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ISRO 50th Anniversary: अनूठा है हिंदुस्तान की अंतरिक्ष यात्रा का इतिहास

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Tue, 13 Aug 2019 01:13 PM IST
हमारे वेद् एवं प्राचीन ग्रन्थ हमारे पूर्वजों के खगोलीय ज्ञान के प्रमाण हैं।
हमारे वेद् एवं प्राचीन ग्रन्थ हमारे पूर्वजों के खगोलीय ज्ञान के प्रमाण हैं। - फोटो : Amar Ujala Graphics
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अंग्रेजी की कहावत ‘‘स्काइ इज द लिमिट’’ का शाब्दिक अर्थ ‘‘भले ही आसमान ही सीमा’’ हो लेकिन इसका असली भावार्थ् है कि जिस तरह अपने आंचल में चांद तारों को समेटे हूं आकाश अनन्त है उसी तरह उन्नति की संभावनाएं भी अनन्त हैं और उसी तरह उन संभावनाओं को हासिल करने के उपक्रम भी खुले आसमान की तरह अनन्त हैं। 
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जाहिर है जब अनन्त संभावनाओं की बात होती है तो स्वाभाविक रूप से नजर आसमान की और उठ जाती है। लेकिन संभावनाएं केवल आकाश तक नहीं ठहरतीं बल्कि उससे भी बाहर ब्रह्माण्ड और फिर उससे भी बाहर निकल कर उस अंतरिक्ष की ओर बढ़ने लगती है जिसमें न जाने कितने करोड़ ब्रह्माण्ड और उन ब्रह्माण्डों के अन्दर न जाने कितने सौर मण्डल होगे तथा सूरज जैसे अरबों तारों या नक्षत्रों वाली न जाने कितनी हजारों या  लाखों आकाश गंगाएं होंगी।

यकीनन इंसान ने जैसे ही होश संभाला होगा या उसमें बुद्धि और विवेक का विकास होने लगा होगा तब से उसकी नजर आसमान पर टिकी हुई है और तभी से उसके मन में अपने ऊपर दिखाई देने वाले नीले शून्य के रहस्यों के बारे में जिज्ञासाएं पनपती रही होंगी।

हमारे ज्ञान का प्रतीक है हमारे ग्रंथ 
हमारे वेद् एवं प्राचीन ग्रन्थ हमारे पूर्वजों के खगोलीय ज्ञान के प्रमाण हैं। हमारे देश ने चांद तारों पर पहुंचने के लिए रूस एवं अमेरिका जैसे देशों की तुलना में भले ही कुछ विलम्ब से छलांग लगाई हो मगर हमारे वैज्ञानिकों ने आर्यभट्ट जैसे खगोलविदों और गणितज्ञों के पद्चिन्हों पर चलते हुए ‘‘स्पेस की रेस’’ (अन्तरिक्ष की दौड़ या उड़ान) में स्वयं को बराबरी पर लाकर खड़ा कर दिया है।

आज हम भी चांद पर पहुंच गए हैं और अन्तरिक्ष के रहस्यों को सुलझाने तथा मानव कल्याण के लिए अंतरिक्ष की संभावनाओं को समेटने के लिए गंगनयान की तैयारी में जुट गए हैं। मिशन शक्ति के तहत हम अंतरिक्ष में किसी उपग्रह को मार गिराने में सक्षम होकर अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा देश बन गए।

अंतरिक्ष में छलांग के लिए इसरो का गठन
यद्यपि भारत के अंतरिक्ष के क्षेत्र में छलांग लगाने से पहले ही सोवियत संघ का यूरी गगारिन 1961 में अंतरिक्ष की सैर कर चुका था और अमेरिका अपने नील आर्म  को चांद पर भेजने की तैयारी कर चुका था। लेकिन नए-नए स्वतंत्र हुए भारत को भी अंतरिक्ष की उपयोगिता समझने में देरी नहीं लगी और डॉ. विक्रम साराभाई ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का वरदहस्त पाकर 60 के दशक में अंतरिक्ष अनुसंधान की गतिविधियां शुरू कर दीं। उस समय अमेरिका में भी उपग्रहों का प्रयोग करने वाले अनुप्रयोग परीक्षणात्मक चरणों में थे।

अमेरिकी उपग्रह ‘सिनकाम-3’ द्वारा प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में टोकियो ओलंपिक खेलों के सीधे प्रसारण ने संचार उपग्रहों की सक्षमता को प्रदर्शित किया तो अन्तरिक्ष अनुसंधान की महती आवश्यकता को समझते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पी.आर.एल.) के निदेशक के रूप में कार्यरत डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में वर्ष 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना कर दी। 

भारत में अंतरिक्ष अनुसंधान के जनक डॉ. साराभाई के नेतृत्व में इसरों ने अपनी स्थापना के बाद भारत के लिए कई कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक चलाने के साथ ही अंतरिक्ष के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुसंधानों को सफल बनाया।

इसरो ने अब तक कई अंतरिक्ष यान मिशन, लॉन्च मिशन सम्पन्न करने के साथ ही चंद्रयान 1 को चांद पर उतारने के बाद चन्द्रयान- 2 और आदित्य (अंतरिक्ष यान) सहित कई मिशनों की योजना बनाई। संगठन ने न केवल भारत की प्रगति के लिए बल्कि भारत को विश्व के समक्ष अन्तरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत ने 28 विभिन्न देशों के लिए 209 उपग्रह लॉन्च किए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स के माध्यम से बाहरी देशों के लिए वाणिज्यिक लॉन्च पर बातचीत की जाती है। सभी उपग्रहों को इसरो के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण वाहन (पीएसएलवी) खर्च करने योग्य प्रक्षेपण प्रणाली का उपयोग करके लॉन्च किया गया।
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