आचार्य नरेन्द्र देव जयंती विशेष: संस्कृति समाजवाद और शिक्षा को लेकर अलग था नजरिया
भारतीय संस्कृति की इस उदात्त परम्परा को आचार्य नरेन्द्र देव ने काशी में अपने अध्ययन-अध्यापन के दौरान नजदीक से महसूस किया, देखा, परखा और विकसित किया।
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आचार्य नरेन्द्र देव ने रोजा लुक्समबर्ग को उद्धृत करते हुए समाजवाद और संस्कृति के अन्तर्सम्बन्धों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है कि "समाजवाद केवल रोटी की समस्या नहीं है बल्कि यह एक विश्वव्यापी सांस्कृतिक आंदोलन है।" भारतीय संस्कृति का विस्तार मध्य एशिया से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया तक महज प्राचीन होने की मुख्य वजह से सर्वंकष तथा सर्वग्राही हुई , बल्कि नैसर्गिक नैतिक मूल्यों, दया और करुणा जैसे उदात्त स्वभाव के कारण यह संभव हो सका।
आचार्य नरेन्द्र देव की दृष्टि में हर संस्कृति जब जीर्ण-शीर्ण हो जाती है, तो नई संस्कृति के साथ संघर्ष होने से ही उसका कायाकल्प होता। वैदिक काल से लेकर औपनिषदिक काल तथा ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी-छठी शताब्दी तक विभिन्न संस्कृतियों के आपसी सम्मिलन और संघर्ष से ही भारतीय संस्कृति की यह अजस्र धारा आज तक प्रवाहित होती दिखयी दे रही है।
भारतीय संस्कृति की इस उदात्त परम्परा को आचार्य नरेन्द्र देव ने काशी में अपने अध्ययन-अध्यापन के दौरान नजदीक से महसूस किया, देखा, परखा और विकसित किया। उस वक्त काशी संस्कृत शिक्षा का केंद्र तो था ही, प्राच्य विद्या के भी अनेक श्रेष्ठ विद्वान मौजूद थे। आचार्य जी इस तथ्य को बेहतर जानते थे कि भारतीय संस्कृति का चरित्र कभी इकहरी नहीं हो सकती।
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कारण कि भारत में अनेक जातियां कई शताब्दियों तक आती रही हैं और संस्कृति के साथ घुलती-मिलती गई हैं। इस लिए काशी संस्कृत महाविद्यालय के समावर्तन संस्कार के दीक्षांत समारोह को सम्बोधित करते हुए वे कहते है कि "ज्ञान राशि अनन्त है। वैदिक परम्परा और प्राच्य विद्या के अध्ययन के साथ-साथ बौद्ध और जैन आगम की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
इन ग्रन्थों में भारतीय समाज शास्त्र के इतिहास की प्रचुर सामग्री मिलती है। बौद्ध तथा जैन विद्वानों ने न्याय दर्शन और व्याकरण के विकास में विशिष्ट योगदान किया है। यहां उल्लेखनीय है कि आज भारतीय ज्ञान परम्परा के नाम पर सिर्फ वैदिक परम्परा, साहित्य और संस्कृति का अध्ययन-अध्यापन की धूम चहु ओर मची है।
शासन के स्तर भी भारतीय ज्ञान परम्परा की इस एकल पद्धति को खूब प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह जाने बिना कि भारतीय ज्ञान परम्परा का पूरा वृत्त श्रमण परम्परा (बौद्ध-जैन ज्ञान परम्परा) और लौकिक परम्परा के सांगोपांग अध्ययन-अध्यापन के बिना कभी पूरा ही नहीं हो सकता है। प्राचीन काल में अगर मध्य एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में संस्कृत का अखण्ड साम्राज्य रहा है, तो उसकी एक बड़ी वजह पाणिनि के उनके 'अष्टाध्यायी' का प्रभाव रहा होगा।
अष्टाध्यायी' बारे में रुसी विद्वान श्चेचरवास्की ने कहा है कि यह मानव बुद्धि की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक है। मध्य एशिया में बौद्ध धर्म से सम्बंधित लिपि, दर्शन और कला के अवशेष आज भी विद्यमान है। अफगानिस्तान के वामियन में बुद्ध की विशाल प्रतिमा थी - जिसे तालिबानी अतातायियों ने बम से उड़ा दिया। खुतन का राजकाज भारतीय भाषाओं में चलते थे।
कूचा से ही बौद्ध धर्म चीन पहुंची। कंबोडिया बहुत दिनों तक भारतीय संस्कृति का केंद्र था। जो आज चीन संस्कृति चकाचौंध से आक्रांत है। आचार्य नरेन्द्र देव भारतीय संस्कृति की इस विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए ही हमें आगाह करते है कि- "हमारी दृष्टि सांप्रदायिक और प्रांतीय न होकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय होना चाहिए।
