गणतंत्र दिवस विशेषः सियासी वर्चस्व और अस्तित्व की लड़ाई में संविधान के 70वीं सालगिरह की अहमियत
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भारत के संविधान के लागू होने के सत्तर बरस पूरे होने जा रहे हैं। यानी पूरे सात दशक। इस लंबे अर्से में इसमें 126 संशोधन हो चुके हैं। यानी हर दशक में 18 दफा संविधान में संशोधन किए जा चुके हैं। संविधान में संशोधन का प्रावधान संविधान में ही किया गया है, वो इसलिए की संविधान सभा में उस वक्त जो नेता शामिल थे, वे न केवल आला दर्जे के राष्ट्रभक्त बल्कि दूरदृष्टा और आने वाले समय की जरूरत का अंदाजा लगा पा रहे थे। यही वजह थी कि उन्होंने आरक्षण को वंचित वर्ग के उत्थान के लिए लागू तो किया, लेकिन इसे सदा के लिए नहीं बल्कि केवल एक दशक के लिए यानी 10 वर्षो के लिए ही लागू किया। अब तक हुए 126 संशोधनों में से सात तो आरक्षण को 10 और जारी रखने के संबंध में हो चुके हैं।
वंचित वर्ग और भारत
वंचित वर्गों के उत्थान के मामले में हमारी सरकार अपनी असफलता को सात बार स्वीकार कर चुकी हैं। इसमें वोट बैंक की राजनीति की मजबूरी भी शामिल है। आरक्षण समाप्त किए जाने की खुलकर वकालत कोई भी दल नहीं करता और न ही कर सकने की स्थिति में अगले एक दशक तक होने के ही आसार हैं।
दरअसल, जो विचारधारा संविधानभा में आरक्षण से असहमति जताने की काेशिश कर रही थी, वही अब भी इसकी समीक्षा की बात यदा-कदा करती रहती है। तब केएम मुंशी ने आवाज उठाई थी तो तत्कालीन काूनन मंत्री डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा से खुद को अलग करने की दो टूक बात कही थी।
यह सही है कि इन 70 सालों में वंचित तबकों के लिए बहुत कुछ बदला है, लेकिन बहुत कुछ नहीं भी बदला है। केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार ने इस आरक्षण के खिलाफ और बीच में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के तत्कालीन वीपी सिंह सरकार के फैसले के खिलाफ धधकी आग के लगातार धुंधियाते रहने के चलते गरीब सवर्णों के लिए भी 10 फीसदी आरक्षण लागू किया है।
आरक्षणों के संबंध में एक दर्जन से ज्यादा संविधान संशोधनों के अलावा टैक्स प्रणाली और अन्य संशोधन समय-समय पर होते रहे हैं, लेकिन संविधान में हुए ताजा संशोधन नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश में लगातार जारी घमासान यानी विरोध और विरोध के मुकाबले के लिए समर्थन से देश में पहली दफा ऐसे हालात बना दिए हैं जब संसद में पारित होने के बाद किसी संविधान संशोधन या कानून संशोधन के खिलाफ इतना विरोध सामने आया है।
इस मामले में डेढ़ सौ ज्यादा याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हैं और कोर्ट ने संविधान पीठ बनाने की बात कही है। एक राज्य आसाम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई तो 35 साल बाद काला कोट पहनकर खुद सुप्रीमकोर्ट में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ खड़े हुए हैं। यह भी पहली ही दफा हो रहा है।
दरअसल, देखना यह है कि लागू हो चुके नागरिकता संशोधन कानून को अपने राज्य में लागू नहीं करने का एलान कर चुकी गैर भाजपा शासित कई राज्य सरकारों की इस मुद्रा से केंद्र राज्य संबंध और संघीय गणतंत्र भारत गणराज्य को अपने संविधान लागू होने के 70 साल पूरे होने पर मिल रही इस चुनौती का क्या और कैसा समाधान निकलता है?
73 साल बाद क्या हम वहीं खड़े हैं..
देश की जनता को अपने 71 वें गणतंत्र के मौके पर यह समझने की जरूरत है कि सियासत उनके सामने दरपेश असल मुददों के बजाए भटकाने के मुद्दे डालकर एक देश के तौर पर भारत को कहां ले जाना चाहती है? लोकतंत्र में लोक और गणतंत्र में गण ही महत्वपूर्ण है, लेकिन तंत्र जिसमें सत्ता शामिल है, गण यानी जन को दरकिनार करने या उसे बरगलाने को ही अपना मकसद मानते दिख रहे हैं।
डेमोक्रेसी इंडेक्स में फिसलनेे के मायने क्या?
इकॉनामिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की डेमोक्रेसी इंडेक्स की ताजा सूची में भारत को 51वीं पायदान पर दिखाया गया है। पिछले साल की रैंकिंग में भारत 41वें क्रम पर रखा गया था। यानी सीधे 10 अंकों या स्थान की गिरावट एक साल में। इस रिपोर्ट के क्या मायने हैं। क्या कश्मीर से धारा 370 का हटना और नागरिकता संशोधन कानून की खिलाफत के हिंसक आंदोलनों से भारत में डेमोक्रेसी खराब हो गई?
इस रिपोर्ट का आधार और विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे और यह सियासी औजार भी बनेगी, लेकिन सवाल ये है कि बीते साल भारत को हंगर इंडेक्स में भी ऐसे ही नीचे उतारा गया था। उसमें भी भारत में गरीबी पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से ज्यादा बताई गई थी।
पाकिस्तान और बांग्लादेश की जनता के लिए दुश्वारियां भारत से ज्यादा हैं और महंगाई भी। पाकिस्तान तो दिवालिएपन की कगार पर है, ऐसे में हंगर इंडेक्स पर यकीन नहीं होता। तो क्या डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत के 10 स्थान नीचे चले जाने या रखे जाने के भी कोई अन्यथा निहितार्थ हैं?
सवाल कई है जबाव कहां हैं? प्रतिप्रश्न पर प्रतिप्रश्न
भारत का संविधान लागू होने के 70 साल पूरे होने के मौके पर हर तरफ संविधान की दुहाई भरे प्रदर्शनों, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच टकरावों तथा नए सियासत गठजोड़ों और दुरभिसंधियों के बीच न्यायपालिका के समक्ष भी चुनौतियां कम नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने आजादी के पहले से चले आ रहे अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद जैसे मामले का फैसला करने जैसा महत्वपूर्ण कार्य किया है। लेकिन अब उसके समक्ष नागरिकता संशोधन कानून बनाम एनआरसी बनाम एनपीआर जैसे विवाादों को निपटाने का बड़ा सवाल सामने हैं, जाे मुख्यतया सियासी वर्चस्व और अस्तित्व की टकराव की परिणिति है। ऐसे में नागरिकों को नागरिकता बोध को गहरा करने और सियासी जमातों के असल मंतव्यों को समझने और खुद को देश हित में सामने लाने की जरूरत है।
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