कि बाथटब का विधिवत उद्घाटन करे। तब नायिका घर की सफाई छोड़ शारीरिक स्वच्छता पर ध्यान देते हुए टब में स्नान करती हुई यह गीत गाएगी।
नायक पूरे समय तौलिया हाथ में लिए इस बात का इंतज़ार करेगा कि कब गीत ख़त्म हो और कब अगली टब से बाहर निकले। मुझे पूरा विश्वास है कि नायिका के स्नान से निर्वृत्त होने के बाद वाले दृश्य से दर्शकों को यह सन्देश सार्थक रूप में दिया जा सकेगा कि इंतज़ार का फल वाकई मीठा होता है।
अभी-अभी एक दोस्त का फोन आया। वह पूछ रहा है कि क्या रीमेक के अंत में भी आनंद की मौत हो जाएगी? मैंने उसे बताया, 'मूल फिल्म में आनंद का चरित्र मरा था, रीमेक में शायद पूरी की पूरी आनंद फिल्म को ही मार डाला जाएगा।' आपका इस बारे में क्या सोचना है?
उत्तर देने से पहले यदि आप संजय लीला भंसाली की 'देवदास' रामगोपाल वर्मा की 'आग' ('शोले' का रीमेक) और जेपी दत्ता की 'उमराव जान' देख लें तो बहुत संभव है कि आप भी 1971 वाले आनंद की 51 साल बाद की जाने वाली हत्या की आशंका से दहल उठेंगे।
(1971 वाली 'आनंद' की यूनिट से क्षमायाचना सहित)
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