शिक्षक दिवस विशेष: क्या दिवस मनाने भर से मान-सम्मान बरकरार रहेगा
एक शिक्षक को जितना व्यवस्था ने भी हाशिए पर धकेला है, उतना शायद किसी और ने नहीं। आज शिक्षकों की बहुत सी समस्याएं हैं, परंतु कोई भी उनसे पूछने को तैयार नहीं। हां, समस्याओं का दोषी शिक्षक को जरूर ठहरा दिया जाता है।
लोग शिक्षा जगत में किए जा रहे सुधारों की बात करते हैं तो बहुत खुशी होती है, लेकिन क्या सुधार शब्द को केवल शिक्षकों से जोड़कर देखना ठीक है?
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विस्तार
5 सितंबर यानि शिक्षक दिवस। भारत में इस दिन को ही शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। आजाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन का जन्मदिन इसी दिन आता है। वे खुद भी एक शिक्षक थे। 1954 में उन्हें भारत रत्न देकर सम्मानित किया गया। 1962 में उन्हें देश का दूसरा राष्ट्रपति चुना गया। उपराष्ट्रपति बनने के बाद इस शिक्षाविद् ने जब राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी संभाली तो 5 सितंबर को उनके जन्मदिन पर कुछ पूर्व विद्यार्थी उन्हें बधाई देने पहुंचे तो डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन ने कहा कि मेरा जन्मदिन मनाने की बजाय आप इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाएं। उनकी महानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपना जन्मदिन मनाने की बजाए सभी शिक्षकों को यह दिन समर्पित कर दिया भले ही आज एक शिक्षक को सम्मानित करने के लिए इस दिन की उपयोगिता न के बराबर रह गई हो ।
आज के दौर में यह विचारणीय है कि क्या सच में आज के विद्यार्थी व शिक्षक इस दिवस को मनाना चाहते हैं? क्या आज सच में एक शिक्षक अपने उस सम्मान को बरकरार रख पाया है? एक व्यक्ति के जीवन में जन्मदाता से ज्यादा महत्व शिक्षक का होता है, क्योंकि ज्ञान ही व्यक्ति को इंसान बनाता है, जीने योग्य जीवन देता है और वह ज्ञान सिवाय एक शिक्षक के कोई और नहीं बांट सकता।
पुरातन काल में गुरू द्रोणाचार्य ने पांडव-पुत्रों, विशेषकर अर्जुन को जो शिक्षा दी, उसी की बदौलत महाभारत में पांडव विजयी हुए। वह गुरु द्रोणाचार्य ही थे जो खुद हार गए, लेकिन अपने शिष्यों को अपनी शिक्षा से विजयी बना गए। भारत में राम-विश्वामित्र, कृष्ण-संदीपनी, अर्जुन-द्रोणाचार्य से लेकर चंद्रगुप्त मौर्य-चाणक्य एवं विवेकानंद-रामकृष्ण परमहंस आदि शिष्य-गुरू की एक ऐसी महान परंपरा रही है।
क्या वर्तमान परिदृश्य में शिक्षक इन बातों से कोसों दूर जा रहा है? काफी हद तक इन शंकाओं के सच होने के पीछे एक नहीं अनेक कारण हैं। सबसे पहला कारण, जिस उद्देश्य के लिए शिक्षक शिक्षण जैसे नेक कार्य के लिए इस क्षेत्र में आया है, आज वह खुद ही इससे दूर जा रहा है या उसे दूर किया जा रहा है। इसमें कभी वह व्यवस्था को दोष देता है तो कभी समाज को, लेकिन अपने दोष पर चाहते हुए भी नजर नहीं दौड़ाना चाहता, आखिर क्यों?
समाज शिक्षा की रौशनी फैलाने वाले शिक्षक को हर बात के लिए दोषी ठहराता है। अगर कोई शिक्षक घर में अपने जरूरी कार्य के लिए छुट्टी पर भी हो तो यही समाज कुछ नहीं, पर हां सबसे पहले जरूर कहेगा कि मास्टर जी तो "फरलू" पर हैं, क्या यही सच्चाई है? क्या अध्यापक समाज फरलू पर ही आश्रित है क्या उन्हें छुट्टियां नहीं मिलतीं, जैसी अन्य को मिलती हैं, फिर क्यों सबको शिक्षक ही नजर आता है?