प्राचीन संस्कृति के उत्कृष्ट अंशों की रक्षा करते हुए, हमें आधुनिक युग के सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाना चाहिए।" भारतीय संस्कृति के इन सार्वभौमिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए ही आचार्य नरेन्द्र देव ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रहते "नव संस्कृति संघ" की स्थापना किया। उसके पहले अध्यक्ष के रुप में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को "नव संस्कृति संघ" का दायित्व सौंपा। तब उनके साथ काशी विद्यापीठ के आचार्य बीरबल सिंह और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के प्रोफसर मुकुट बिहारी लाल जैसे प्रबुद्ध विद्वान भी सक्रिय थे।आचार्य नरेन्द्र देव के बाद के समाजवादी आंदोलनों में साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के सवाल लगभग हाशिए पर चले गये अथवा उतने मुखर होकर प्रकट नहीं हुए , जिसकी कल्पना आचार्य नरेन्द्र देव ने कभी किया था।
हालांकि, उसके कुछ अवशेष बाद में डॉ राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन में भी यदा - कदा दिखायी पड़ते हैं।पर उसके बाद में भारतीय संस्कृति की जो भयावह स्वरुप प्रकट हुआ, वह आज के वैश्विक सन्दर्भ में कितनी प्रासंगिक अथवा उपादेय है, इसकी एक अलग व्याख्या भी अब नितान्त जरूरी लग रही है।
साहित्यकारों से आचार्य नरेन्द्र देव की अपेक्षा थी कि " वे जनता को मर्यादित राष्ट्रीयता की समझ विकसित करें और उन्हें चिंतनशील बनावें। संकुचित और विकृत राष्ट्रीयता से जनता को छुटकारा दिलावें। प्रगतिशील साहित्यकारों को आगाह करते हुए आचार्य नरेन्द्र देव ने कहा है कि - "वे विकृत राष्ट्रीयता के खतरों को पहचाने की चेतना जनता में उत्पन्न करें।"
आचार्य नरेन्द्र देव भारतीय साहित्य के कृत्रिम होते स्वरूप को लेकर भी खासा चिंतित थे। बेवजह भाषा में पांडित्य प्रदर्शन से भाषा की सहज संप्रेषणीयता तो प्रभावित होती है, वह काव्य हृदयग्राही भी नहीं होता है। इस लिए आचार्य भामह के कथन को याद करते हुए वे कहते है कि - काव्य को दुरुह और क्लिष्ट नहीं होना चाहिए और उसे समझने के लिए किसी टीका की भी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
आचार्य नरेन्द्र देव के समय काशी विद्यापीठ के कुलपति रहे भगवान दास ने शिक्षा सम्बन्धी एक दस्तावेज प्रस्तुत किया था। (पता नहीं सन् 2020 की नयी शिक्षा समिति ने वह प्रस्ताव देखा कि नहीं।) आजीवन शिक्षा से जुड़े होने के कारण आचार्य नरेन्द्र देव ने शिक्षा सम्बन्धी कुछ व्यवहारिक और बेहतरीन सुझाव दिया है।
भगवान दास समिति के सुझावों से अपने को संबद्ध करते हुए आचार्य नरेन्द्र देव ने अध्यापकों को एक जरूरी सुझाव यह दिया है कि - शिक्षा और जीविकोपार्जन दोनों अलग - अलग बातें हैं। वे अध्यापक जो शिक्षा को महज जीविकोपार्जन का साधन मानते हैं, वे शिक्षा के मूल उद्देश्यों को तो भूल ही जाते हैं,उनकी दृष्टि भी व्यापक नहीं वो पाती हैं।
इस लिए जीवन की अन्य गतिविधियों के संचालन में वे अपने को असमर्थ हो पाते हैं। मौलिक शिक्षा के महत्व को बताते हुए उनका यह कहना ठीक ही प्रतीत होता है कि " आज के युग में पुरानी पद्धति की संस्कृत की शिक्षा अपने उद्देश्य को तभी चरितार्थ कर सकती है, जब शास्त्रों की शिक्षा के साथ - साथ मौलिक शिक्षा की भी व्यवस्था किया जाय।
प्रत्येक विद्यार्थी को अपने जीविका का ही उपार्जन नहीं करना है, बल्कि एक नागरिक के कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। उससे भी बढ़कर उसे मनुष्य बनाना है और मनुष्य भी पुराने युग का नहीं, आज के युग का- जब समाज जीवन में सामंजस्य का सर्वत्र अभाव, विचारों का संघर्ष और एक तरह की अनिश्चितता सर्वत्र व्याप्त है।"
ऐसे हमारे ऋषिकुल आचार्य नरेन्द्र देव के विचार आज के सामाजिक संक्रमण के इस दौर में कितना प्रासंगिक है? यह एक नितान्त विचारणीय प्रश्न है। आज वैश्विक सन्दर्भ में जो रूढ़िवादिता और कट्टरता सर्वव्याप्त दिखायी दे रही है है, इसका एक सर्वसमावेशी और सम्भव समाधान आचार्य नरेन्द्र देव के विचारों में " श्रमण धर्म की आध्यात्मिकता और भौतिक जीवन में समाजवाद को स्वीकार कर ही किया जा सकता है।"
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