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जीवन के मैराथन की शुरुआत

Mon, 30 May 2016 07:05 PM IST
सुब्रत मुखर्जी
सुब्रत मुखर्जी Updated Mon, 30 May 2016 07:05 PM IST
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Begining of life's marathon
सुब्रत मुखर्जी

हाल ही में हार्वर्ड के एक ग्रेजुएट डोनोवैन लिविंगस्टोन ने होरैस मैन (1796-1859) को, जो एक अमेरिकी राजनेता और शिक्षा सुधारक थे, उद्धृत करते हुए कहा, शिक्षा मानव जीवन के दूसरे तमाम उपकरणों से ऊपर है, और इसका मनुष्य के बीच समानता स्थापित करने में कोई सानी नहीं है। मैन अमेरिकी लोगों के बीच यह धारणा स्थापित करने में सफल हुए कि 'शिक्षा सबके लिए, कट्टरता से मुक्त और मुफ्त होनी चाहिए और सिर्फ सीखने तथा अपने कट्टर उद्देश्यों की पूर्ति के बजाय सामाजिक दक्षता बढ़ाना, नागरिक गुण हासिल करना और चरित्र निर्माण इसका लक्ष्य होना चाहिए।'

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हर साल जब 10वीं के नतीजे आते हैं, तब छात्र और उनके अभिभावक, दोनों कॉलेजों और पेशेवर संस्थाओं में दाखिले की चिंता में व्यस्त हो जाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय इनकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर होता है, और यहां दाखिला न मिलने पर बहुतों के दिल टूट जाते हैं। लेकिन इससे हताश नहीं होना चाहिए, क्योंकि कई दूसरे अच्छे कॉलेज भी हैं। इसके अलावा ग्रेजुएट कोर्स के दूसरे और तीसरे साल में एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में जाने के लिए माइग्रेशन का प्रावधान भी है। यानी किसी खास कॉलेज में दाखिला लेना उतना महत्वपूर्ण नहीं है। अपनी पसंद के विषय लेना और उनमें अच्छा प्रदर्शन करना कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। पढ़ाई की गुणवत्ता और दूसरी कसौटियों पर दो कॉलेजों के बीच बहुत फर्क नहीं होता, क्योंकि प्राध्यापकों की नियुक्ति रोजगार की उपलब्धता के आधार पर होती है। उदाहरण के लिए, यह बिल्कुल संभव है कि एक यूनिवर्सिटी टॉपर को किसी कम चर्चित कॉलेज में जगह मिले, और एक सामान्य अध्यापक की नियुक्ति एक नामचीन या कैंपस कॉलेज में हो।
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दिल्ली विश्वविद्यालय चूंकि एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसलिए देश भर के, यहां तक कि विदेशों के छात्र भी यहां दाखिला लेना चाहते हैं। हर साल लगभग ढाई लाख छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय के अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाखिले के लिए पहुंचते हैं, जिनमें दिल्ली के बाहर से आने वाले छात्रों की संख्या बहुत अधिक होती है। इससे स्थानीय छात्रों के लिए इसमें प्रवेश ला पाना मुश्किल होता गया है। दूसरी ओर, निरंतर इतनी भारी प्रतिद्वंद्विता से दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके कॉलेजों के अध्यापन और शोध पर दबाव बढ़ता जा रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय एक संघीय विश्वविद्यालय है, जिसके अंतर्गत 70 से अधिक कॉलेज हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के अलावा जेएनयू और जामिया मिल्लिया जैसे विश्वविद्यालयों में भी स्तरीय पढ़ाई होती है, और वे भी केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं।
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कॉलेजों में दाखिले के समय एक और चीज जो महत्वपूर्ण है, वह है विषयों का चुनाव। जैसा कि मैंने पहले भी कहा, अगर कोई छात्र अपनी पसंद के विषय चुनता है, तो दूसरे और तीसरे साल बेहतर संभावना वाले कॉलेज में दाखिला लेने की उसकी उम्मीद बढ़ जाती है। किस स्ट्रीम में जाना चाहिए, इसका फैसला भी छात्रों को सोच-समझकर करना चाहिए। आजकल आम तौर पर कॉमर्स और मैनेजमेंट में दाखिला लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। छात्रों को लगता है कि इनमें रोजगार के अवसर ज्यादा हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है। इस साल आईएएस में टॉप करने वाली टीना डाबी राजनीति विज्ञान की ग्रेजुएट थी।

लिहाजा दूसरे छात्रों का अनुकरण करने के बजाय जरूरी यह है कि अपनी पसंद के विषय चुने जाएं। इन दिनों शुद्ध विज्ञान के विषयों से कतराने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। बीती सदी के पचास और साठ के दशकों में प्रतिभाशाली छात्र शुद्ध विज्ञान के विषय चुनते थे, लेकिन अब वह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बदल रही है। यह समझने की जरूरत है कि प्रतिभाशाली साइंस ग्रेजुएटों के बगैर आधुनिक विश्व के ज्ञान तक पहुंच पाना मुश्किल होगा, क्योंकि यह विज्ञान और तकनीक की दुनिया है। हाल के वर्षों में कॉलेजों में दाखिले के समय छात्रों के बीच बेहद ऊंचे अंक प्रतिशत का डर बैठ जाते देखा गया है। यह विभिन्न राज्य शिक्षा बोर्डों के बीच प्रतिद्वंद्विता का नतीजा भी हो सकता है, और हमारी उच्च शिक्षा के अमेरिकीकरण का परिणाम भी।

कॉलेजों में दाखिले के समय माता-पिता और छात्रों के बीच रुचि, योग्यता और विषयों के प्रति झुकाव जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए, और उसके बाद ही कोई विवेकसम्मत फैसला लेना चाहिए। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल जाना या किसी को अपनी रुचि के विषय मिल जाना ही काफी नहीं है, क्योंकि यह तो जीवन के मैराथन की शुरुआत भर है। शिक्षा का उद्देश्य कौशल प्राप्त करना और ज्ञान तथा संवेदना के स्तरों पर खुद को इतना समृद्ध करना है, जिससे सिर्फ प्रत्याशित स्थितियों का ही नहीं, बल्कि अप्रत्याशित स्थितियों का भी बखूबी सामना किया जा सके। इसके लिए महत्वपूर्ण यह है कि अपने विषय पर एकाग्र होते हुए उसमें विशेषज्ञता हासिल की जाए।

अंग्रेजी पर अति निर्भरता भी जरूरी नहीं है, क्योंकि हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में भी प्रतिभाशाली छात्रों के लिए अनेक संभावनाएं हैं। लेकिन अंग्रेजी का कामकाजी ज्ञान तो होना ही चाहिए, क्योंकि दुनिया एकीकृत और भूमंडलीकृत हो रही है।


भारतीय संविधान के मुताबिक, शिक्षा हर नागरिक का अधिकार है, और सबको समान शिक्षा मिलने का अवसर हालांकि अब भी अपेक्षा के अनुरूप तो नहीं है, लेकिन पहले से अधिक जरूर हुआ है। भारत एक युवा देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही है।ऐसे में, देश के शिक्षित युवाओं के लिए मैन्यूफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्रों में अनेक अवसर हैं। हमें याद रखना चाहिए कि औपनिवेशिक भारत ने एक श्रीनिवास रामानुजम को पैदा किया था, जिन्होंने इस कहावत को चरितार्थ किया कि 'जिसको चमकना है, वह हर जगह चमकेगा।

-लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं

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