एक व्यवस्था ने कभी उसको रसोईया, कभी मिस्त्री, कभी डाकिया, कभी बाबू, कभी जे ई, कभी सर्वेक्षक, कभी निर्वाचन अधिकारी, कभी फार्मासिस्ट, कभी चपरासी, कभी आपदा प्रबंधक और पता नहीं क्या कुछ या शायद ही कुछ बचा हो जो वह नहीं बना। परीक्षा परिणामों के समय कहते हैं परिणाम ठीक न हुआ तो नाप देंगे, विभाग कम लेकिन मीडिया शिक्षकों की ज्यादा नाप-नपाई करने में लगा रहता है।
शिक्षक तब तक कैसे अपने कार्य का सही ढंग से निर्वाह कर पाएगा, जब तक वह तनाव, डर व गुलामी के साया में रहेगा। कई बार एक शिक्षक को उस बात की सज़ा भुगतनी पड़ती है, जिसका वह दोषी नही होता। एक विद्यार्थी द्वारा शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार की खबर आती है तो इसी समाज, व्यवस्था और मीडिया द्वारा कोई प्रतिक्रिया नही आती तब उस शिक्षक के अधिकारों की बात कोई नही करता ना समाज न व्यवस्था जबकि बच्चों के अधिकारों के लिए उन्हीं शिक्षकों को चीख-चीख कर बताया व समझाया जाता है। नित नए-नए प्रयोगों से शिक्षा का स्तर भले ही ऊंचा न हुआ हो, परंतु एक शिक्षक की छवि जरूर धूमिल हुई है।
अब बात करें वर्तमान में एक शिक्षक की कुंठाओं की तो वर्तमान में शिक्षक अपनी परिभाषा को ही बदल देना चाहता है। वह खुद को शिक्षक कहलाने की बजाए पदों के माफिक अपना नामकरण चाहता है। उसे अपने ओहदे के माफिक छोटी कक्षाओं को पढ़ाना गवारा नहीं, फिर कैसे वह शिक्षक एक बच्चे से उस सम्मान की उम्मीद करता है, जिसकी दुहाई वह हर समय देता फिरता है। कक्षा कभी छोटी बड़ी नहीं हो सकती सोच जरूर छोटी या बड़ी हो सकती है।
शिक्षक तो वह है जो किसी भी परिस्थिति में अपने पेशे से इमानदारी के साथ पेश आए। आज हर शिक्षक सम्मान तो पाना चाहता है, लेकिन क्या वह सम्मान शर्तों पर आधारित होना चाहिए। अब तो शिक्षण एक नेक कार्य नहीं रहा, अपितु यह मात्र धन अर्जित करने का संसाधन बन कर रह गया है। भौतिकता के इस युग में जिस शिक्षक को कभी शिक्षा जैसे पुण्य कार्य से जोड़ कर देखा जाता था, कुछेक शिक्षकों के लिए वह आज धन बल कमाने का जरिया मात्र रह गया है।
शिक्षक विद्यार्थी और शिक्षा में वह कड़ी है जो समाज की अन्य सभी कड़ियां को जोड़ती हैं। आज जरूरत केवल किताबी ज्ञान की ही नहीं, अपितु नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण शिक्षा की है। वैसे भी शिक्षक को यह नहीं भूलना चाहिए जन्म दाता से ज्यादा महत्व शिक्षक का होता है। सफलता किसी की भी हो उस नींव में अहम योगदान शिक्षक का ही होता है, बिना शिक्षक न तो कोई व्यक्ति महान बन पाया है न ही बिना गुरु-शिष्य कोई देश महान बनने का सपना देख सकता है।
आज जरूरत है शिक्षक को अपने ही अंंदर छिपे उस शिक्षक को बाहर निकालने की, जो उन्हें तो सत्य मार्ग दिखाए ही साथ ही देश के विद्यार्थियों को भी उस मार्ग पर प्रशस्त कर सके, जिसकी देश को इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है। शिक्षक जैसे पावन पर्व की महत्ता बरकरार रखने के लिए गुरु और शिष्य दोनों को अपनी अपनी जिम्मेदारी व कर्तव्यों का इमानदारी से निर्वाह करना होगा। केवल 5 सितंबर पर शिक्षक दिवस के नाम पर औपचारिकताएं पूरी करने से कुछ भी हासिल नहीं हो पाएगा।
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